थिएटर में स्क्रीन पर सनी देओल की फिल्म ‘बॉर्डर 2’ चल रही है. करीब 30 साल पहले आई ‘बॉर्डर’ का सीक्वल— वो फिल्म जिसे मॉडर्न एंटी-पाकिस्तान सिनेमा की शुरुआत माना जाता है. कहानी 1971 के युद्ध की है. सरहद के दोनों तरफ सेनाएं हाई-अलर्ट पर हैं— युद्ध कभी भी छिड़ सकता है. इस सिचुएशन में अगर कोई पाकिस्तानी फौजी, किसी हिंदुस्तानी फौजी के सामने आ जाए तो क्या होगा?
पिछले एक-डेढ़ दशक की हिंदी फिल्मों में बनी पाकिस्तान की इमेज देखकर लगता है कि हिंदुस्तानी फौजी, पाकिस्तानी फौजी को कच्चा चबा जाना चाहेगा! लेकिन ‘बॉर्डर 2’ में ऐसा नहीं होता. ये बात अचानक से सरप्राइज तो करती है. पर डायरेक्टर अनुराग सिंह की ये चॉइस अचानक से ‘बॉर्डर 2’ का लेवल बढ़ा देती है. ये बात फिल्म के कुछ सीन्स से समझी जा सकती है. आगे ‘बॉर्डर 2’ के स्पॉइलर हैं, सोच-समझकर आगे बढ़ें.
‘बॉर्डर 2’ का फौजी कोड
फिल्म के एक सीन में वरुण धवन और उनके साथी सैनिक, गर्म हो चुकी जीप के कार्बोरेटर में डालने के लिए पानी तलाश रहे हैं. पास की नहर पर पहुंचते हैं, तो नहर के उस पार उन्हें कुछ पाकिस्तानी सैनिक दिखते हैं. उनका मकसद भी नहर से पानी भरना ही है. वही होता है जो नेचुरल फौजी रिएक्शन है— दोनों साइड से एक-दूसरे पर बंदूकें तन जाती हैं. सीन में टेंशन तगड़ी है.
लेकिन वरुण का आर्मी मेजर किरदार सिचुएशन को बड़ी मैच्योरिटी से डील करते हुए पाकिस्तानियों को चुपचाप पानी भरकर लौट जाने को कहता है. उन पाकिस्तानियों में से एक यंग सोल्जर को वो सबक भी सिखाता है— 'सामने किसी भी सेना का सीनियर हो, उसे सैल्यूट जरूर करना चाहिए'. वो यंग सोल्जर सबक को तुरंत अमल में लाता है.
इस सीन में हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी सैनिकों के बर्ताव में एक नैतिक कोड सा नजर आता है— एक तरह का 'फौजी कोड'. सामने खड़ा सैनिक दुश्मन सेना का ही क्यों न हो, वो भी अपने देश के लिए जान दांव पर लगाने निकला सैनिक है. इसलिए वो भी सम्मान का हकदार है. ‘बॉर्डर 2’ में ये फौजी कोड एक और जगह दिखता है.
क्लाइमेक्स एक्शन में सनी देओल की टुकड़ी जीत चुकी है और उन्होंने एक पाकिस्तानी सैनिक को पकड़ा है. पाकिस्तानी सैनिक बार-बार जान से न मारने की रिक्वेस्ट कर रहा है. सनी देओल वही फौजी कोड रिपीट करते हैं— 'तुम दुश्मन हो, मगर अपने देश के सिपाही हो! इसलिए कुछ नहीं किया जाएगा.'
मां का दिल और बेटों का जुनून
युद्ध के लिए निकलने से पहले दिलजीत दोसांझ का किरदार अपनी मां के पैर छू रहा है— 'आशीर्वाद दो कि सारे दुश्मनों को मारकर आऊं'. मां ठिठक जाती है— वो दुश्मन भी तो अपनी मां की दुआएं लेकर अपने देश के लिए लड़ने ही निकला है. तुम्हारा मकसद अपने देश को विजय दिलाना है, दूसरों की हत्या नहीं! “जीवन देने वाली मां, जान लेने का आशीर्वाद कहां से दे सकती है”!
यही बात फिल्म के गाने ‘बॉर्डर’ के लिरिक्स में भी उतरती है— ‘गोली चलदी बॉर्डर उत्ते जद वी, सीने किसी मां दे वजदी’. यानी बॉर्डर पर जब भी गोली चलती है, किसी मां के सीने पर जाकर लगती है!
‘बॉर्डर 2’ एक युद्ध की कहानी नहीं है… युद्ध में कुर्बानी देने वाले जांबाजों की कहानी है. फिल्म का नैरेटिव कहीं भी, सरहद में घुसने की नापाक पाकिस्तानी हरकत पर शांत नहीं बैठता. लेकिन इस लाइन का खयाल रखता है कि ये हरकतें सियासी हैं. टेबलों पर लिए गए फैसले सियासी हैं. मगर सरहद पर मरने वाला नेता नहीं है, अपना गांव-घर छोड़कर देश के लिए जान देने वाला एक इंसान ही है.
एक लंबे समय से हिंदी सिनेमा में पाकिस्तानी बैशिंग नाइरेटिव में आम हो चुकी है. इतनी आम कि उस पड़ोसी देश पर जेनुइन गुस्सा रखने वाला सख्त से सख्त आदमी भी बार-बार स्क्रीन पर वही राग देखकर उकता चुका है. पाकिस्तान की हरकतों से जनता वैसे ही गुस्सा रहती है. फिल्मों को बार-बार ये बात याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि ‘पाकिस्तान से नफरत करो’!
इसलिए ‘बॉर्डर 2’ जिस तरह फौजी कोड को सम्मान देती है और फौजियों को इंसान की तरह ट्रीट करती है, वो मैजिकल बन जाता है. यही वजह है कि सनी देओल की ये फिल्म उन दर्शकों को भी सरप्राइज कर रही है जो इससे एक रूटीन भारत-पाकिस्तान नैरेटिव दंगल की उम्मीद कर रहे थे.
सुबोध मिश्रा