हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज कलाकार शबाना आजमी और मशहूर लिरिसिस्ट जावेद अख्तर ने हाल ही में पहली बार अपने खंडाला वाले बंगले की झलक दिखाई. फराह खान के व्लॉग में इसका रेवेलेशन हुआ. जावेद अख्तर, फराह खान के मौसा लगते हैं, क्योंकि उनकी पहली पत्नी हनी ईरानी फराह की मौसी हैं. फराह के व्लॉग में जावेद अख्तर ने अपने संघर्ष के दिनों को भी याद किया और बताया कि कैसे उन्होंने कभी फुटपाथ पर सोकर और दो-तीन दिन भूखे रहकर जिंदगी गुजारी थी.
शबाना और जावेद का आलीशान खंडाला बंगला
जावेद-शबाना के इस घर का नाम 'सुकून' है. जो किसी लग्जरी होटल से कम नहीं है. इस घर के बाहर एक बड़ा और खूबसूरत बगीचा है, जो ऊंचे-ऊंचे हरे पेड़ों से घिरा हुआ है. बगीचे में संगमरमर की मूर्तियां लगी हैं और बीच में एक फव्वारा भी है. घर के अंदर जाने पर एक बड़ा सा हॉल मिलता है, जिसकी लकड़ी की ऊंची छत इसे अंग्रेजी स्टाइल बंगले जैसा एहसास देती है. घर के अंदर पुराने जमाने का फर्नीचर है, जो इसे खास लुक देता है.
इसके बाद फराह दर्शकों को उनके ड्रॉइंग रूम में ले जाती हैं, जहां शबाना और जावेद ने दुनिया भर से लाई गई कई कलाकृतियां सजा रखी हैं. जावेद मजाक में कहते हैं कि इनमें से कुछ चीजें शायद फराह खान जितनी पुरानी हों. ड्रॉइंग रूम में बड़े दरवाजे और खिड़कियां हैं, जिससे बाहर का नजारा सीधे अंदर दिखता है. फराह ने उनका बड़ा लकड़ी का डाइनिंग टेबल भी दिखाया.
फुटपाथ पर सोए, तीन दिन भूखे रहे जावेद अख्तर
शबाना आजमी ने बताया कि उन्होंने ये प्रॉपर्टी करीब 15 साल पहले खरीदी थी. यहां मौजूद 150 साल पुराना एक पेड़ उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने ये जमीन खरीदने का फैसला कर लिया. हालांकि, घर को लेकर शबाना और जावेद की सोच अलग-अलग थी.
शबाना ने कहा- मैं इसे एक छोटा-सा वीकेंड कॉटेज बनाना चाहती थी, लेकिन बाद में पता चला कि जावेद यहां एक बड़ा और शानदार बंगला बनवा रहे हैं. इस बात पर हमारी रोज बहस होती थी. फिर उनके एक दोस्त ने मुझसे कहा कि ‘जावेद अख्तर शोले हैं और तुम अंकुर हो, तुम दोनों कभी नहीं मिल सकते. तुम्हें अंकुर छोड़कर उन्हें शोले बनाने देना होगा.’ इसके बाद मैंने बहस करना छोड़ दिया.
फराह खान ने जावेद अख्तर से पूछा कि जिन दिनों में वो संघर्ष कर रहे थे, जब वो फुटपाथ पर सोते थे और कई-कई दिन भूखे रहते थे, उन दिनों के बाद आज इतना शानदार घर होने पर उन्हें कैसा लगता है.
इस पर जावेद अख्तर ने कहा- कभी-कभी मुझे खुद यकीन नहीं होता कि ये सब मेरे साथ हो रहा है. जिनके पास कुछ नहीं होता, उन्हीं के सपने होते हैं. मैंने कविता ‘भूख’ तब लिखी थी, जब मैं लगातार तीन दिन तक भूखा रहा था. जिंदगी में आप बड़े-बड़े घरों में रह सकते हैं, लेकिन दिल में हमेशा वो एक छोटा सा कमरा रह जाता है, जिसे आप कभी नहीं भूलते.
एक बाथरूम आठ परिवारों के साथ शेयर करती थीं शबाना
शबाना आजमी ने भी अपने संघर्ष के दिनों को याद किया. उन्होंने बताया कि वो एक साधारण परिवार से आती हैं. उन्होंने कहा- मैं एक कम्युनिस्ट पार्टी की कम्यून में रहती थी. वहां आठ छोटे कमरे थे और हर कमरे में एक-एक परिवार रहता था. उन सभी आठ परिवारों के लिए सिर्फ एक बाथरूम और एक टॉयलेट था. मैं वहां नौ साल की उम्र तक रही, उसके बाद हम मुंबई आ गए.
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