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भोजपुरी

भोजपुरी सिनेमा के 'जनक' जिन्हें अंग्रेज देने वाले थे फांसी... 65 की उम्र में कह गए अलविदा

aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 24 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:12 PM IST
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फेमस दिवंगत एक्टर नजीर हुसैन की चर्चा एक बार फिर हो निकली है. हाल ही में एक पॉडकास्ट में निरहुआ उर्फ दिनेश लाल यादव ने इनका जिक्र किया और बताया कि कैसे नजीर की वजह से भोजपुरी सिनेमा का जन्म हुआ. और इसी वजह से उन्हें भोजपुरी सिनेमा का पितामह और जनक कहा जाने लगा.

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निरहुआ बोले- भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत हुई नजीर हुसैन जी की बनाई गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो से. और वो हमारे देश को जो उस वक्त के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद थे, उन्होंने उनको कहा था. दोनों की फ्लाइट में मुलाकात हुई थी, जहां राष्ट्रपति जी ने कहा कि तुम भोजपुरी मूल के हो इसी भाषा में फिल्म बनाओ. वो बहुत शानदार थी, जबरदस्त मेगा हिट थी.

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निरहुआ के जिक्र करने के बाद एक बार फिर नजीर की याद ताजा हो गई है. भोजपुरी सिनेमा की शुरुआत करने वाले नजीर हुसैन को कभी अंग्रेजों ने फांसी की सजा सुनाई थी. लेकिन वो चकमा देकर निकल आए और फिर भोजपुरी सिनेमा के पितामह कहलाए. वो कैसे आइये आपको बताते हैं.

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नजीर ने गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ईबो से भोजपुरी सिनेमा की न सिर्फ शुरुआत की थी, बल्कि पहली ही फिल्म से इसे अपनी पहचान भी दिली दी थी. फिल्म ने लंबे समय तक ना सिर्फ बिहार-यूपी बल्कि मुंबई के सिनेमाघरों में भी लगी रही थी. इसने उस समय के सभी बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के रिकॉर्ड को तोड़ दिया था.

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अफसोस की बात ये कि नजीर साहब को बावजूद अपने योगदान के कभी कोई सम्मान नहीं मिला. नजीर हुसैन हिंदी सिनेमा के भी मशहूर कैरेक्टर आर्टिस्ट रहे. ज्यादातर वो देव आनंद की फिल्मों में नजर आए. उनके काम की सराहना हमेशा हुई.

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15 मई 1922 को जन्में प्रेम नजीर को सिनेमा के कद्रदान आज भी 'ज्वेल थीफ', 'चरस', 'दो बीघा जमीन', 'देवदास', 'कश्मीर की कली' और 'राम और श्याम' जैसी फिल्मों के लिए याद करते हैं. नजीर हुसैन ने करीब 500 हिंदी फिल्मों में काम किया. किसी फिल्म में पिता बनते, तो किसी में चाचा तो किसी में पुलिसवाले.

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नजीर हुसैन को पिता की बदौलत रेलवे में नौकरी मिली, लेकिन उसमें उनका मन नहीं लगा और वो ब्रिटिश आर्मी में शामिल हो गए. वो स्वतंत्रता सैनानी के तौर पर आजादी की जंग में शामिल हुए. पर उसी दौरान उन्हें दूसरे विश्व युद्ध में लड़ने के लिए भेज दिया गया. 

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नजीर को युद्ध के दौरान बंदी बना लिया गया और जेल में कैद कर दिया गया. वो कभी मलेशिया की जेल मे कैद रहे तो कभी सिंगापुर की जेल में बंद रहे. फिर उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का हाथ थामा. वो अंग्रेजों के खिलाफ गुस्से से भर चुके थे. नजीर हुसैन दूसरे विश्व युद्ध में भी लड़े थे.

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बताया जाता है कि, नजीर ने अंग्रेजों की खिलाफत की तो उन्हें और आजाद हिंद फौज के अन्य साथियों को जेल में डाल दिया और नजीर को सजा-ए-मौत सुना दी. उन्हें लाल किला में फांसी दी जानी थी. लेकिन वो चकमा देकर बच निकले. 

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आजादी के बाद नजीर नाटकों में काम करने लगे. यहीं से उनके फिल्मों का सफर शुरू हुआ. नजीर का देहांत 16 अक्टूबर 1987 को हार्ट अटैक से हुआ था. बताया जाता है कि पत्नी की मौत के बाद नजीर अकेलेपन के दौर से गुजर रहे थे, वो उनका जाना सह नहीं पा रहे थे. 
 

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