सनी देओल का नया शाहकार ‘बॉर्डर 2’ थिएटर्स में धमाका करने के लिए तैयार है. 1997 में आई ‘बॉर्डर’ जिस युद्ध पर सेट थी, करीब 30 साल बाद आ रहा सीक्वल भी उसी पर बेस्ड है— 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध. सनी देओल के भौकाली देशभक्त अवतार का स्टार्टिंग पॉइंट रही ‘बॉर्डर’, फिल्मों में पाकिस्तान-बैशिंग को उस ऊंचाई पर लेकर गई जो आज तक बरकरार है. और ‘बॉर्डर 2’ अब ऐसे मौके पर आ रही है जब भारत-पाक टेंशन फिर से फिल्मों का हॉट टॉपिक है.
स्क्रीन पर लगातार भिड़ रहे भारत-पाक
रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ 5 दिसंबर, 2025 को रिलीज हुई थी. लगभग डेढ़ महीने से थिएटर्स में जनता की पहली पसंद बन चुकी ‘धुरंधर’ भारत-पाक कॉन्फ्लिक्ट की वो शक्ल लेकर आई जो अब तक केवल कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ का हिस्सा थी— पाकिस्तान में अंदर से सेंध लगाती इंडियन इंटेलिजेंस.
‘बॉर्डर’ में सनी देओल जिस पाकिस्तान से लड़ रहे थे, वो ‘बॉर्डर’ पर सामने खड़ा दुश्मन था. 30 सालों में वही पाकिस्तान भारत की पीठ में आतंकी साजिशों का खंजर घोंपने वाला पड़ोसी बन चुका है. स्याही से नहीं, बल्कि कलम में विशुद्ध एड्रेनलिन भरकर लिखी गई ‘धुरंधर’ ने दिखाया कि भारत के पास ऐसी साजिशों का जवाब देने का भी अचूक उपाय मौजूद है. रणवीर सिंह वो इंडियन स्पाई बने जिसके पास सनी देओल की तरह सीमा पर दहाड़ने की आज़ादी नहीं थी, मगर उसके अंदर की ये दहाड़ उसकी आंखों में साफ दिख रही थी.
‘धुरंधर’ को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि साल 2026 के पहले दिन ‘इक्कीस’ रिलीज हो गई. 21 साल की उम्र में देश के लिए शहीद होने वाले अरुण खेत्रपाल की बायोपिक. सनी के रियल-लाइफ पिता धर्मेंद्र अरुण के आर्मी-वेटरन पिता के किरदार में थे. बेटे के सामने लड़ने वाला पाकिस्तानी फौजी, इस बाप के सामने खड़ा है. मगर धर्मेंद्र का किरदार युद्ध के साथ आने वाली तबाही पर विचार कर रहा है, उससे अपने बेटे की यादें बांट रहा है. ‘धुरंधर’ से बिल्कुल उलट, सॉफ्ट टोन वाली ‘इक्कीस’ को भी अपने हिस्से की तारीफें मिलीं. स्वर्गीय धर्मेंद्र ने अपने आखिरी किरदार में भी दमदार काम से लोगों को इमोशनल किया.
अब आ रही ‘बॉर्डर 2’ फिर से उस स्टाइल का सिनेमा है, जिसमें पाकिस्तान को पिटता देख दर्शकों का सीना फूलता नहीं समाता. यानी लगभग डेढ़ महीने में भारत-पाक मसला तीसरी बार एक नए फ्लेवर में स्क्रीन तक पहुंच रहा है.
बॉक्स ऑफिस पर असरदार 1971 की यादें
'बॉर्डर 2' की कहानी भी 1971 के भारत-पाक युद्ध पर ही है. 1997 में आई ‘बॉर्डर’, 1971 वाले युद्ध पर बनी सबसे पॉपुलर फिल्म मानी जाती है. इस युद्ध के तुरंत बाद वाले सालों में ‘हिंदुस्तान की कसम’ (1973), ‘आक्रमण’ (1975) और ‘विजेता’ जैसी फिल्में आईं, मगर वो ‘बॉर्डर’ जैसी पॉपुलैरिटी हासिल नहीं कर पाईं. पाकिस्तान को धूल चटाने की थीम पर बनी ‘बॉर्डर’, कारगिल युद्ध से दो साल पहले आई थी. मगर कारगिल में भारत की जीत और जनता के एंटी-पाकिस्तान सेंटिमेंट ने टीवी पर ‘बॉर्डर’ को जबरदस्त पॉपुलैरिटी दिलाई.
दिलचस्प ये है कि ‘धुरंधर’ की कहानी भी इसी युद्ध की जमीन से उठती है. फिल्म में बाकी सब गैंगस्टरबाज़ी है, मगर अर्जुन रामपाल का किरदार मेजर इक़बाल एंटी-इंडिया नफरत का चेहरा था. वो बताता है कि इस नफरत का नशा उसे तब से है जब उसने 1971 की जंग के बाद जिया-उल-हक के मुंह से भारत को लहूलुहान कर देने की बात सुनी थी— तब वो बस 6 साल का था. ‘इक्कीस’ की कहानी तो पूरी तरह 1971 की जंग पर ही बेस्ड है. अरुण ने इसी युद्ध में देश के लिए जान कुर्बान की थी.
पहले ‘धुरंधर’, फिर ‘इक्कीस’ और अब ‘बॉर्डर 2’— मामला इंडिया-पाकिस्तान का ही है. फर्क सिर्फ इतना है कि तीनों फिल्में इसे तीन अलग-अलग चश्मों से देखती हैं. कुछ साल पहले तक इंडिया-पाकिस्तान थीम वाली फिल्मों से दर्शकों की दिलचस्पी घटने लगी थी. ऋतिक रोशन की ‘फाइटर’ और अक्षय कुमार की ‘स्काईफोर्स’ बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं कर पाईं. लेकिन ‘धुरंधर’ को जनता से बेशुमार प्यार मिला और ये ऑल-टाइम सबसे बड़ी हिंदी फिल्म बन चुकी है.
‘इक्कीस’ को तारीफें तो मिलीं, मगर बॉक्स ऑफिस पर वो कमज़ोर रही. अब देखना है कि ‘बॉर्डर 2’ क्या कमाल करती है. सनी देओल का ‘बॉर्डर’ वाला भौकाल, ‘बॉर्डर 2’ को भी तगड़ी हिट बनाता है या नहीं— इसका जवाब शुक्रवार को मिलेगा.
सुबोध मिश्रा