कहानी उस दिव्यांग लड़की की, जिसने ब्रेन पर कंट्रोल करके निकाल लिया NEET

गोरखपुर की रहने वाली यशी कुमारी सेरेबल पाल्सी से पीड़ित एक लड़की है, लेकिन उसने अपनी इच्छा शक्ति से वो कर दिखाया जो आम तौर पर किसी सामान्य स्टूडेंट के लिए बेहद कठिन है. यशी न तो ठीक से चल सकती है और न दाएं हाथ से कोई काम कर सकती, लेकिन उसने अपने बाएं हाथ से लिखने और दूसरे काम का अभ्यास किया और नीट पास कर लिया.

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परिजनों के साथ यशी परिजनों के साथ यशी

पंकज श्रीवास्तव

  • प्रयागराज,
  • 17 नवंबर 2022,
  • अपडेटेड 10:40 AM IST

ये कहानी एक ऐसी ही लड़की की है, जिसके बड़ी शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद के हौसले से न सिर्फ डॉक्टर बनने के अपने सपने को साकार किया है बल्कि दिव्यांग बच्चों के लिए बड़ी मिसाल भी पेश की है. गोरखपुर की रहने वाली यशी कुमारी सेरेबल पाल्सी से पीड़ित एक लड़की है, लेकिन उसने अपनी इच्छा शक्ति से वो कर दिखाया जो आम तौर पर किसी सामान्य स्टूडेंट के लिए बेहद कठिन है.

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यशी का बचपन से सपना था कि वो बड़ी होकर डॉक्टर बने और हाल में उसने नीट क्वालीफाई कर उस सपने को सच कर दिखाया है. दाएं हाथ और पैर से दिव्यांग यशी न तो ठीक से चल सकती है और न दाएं हाथ से कोई काम कर सकती, लेकिन उसने अपने बाएं हाथ से लिखने और दूसरे काम का अभ्यास किया और नीट पास कर कोलकाता के नामचीन मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया.

यशी कहती है कि भले ही उसका हाथ और पैर खराब है लेकिन वो अपने ब्रेन से सब पर कंट्रोल कर सकती है, वो कहती है जब वो दिमाग से ऐसी नहीं है तो मेरा पैर मुझे कैसे रोक सकता है. यशी बताती है कि इस बीमारी के कारण उसे तमाम लोगों के ताने भी सुने, लेकिन उसने अपना हौसला नहीं खोया. इस सफलता के लिए उसने खुद पर विश्वास बनाये रखा, मेहनत की और उन लोगों की बातों को अनदेखा किया जो ये समझते थे कि वो एक दिव्यांग लड़की है और जीवन मे कुछ नहीं कर सकती.

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यशी बताती है कि सफलता के लिए उसने अपने समय और दिनचर्या को तय कर लिया था और कड़ाई से उसपर चलती रही. इसी जिद और जुनून के चलते उसने अपने वो मुकाम हासिल किया, जो अब तक सेरेबल पाल्सी से पीड़ित एक या दो बच्चे ही हासिल कर पाए थे. गोरखपुर के झुनिया तहसील के मुंडेरा गांव की रहने वाली यशी एक बेहद सामान्य परिवार से है. उसके पिता एक सामान्य टैक्सी ड्राइवर हैं. यशी की एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई है.

बावजूद इसके पिता मनोज कुमार सिंह ने बच्चो की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी. यशी ने गोरखपुर के लिटिल फ्लावर स्कूल से मैट्रिक और रिलायंस एकेडमी से इंटर किया. हाईस्कूल पास करने के बाद यशी के पिता मनोज कुमार सिंह ने यशी को नीट की कोचिंग के लिए राजस्थान के कोटा भेजा, हालांकि यशी की कोचिंग के लिए उसका इलाज करने वाले डॉक्टर जितेंद्र जैन सहित कई लोगों ने मदद भी की.

यशी के पिता मनोज बताते हैं कि यशी को यहां पहुंचाने के लिए पूरे परिवार ने लंबा संघर्ष किया, लोगों के ताने भी सुने, बावजूद इसके यशी के जिद और जुनून ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया. यशी के पिता ने उसका सपना पूरा करने के लिए घर छोड़ दिया, उसका इलाज करवाया, अच्छे से अच्छे स्कूल में उसकी शिक्षा दिलाई और आज जब यशी डॉक्टर बनने की राह पर निकल चुकी है. यशी अपने संघर्ष की कहानी सुनाते भावुक भी हो जाती है. 

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यशी का इलाज करने वाले डॉक्टर जितेंद्र जैन कहते हैं कि यशी शुरू से बहुत इंटेलिजेंट थी, यशी 6 साल की उम्र में उनके पास इलाज के लिए आई थी, उस समय यशी के हाथ पैर सीधे नहीं थे और इस तरह की बीमारी में शरीर पर केवल माइंड से कंट्रोल किया जा सकता है, यशी ने अपनी इच्छा शक्ति से अपने शरीर पर नियंत्रण करना सीख लिया.

आम तौर पर सेरेबल पाल्सी के बारे में कम लोग ही जानते होंगे, लेकिन ये एक ऐसा रोग है जिसमें मस्तिष्क के असामान्य विकास से लेकर बड़े पैमाने पर शारीरिक दिव्यांगता होती है. इस रोग के पेशेंट का जीवन बेहद कठिन भरा हो सकता है, हालांकि यशी के ब्रेन में कोई दिक्कत नहीं रही और यशी ने अपने हौसले से वो कर दिखाया जो कोई सोच भी नहीं सकता था.

 

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