1990 के दशक में और इस सदी की शुरुआत में, पीएमके और AIADMK ने तमिलनाडु में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था. उस समय डॉ. एस. रामदास के पास पीएमके की पूरी कमान थी. वीके शशिकला जयललिता की करीबी सहयोगी के रूप में AIADMK में पीछे से फैसले लेती थीं. अब किस्मत ने दोनों पुराने नेताओं के लिए पलटी मारी है. 2026 के चुनाव में दोनों अपनी प्रासंगिकता के लिए लड़ रहे हैं.
रामदास अब पीएमके के एक टूटे हुए गुट के मुखिया हैं. उनके बेटे डॉ. अंबुमणि रामदास के पास पार्टी का निशान ’आम’ है. अंबुमणि तमिलनाडु में एनडीए का हिस्सा हैं. वे AIADMK और बीजेपी के साथ समझौते में राज्यसभा गए हैं. शशिकला ने हाल ही में ऑल इंडिया पुरात्ची थलाइवर मक्कल मुन्नेत्र कझगम (AIPTMMK) बनाया है. लेकिन आय से अधिक संपत्ति के केस में जेल जाने के कारण, वे 2027 तक चुनाव नहीं लड़ सकतीं.
दोनों पार्टियां तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही हैं. यह मिशन राजनीतिक नहीं है. यह बहुत निजी है. रामदास को अपने बेटे अंबुमणि से हिसाब चुकता करना है. इसलिए वे वन्नियार वोट को बांटने के लिए हर संभव कोशिश करेंगे.
शिकला की एडप्पडी पलानीस्वामी से दुश्मनी और भी पुरानी है. जेल जाने से पहले उन्होंने ईपीएस को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. लेकिन ईपीएस ने उन्हें AIADMK से बाहर कर दिया, और वापसी की हर कोशिश रोकी.
शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन भी एनडीए में शामिल हो गए हैं. शशिकला दक्षिण तमिलनाडु में प्रचार करेंगी. खासकर अपनी थेवर कम्युनिटी में वो प्रचार करेंगी. उनका लक्ष्य है कि एनडीए को वोट न मिले.
शशिकला के पास अब राजनीतिक ताकत या विश्वसनीयता नहीं बची है. रामदास को भी लोग चुका हुआ मानते हैं. लेकिन चुनाव में करीबी मुकाबला होने वाला लगता है. प्रत्येक वोट जो एनडीए से छिनेगा, वह डीएमके के लिए फायदेमंद होगा. इससे यह अटकलें लग रही हैं कि क्या इन दोनों नेताओं को एनडीए के वोट बांटने के लिए आगे किया गया है?
भारत की राजनीति में वोट कटुआ नए नहीं हैं. 2015 में चेन्नई में सबसे भयानक बाढ़ आई थी. जयललिता सरकार नाकाम रही. लेकिन छह महीने से भी कम समय में, AIADMK फिर सत्ता में लौट आई. उसने तमिलनाडु की 30 साल पुराना ट्रेंड तोड़ा था.
जयललिता ने छोटी पार्टियों का थर्ड फ्रंट बनाया. जिसमें वाइको की एमडीएमके, विजयकांत की डीएमडीके, तमिल मनिला कांग्रेस, वीसीके और दो वाम दल शामिल थे. बीजेपी और पीएमके अलग-अलग लड़े.
इसका नजीजा रहा कि AIADMK को 40.8% वोट मिले. डीएमके को 39.8% वोट मिले. केवल 1% वोट के अंतर से 38 सीटों का फर्क पड़ा. AIADMK ने 136 सीटें जीतीं. डीएमके-कांग्रेस गठबंधन को 98 सीटें मिलीं. थर्ड फ्रंट ने एक भी सीट नहीं जीती. लेकिन उसने 6.1% वोट ले लिए.
क्या छोटी पार्टियां डालेंगी बड़ा इम्पैक्ट?
अब स्टालिन भी जयललिता की तरह दूसरी बार लगातार मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं. वे छोटी पार्टियों पर फोकस कर रहे हैं. सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस (एसपीए) में अब 20 से ज्यादा सहयोगी हैं. 2021 में यह संख्या 13 थी. डीएमडीके और कमल हासन की एमएनएम नई हैं. स्टालिन ने छोटी पार्टियों को जगह दी है. ये पार्टियां किसी जिले या दो जिलों में खास कम्युनिटी पर असर रखती हैं.
जैसे पश्चिमी तमिलनाडु के गौंडर इलाके में कोंगुनाडु मक्कल देसिया कटची (केएमडीके) प्रभावशाली है. इसकी वजह से 2024 लोकसभा चुनाव में डीएमके गठबंधन ने वहां सभी सीटें जीतीं. केएमडीके इस बार डीएमके के निशान पर दो सीटें लड़ेगी.
इसी तरह मनिथनेय मक्कल कटची (एमएमके). यह रामनाथपुरम में मुस्लिम इलाकों में प्रभाव रखती है. यह भी दो सीटों पर उगते सूरज के निशान पर लड़ेगी. वीसीके दलित कम्युनिटी को अपील करती है. यह उत्तरी तमिलनाडु में पीएमके के खिलाफ है. प्रेमलता विजयकांत और कमल हासन की पार्टियां शहरी वोट के लिए हैं. ये एक्टर विजय की टीवीके को टक्कर देने के लिए हैं.
यह ऐसा है जैसे स्टालिन सीएन अन्नादुराई की बात को अमल में ला रहे हैं. अन्ना ने कहा था – "पड़ोसी के बगीचे का चमेली का फूल भी महकता है." स्टालिन एसपीए का गुलदस्ता बनाने के लिए फूल इकट्ठा कर रहे हैं.
लेकिन इतने सारे सहयोगी होना क्या घबराहट दिखाता है? या जोखिम कम करने की कोशिश है? एंटी-इनकंबेंसी होगी. इसलिए स्टालिन चौड़ी सेक्युलर गठबंधन से वोट जोड़ना चाहते हैं. लेकिन समस्या यह है. कई सहयोगी नाराज हैं. उन्हें कम सीटें मिली हैं. कुछ को अपनी जगह डीएमके का निशान इस्तेमाल करना पड़ा. उदाहरण: वैको की एमडीएमके को इस बार 4 सीटें मिलीं. 2021 में 6 थीं. तीन सीटों पर उगता सूरज निशान होगा. एक सीट पर अपना पुराना चरखा निशान रहेगा. यह एमडीएमके को डीएमके का एक छोटा ठिकाना बना देता है.
दूसरा, दोनों गठबंधनों में पहले भी साथियों में मतभेद रहे हैं. वोट ट्रांसफर आसान नहीं होगा. एसपीए में डीएमके और डीएमडीके पुराने दुश्मन थे. एनडीए में ईपीएस और दिनाकरन के बीच हाल में कोई प्यार नहीं रहा. हाल ही में डीएमके को कांग्रेस की टीवीके वाली चाल पसंद नहीं आई. कांग्रेस ने इससे ज्यादा सीटें हासिल कीं.
तमिलनाडु में कहा जाता है कि गठबंधन के बिना जीतना मुश्किल है. लेकिन टीवीके अकेली खड़ी है. वह तमिलनाडु और पुडुचेरी में अकेले लड़ेगी. मजेदार बात यह है. विजय भी जयललिता से प्रेरणा लेंगे. क्योंकि 2016 में AIADMK ने अकेले अपने दो पत्ती के निशान पर सभी 234 सीटों पर जीत हासिल की थी.
टी एस सुधीर