फूलन देवी की बहन के बहाने अखिलेश का 'डबल-M' दांव, बीजेपी को क्या दे पाएंगे चोट?

सपा प्रमुख अखिलेश यादव 2027 की सियासी जंग फतह करने के लिए अपने समीकरण को दुरुस्त करने में जुट गए हैं. सपा के महिला सभा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी की नियुक्ति हुई है, जिसके जरिए अखिलेश ने डबल-एम दांव चला है.

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अखिलेश यादव ने फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी को बनाया महिला सभा का अध्यक्ष (Photo-SP) अखिलेश यादव ने फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी को बनाया महिला सभा का अध्यक्ष (Photo-SP)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 26 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:17 PM IST

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए भले ही अभी एक साल का समय बचा हुए हो, लेकिन सियासी समीकरणों को साधे जाने लगे हैं. बेहमई नरसंहार के साढ़े चार दशक के बाद फूलन देवी यूपी की सियासत में अहम बनी हुई है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने 'पीडीए' फॉर्मूले को मजबूती से बनाए रखने के लिए पूर्व सांसद फूलन देवी की बड़ी बहन रुक्मिणी देवी निषाद को समाजवादी महिला सभा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है.  

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अखिलेश यादव ने महिला सभा के प्रदेश अध्यक्ष नियुक्ति की है, जिसे आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों को देखते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी के बहाने अखिलेश यादव ने 'डबल-M'दांव चला है. 

सपा ने महिला नेतृत्व को सशक्त बनाने को लेकर एक बड़ा बदलाव किया है, जिसके सहारे एक तरफ  महिलाओं को साधने के तो दूसरी तरफ मल्लाह समुदाय को सियासी संदेश दिया है. रुक्मिणी देवी मल्लाह समुदाय से आती हैं, जो बीजेपी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है. ऐसे में अखिलेश यादव ने सपा को 2027 के चुनाव में चोट देने के लिए फूलन देवी की बहन पर बड़ा दांव खेला है. 

फूलन देवी की बहन के बहाने महिला वोटर को संदेश
फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी की नियुक्ति को पार्टी की महिला भागीदारी बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. रुक्मिणी देवी का सपा से पुराना जुड़ाव रहा है. वह संगठन के लिए जमीनी स्तर पर सक्रिय रूप से काम करती रही हैं. अखिलेश यादव ने पिछले दिनों उन्हें एक स्कॉर्पियो गाड़ी भी उपलब्ध कराई थी ताकि क्षेत्र में दौरा कर सकें. 

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रुक्मिणी देवी निषाद जालौन के शेखपुर गुड्डा (पुरवा) गांव से हैं. वो काफी समय से सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रही हैं. उनकी पहचान चर्चित दस्यु सुंदरी और बाद में सांसद रहीं फूलन देवी की बड़ी बहन के रूप में रही है, जिससे उन्हें जातीय और सियासी दोनों स्तरों पर पहचान बनाई है. फूलन देवी को सियासत में लाने का काम मुलायम सिंह यादव ने किया है और सपा से सांसद रही है. 

फूलन देवी की बहन को अखिलेश ने आगे कर अतिपिछड़ी जाति की महिलाओं को सियासी संदेश दिया है. फूलन देवी के साथ सामंतवादियों ने काफी अत्याचार किए थे, जिसके चलते वो बंदूक उठाई थी और सामंतवाद के खिलाफ संघर्ष किया था. दलित और पिछड़ी जाति के महिलाओं के बीच फूलन देवी की अपनी लोकप्रियता रही है, जिन्हें मल्लाह समुदाय अपने मसीहा के तौर पर देखा था. सपा की इस कोशिश को फूलन देवी के बहाने सूबे के मल्लाह समुदाय को राजनीतिक संदेश देने के तौर पर देखा. 

अखिलेश ने मल्लाह वोटों को साधने के लिए चला बड़ा दांव
फूलन देवी मल्लाह समुदाय से आती थीं. ऐसे में मल्लाह समुदाय की उपजातियां काची, बिंद, मल्लाह और निषाद समुदाय के बीच काफी लोकप्रिय रहीं. फूलन देवी सासंद बनीं और यही वह दौर था जब मल्लाह समुदाय सपा का परंपरागत वोटर बन गया था,  लेकिन बीजेपी इन्हीं अति पिछड़ी जातियों के वोट के सहारे 2017 से चुनाव जीत रही हैं.  अब अखिलेश यादव ने फिर से मल्लाह वोटों को साधने के लिए फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी निषाद को आगे किया है. 

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सपा के इस  कदम  को अखिलेश यादव के उस PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है, जिसे पार्टी ने अपनी राजनीतिक रीढ़ बना रखा है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक मल्ला समाज, उत्तर प्रदेश में एक महत्वपूर्ण मतदाता है, जिसके चलते यह नियुक्ति की गई है.  

रुक्मिणी देवी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर निषाद समाज को साधने और पिछले चुनावों में बिखरे वोटों को एकजुट करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है और ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी चुनावों में बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है. 

उत्तर प्रदेश में मल्लाह वोटर इतने अहम क्यों है? 
उत्तर प्रदेश की 50 फीसदी से अधिक पिछड़ी आबादी में तकरीबन 6 फीसद निषाद हैं जो अति पिछड़ी उपजातियों में माने जाते हैं. मोटे तौर पर देखें तो निषादों में 150 से ज्यादा उप जातियां हैं और पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश के 18 जिलों में इनकी अच्छी-खासी तादाद है. लेकिन, निषाद समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं का दावा है कि राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से उनके समाज का 160 सीटों पर ठीक-ठाक प्रभाव है और इन सीटों पर 60 हजार से लेकर एक लाख तक वोट निषाद समाज का है.

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गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद ,फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिले में निषाद वोटरों की संख्या अधिक है.निषाद समाज अपने मजबूत वोटबैंक से बड़े राजनीतिक दलों का खेल कई सीटों पर बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. यही कारण रहा है कि निषाद समाज के वोटबैंक पर सभी राजनीतिक पार्टियों की सदैव नजर रही है. 

बीजेपी ने निषाद वोटों के लिए संजय निषाद की पार्टी के साथ गठबंधन कर रखा है तो सपा ने निषाद समाज की आईकॉन माने जाने वाली फूलन देवी की बड़ी बहन रुक्मिणी देवी निषाद को संगठन में अहम पद सौंपा है. बीजेपी हो या फिर सपा व अन्य दल, सभी का प्रयास है कि निषाद समाज उनके साथ रहे. इन्हें भी किसी बड़ी पार्टी के साथ जाने में कोई गुरेज नहीं है, लेकिन निषाद भी अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने के लिए इसकी बड़ी कीमत वसूलने की कोशिश में भी हैं. ऐसे में देखना है कि सपा का यह दांव बीजेपी के खिलाफ कितना सफल रहता है? 

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