अहमदाबाद निकाय चुनाव: 55 साल बाद BJP के गढ़ में कांग्रेस की सेंध, चारों उम्मीदवार जीते

अहमदाबाद महानगरपालिका चुनाव में BJP ने भले ही भारी जीत दर्ज की हो, लेकिन खाड़िया सीट पर ऐतिहासिक हार मिली है. 55 साल से ज्यादा समय से BJP का गढ़ रहे इस इलाके में पहली बार कांग्रेस ने क्लीन स्वीप किया है. इसके पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं.

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अहमदाबाद में BJP ने 160 सीटें जीती हैं, लेकिन खाड़िया में कांग्रेस इतिहास रच गई है. (Photo: Representational) अहमदाबाद में BJP ने 160 सीटें जीती हैं, लेकिन खाड़िया में कांग्रेस इतिहास रच गई है. (Photo: Representational)

अतुल तिवारी

  • अहमदाबाद,
  • 29 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:35 PM IST

अहमदाबाद महानगर पालिका के घोषित परिणामों में भाजपा ने 192 में से 160 सीट पर जीत हासिल की है. कांग्रेस के खाते में 32 सीट गई. लेकिन भाजपा की इस प्रचंड जीत के बावजूद खाड़िया वार्ड से भाजपा की हुई हार ने सबका ध्यान खींचा है. 57 सालों से भाजपा का गढ़ रहे खाड़िया से पहली बार बीजेपी के सभी उम्मीदवारों की हार हुई. कांग्रेस के चारों उम्मीदवार जीत गए.

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अहमदाबाद शहर का खाड़िया भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है. भाजपा ने विजय की शुरुआत यहीं से की थी. इसके बाद एक-एक कर भाजपा ने अहमदाबाद पर कब्जा जमाया और आज शहर में चारों तरफ भाजपा अपना भगवा लहरा रहा है. भाजपा खाड़िया में साल 1969 से लगातार साल 2021 तक चुनाव जीतती रही. लेकिन इस चुनाव में अपना गढ़ खाड़िया खो दिया. 

खाड़िया से कांग्रेस के चारों उम्मीदवार मीना नायक, बिरजू ठक्कर, ध्रुव कलापी, इलयास ख़ान की जीत हुई. बीजेपी के चारों उम्मीदवार हेतल नायक, श्वेतल शाह, परेश आनंद, पंकज भट्ट हार गए. खाड़िया के पूर्व विधायक और पूर्व पार्षद भूषण भट्ट ने कहा, ''खाड़िया हारने का दुख है. लेकिन इस हार की एक नहीं, अनेक वजह है. यहां 40,000 हिंदू, 33,000 अल्पसंख्यक वोटर हैं.'' 

भूषण भट्ट कहना है कि राजस्थानी समुदाय समेत कई वोटर वेकेशन, शादी समेत कारणों से वोटिंग के दिन मौजूद नहीं थे. गर्मी की वजह से कई लोग वोट करने नहीं निकले. दोपहर के समय मतदान ना के बराबर हुआ. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के विधायक इमरान खेड़ावाला ने अल्पसंख्यक समुदाय को उकसाया, जिसकी वजह से शाम 4 बजे के बाद बूथों पर लंबी कतारें दिखीं. 

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उनके मुताबिक, अंतिम दो घंटों में अल्पसंख्यक समुदाय की बड़ी भागीदारी ही हार का बड़ा कारण बनी. प्रचार के दौरान दिए गए बयानों पर भी सवाल उठे. भूषण भट्ट ने पहले कहा था कि खाड़िया को पाकिस्तान नहीं बनने दिया जाएगा. इस पर उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया, जिससे कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को संगठित कर लिया.

इसका असर वोटिंग पर पड़ा. टिकट वितरण को लेकर भी नाराज़गी सामने आई. भूषण भट्ट, मयूर दवे और कृष्णवदन ब्रह्मभट्ट जैसे नेताओं के परिजनों को टिकट नहीं दिए जाने से असंतोष था. माना जा रहा है कि इस नाराज़गी का असर चुनाव नतीजों पर पड़ा और भाजपा को अपने ही गढ़ में नुकसान उठाना पड़ा. इसके अलावा SIR भी भाजपा के लिए एक चुनौती बनकर सामने आया. 

खाड़िया में 20,000 से अधिक वोटरों के नाम कटने की बात कही जा रही है. वहीं, पिछली बार AIMIM की मौजूदगी से कांग्रेस को नुकसान हुआ था, लेकिन इस बार उसके मैदान में नहीं होने से कांग्रेस का वोट नहीं बंटा और उसे सीधा फायदा मिला. स्थानीय मुद्दों की बात करें तो खाड़िया में कमर्शियल डेवलपमेंट बढ़ने से भी लोगों में नाराज़गी बताई जा रही है. 

भूषण भट्ट ने कहा कि इन मुद्दों को पार्टी के सामने उठाया था, लेकिन उस पर क्या कार्रवाई हुई, यह पार्टी ही जानती है. कुल मिलाकर, अहमदाबाद में भाजपा की बड़ी जीत के बीच खाड़िया की हार ने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार चयन और वोटिंग पैटर्न जैसे कारक किसी भी मजबूत गढ़ को हिला सकते हैं. कांग्रेस के लिए यह जीत मनोवैज्ञानिक बढ़त है.

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