पहले ब्रेक के लिए 15 साल किया इंतजार, लैला-मजनू एक्टर ने बताया आउटसाइडर होने का दर्द

फिल्म तू मेरा संडे से अपनी फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले अविनाश तिवारी को उनका पहला ब्रेक लगभग 18 साल के स्ट्रगल के बाद मिला था. अविनाश इसके बाद लैला मजनू, घोस्ट स्टोरीज, बुलबुल. द गर्ल ऑन द ट्रेन में नजर आ चुके हैं.

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Avinash Tewari Avinash Tewari

नेहा वर्मा

  • मुंबई,
  • 01 जून 2021,
  • अपडेटेड 3:11 PM IST
  • अविनाश तिवारी बता रहे हैं आउटसाइडर होने का दर्द
  • पहली फिल्म डेब्यू के लिए किया 15 साल का इंतजार
  • सोशल मीडिया पर नहीं है ज्यादा फॉलोअर्स

इंडस्ट्री में एक लंबे साल से जुड़े होने के बावजूद अविनाश खुद को न्यूकमर ही समझते हैं. अपनी जर्नी और इंडस्ट्री के अनुभवों को आजतक से शेयर करते हुए अविनाश ने एक आउटसाइडर होने का भी दर्द और उनके स्ट्रगल के बारे में बात करते हैं.

मेरे लिए कोई चार फिल्में लेकर नहीं खड़ा होगा

बहुत कम लोगों को यह बात पता होगी कि मैं पिछले 18 साल से यहां काम कर रहा हूं. मैंने अपने पहले फिल्मी ब्रेक के लिए 15 साल का इंतजार किया है. मुझे यह डर था कि आउटसाइडर होने की वजह से अगर मेरी पहली फिल्म अच्छी नहीं होती है, तो शायद फिर दोबारा मौका नहीं मिल पाए. या मेरे लिए कोई चार फिल्में लेकर नहीं खड़ा होगा. तू मेरा संडे और लैला मजनू भले स्क्रीन पर नहीं चली लेकिन इस फिल्म को जबरदस्त सराहना मिली और मेरे काम की चर्चा हुई. जिससे आगे चलकर मुझे मौके मिलते गए. इतने सालों में भी मैं खुद को न्यूकमर ही मानता हूं. जब आप आउटसाइडर होते हैं तब आपको फिल्म इंडस्ट्री के बारे में ज्यादा कुछ नहीं मालूम होता है. जैसे मुझे नहीं पता कि इंडस्ट्री में फिल्में कैसे मिलती हैं, कैसे एक एक्टर के पास पहुंचती है, पीआर कैसे काम करता है. उसी नाते एक नयापन महसूस होता है, जिससे आप एक्सपेरिमेंट कर सकते हैं और रिस्क ले सकते हैं. 

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समझ नहीं आ रहा है कि टाइपकास्ट हो चुका हूं या वर्सैटाइल हूं 

एक हालिया इंटरव्यू में मुझसे सवाल किया गया कि आप टाइपकास्ट हो रहे हैं और उसके तुरंत बाद दूसरे इंटरव्यू में कहा में पूछा गया कि आप वर्सेटाइल हैं. समझ नहीं आ रहा है दर्शकों के जेहन में मुझे लेकर क्या इमेज बन रही है. मैंने हर फिल्म में अलग अंदाज के साथ परफॉर्मेंस देने की कोशिश की है. अगर उनकी कहानी के मेरा किरदार ही कुछ ऐसा हो, तो मैं क्या कर सकता हूं. मुझसे लोग आकर कहते हैं कि मैं इंटेंस रोल्स बहुत अच्छा करता हूं. अब लगता है कि मुझे बच्चों के लिए या फिर एक लाइट कॉमिडी फिल्म पर फोकस करने की जरूरत है. 

 

अगर इनसाइडर होता, तो ब्रांड बनाने में इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती 

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पहले मुझे इंडस्ट्री से काफी कंपलेन थी लेकिन अब नहीं है. हां, एक बात का मलाल होता है कि एक एक्टर को दर्शकों को थिएटर तक लाने के लिए ब्रांड बनाने की जरूरत पड़ती है. मैं देश का अकेला लीड एक्टर हूं जिसके फॉलोवर्स 1 मिलियन तक भी नहीं हैं. तो मैं इस चीज को बैज ऑफ ऑनर की तरह लेता हूं. मैं सोचता हूं कि मेरे बाकी लीड एक्टर्स के पास यह है और मेरे पास इतने फॉलोवर्स न होकर भी मैं लीड एक्टर हूं. तो मतलब मैं अपने काम में अच्छा हूं. पर लोगों को थिएटर तक लाने के लिए मुझे यह बिल्ड करना पड़ेगा. हां, अगर इनसाइड होता, तो ब्रांड बनाने में इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती. कई तो डेब्यू के पहले ही पॉप्युलर हो चुके हैं. सोशल मीडिया पर मुझसे भी ज्यादा फॉलोअर्स हैं. अगर लैला मजनू चल जाती तो यह फॉलोअर्स और अपना नाम बनाने और दर्शको तक पहुंचाने वाली बात सब अपने आप हो जाता लेकिन जब तक ऐसा नहीं हो रहा है और सर्वाइवल की बात आती है. हम एक्टर्स हैं और हमारे अंदर इनसिक्यॉरिटी होती है कि अगर मैं 2 दिन नहीं दिखा, तो कहीं गायब न हो जाऊं. 

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जमीन तलाशी है, दौड़ना बाकी है 

कुछ सालों में यह फर्क आया है कि मुझे कास्टिंग के लिए पहले भागना पड़ता था. अब कास्टिंग डायरेक्टर्स खुद ऑडिशन के लिए बुलाते हैं. तो कह सकते हैं कि फिलहाल मुझे यहां जमीन मिल गई और मैं पैरों पर खड़ा हो गया हूं लेकिन अभी चलना और दौड़ना बाकी है.जब आप सालों इंडस्ट्री के बाहर रहते हैं तब आपको लगता है कि सिस्टम सही नहीं है. जब मैं अंदर आ गया हूं तब भी देखता हूं कि सिस्टम सही तो नहीं है लेकिन अगर आप अच्छा काम करेंगे तो आपको उसका फायदा जरूर होगा.अभी तो फिलहाल मैं दुबई टू डोंगरी में गैंगस्टर का रोल निभा रहा हूं, जिसे फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी प्रड्यूस की प्रड्यूस कर रहे हैं. यह बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है. 

 

 

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