नर्सरी एडमिशन: सरकार की नीतियों का खामियाजा क्यों भुगते बच्चे

नर्सरी एडमिशन एक बहुत बड़ा मुद्दा बन गया है. सरकार की बार-बार बदलती नीतियों से अभिवावक तो परेशान हो ही रहे हैं, साथ ही इससे बच्चों के भविष्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है.

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सरकार की नीतियों का खामियाजा क्यों भुगते बच्चे सरकार की नीतियों का खामियाजा क्यों भुगते बच्चे

रोशनी ठोकने

  • नई दिल्ली,
  • 17 जनवरी 2017,
  • अपडेटेड 10:42 PM IST

देश की राजधानी दिल्ली में नर्सरी दाखिला आसान नहीं है, दाखिले की प्रक्रिया को मुश्किल बनाया है हर साल बदलते दाखिले के नियमों ने. सरकार अभिभावकों की दिक्कत के लिए स्कूलों को जिम्मेदार ठहराती है, जबकि स्कूलों का तर्क है कि बार-बार बदलते नियमों की वजह से स्कूल और अभिभावक दोनों परेशान होते हैं.


राजधानी के किसी भी स्कूल के बाहर चले जाइए...लगभग तस्वीर एक सी होगी. कहीं प्वॉइंट सिस्टम की माथापच्ची, तो कहीं दस्तावेजों की उलझन, कहीं अपर एज पर कंफ्यूजन तो कहीं ऑनलाइन-ऑफलाइन की एबीसीडी और इन सबके बीच वो नन्हे-मुन्ने जो स्कूल में अपना पहला कदम रखना चाहते हैं... लेकिन जब देश की राजधानी में ही नर्सरी दाखिले की प्रक्रिया इतनी जटिल हो तो अभिभावक के पास स्कूलों के चक्कर लगाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखता.

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अब सवाल उठता है कि अभिभावकों की इस मुश्किल का जिम्मेदार कौन? क्या नर्सरी दाखिले की उलझी हुई प्रक्रिया के लिए स्कूलों को जिम्मेदार ठहराया जाए या फिर सरकार जो बार-बार दाखिले के लिए नए नियम लागू करती है और मामला कोर्ट पहुंच जाता है.

इस साल भी मामला कोर्ट में है. लेकिन ये पहली बार नहीं है जो बदलते नियमों की वजह से दाखिले का पेंच अटका है. चलिए आप को बताते हैं कि कब-कब और कैसे नर्सरी दाखिले के नियम कभी सरकार की नीतियों तो कभी कोर्ट के आदेशों के बाद बदलते रहे...

- साल 2004 के पहले तक स्कूलों के पास अधिकार था कि दाखिले के लिए बच्चे और उसके माता-पिता का साक्षात्कार कर सकते थे. सरकारी जमीन पर बने स्कूलों की 20 फीसदी सीटें EWS कोटे के बच्चों के लिए आरक्षित थी.
- साल 2004 में राकेश अग्रवाल नाम के अभिभावक ने दाखिले की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी.
- साल 2007 में हाई कोर्ट ने दाखिले में स्क्रीनिंग और साक्षात्कार को खत्म करते हुए अशोक गांगुली कमिटी बनाई. गांगुली कमिटी ने नेबरहुड, सिबलिंग, पेरेंट्स एजुकेशन जैसे क्राइटेरिया के आधार पर 100 प्वॉइंट फॉर्मूला बनाया.
- साल 2007 में एक्शन कमिटी फॉर अनऐडेड रिकॉग्नाइज्ड प्राइवेट स्कूल ने सुप्रीम कोर्ट में गांगुली कमिटी की सिफारिशों को चुनौती दी.
- साल 2008 में थोड़े बदलाव के साथ गांगुली कमिटी की सिफारिशें नर्सरी दाखिले में लागू कर दी गईं, जिसमें स्कूलों को क्राइटेरिया निर्धारित करने की छूट थी.
- साल 2008 से 2010 तक गांगुली कमिटी की सिफारिशों के आधार पर स्कूलों में दाखिला होता था.
- साल 2010 में 'राइट टू एजुकेशन एक्ट' लागू हुआ और EWS कोटा 20 फीसदी से बढ़कर 25 फीसदी हो गया.
- साल 2010 में गांगुली कमिटी की सिफारिशों के आधार पर नर्सरी दाखिले के लिए स्कूलों ने फिर से गाइडलाइन जारी किए लेकिन सोशल ज्यूरिस्ट संस्था ने स्कूलों के प्वॉइंट और क्राइटेरिया सिस्टम को अदालत में चुनौती देते हुए 'राइट टू एजुकेशन एक्ट' लागू करने की मांग की.
- मामला कोर्ट में लंबित रहा और स्कूलों ने साल 2010 से 2013 तक एक बार फिर गांगुली कमिटी की सिफारिशों के आधार पर दाखिले किए, जिसमें मैनेजमेंट कोटा, स्टाफ कोटा शामिल था.
- फरवरी 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट ने नर्सरी दाखिले को 'राइट टू एजुकेशन एक्ट' से बाहर रखते हुए कहा कि नर्सरी दाखिला 6 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए है.
- दिसम्बर 2013 में राष्ट्रपति शासन के दौरान एलजी ने 70 प्वॉइंट नेबरहुड फॉर्मुले के साथ गाइडलाइन जारी किया और नर्सरी दाखिले से मैनेजमेंट कोटा समाप्त कर दिया.
- एलजी के नोटिफिकेशन को प्राइवेट स्कूलों ने एक बार फिर कोर्ट में चुनौती दी और दाखिले की प्रक्रिया मार्च 2014 तक खींच गईं.
- नवम्बर 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एलजी द्वारा जारी की गई गाइडलाइन को खारिज करते हुए एक बार फिर अशोक गांगुली कमिटी की सिफारिशों के आधार पर दाखिला करने की मंजूरी दी. हालांकि सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन तब तक स्कूलों में नर्सरी दाखिले स्कूलों द्वारा जारी किए गए क्राइटेरिया के आधार पर हो चुके थे.
- नवम्बर 2015 में आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली स्कूल एजुकेशन बिल पास किया लेकिन केन्द्र की मंजूरी नहीं मिली. 2015 में सरकार ने मैनेजमेंट कोटा खत्म करते हुए गाइडलाइन जारी किए, जिसके खिलाफ स्कूलों ने हाईकोर्ट का रुख किया. फैसला स्कूलों के पक्ष में आया.
- साथ ही EWS कोटे के लिए नवम्बर 2015 में सरकार ने सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया शुरू की.
दिसम्बर 2016 में दिल्ली सरकार ने निजी जमीन पर बने 1400 स्कूलों के लिए अलग गाइडलाइन जारी की और जनवरी 2017 में सरकारी जमीन पर बने 298 स्कूलों के लिए 0-1 किमी के दायरे में नेबरहुड को अनिर्वाय दाखिला देने वाली गाइडलाइन जारी करते हुए मैनेजमेंट कोटा, स्टाफ कोटा, एलुमनी जैसे क्राइटेरिया खत्म कर दिए. जिसके बाद मामला एक बार फिर कोर्ट में है. गौरतलब है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए कहा है कि सरकार दाखिले की गाइडलाइन नवम्बर-दिसम्बर में ही क्यों जारी करती है, इससे अभिभावकों का कंफ्यूजन बढ़ता है.

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गौरतलब है कि राजधानी में पहली बार प्राइवेट स्कूलों के लिए दो अलग तरह की गाइडलाइन जारी की गई. सरकार के मुताबिक नए दिशा-निर्देशों से दाखिले में पारदर्शिता आएगी. लेकिन स्कूलों की मानें तो सरकार अभिभावकों की उलझने सुलझाने के बजाय बढ़ा रही है. जानकारों की मानें तो दाखिले के इस दंगल से बचने के लिए सरकार, स्कूल एसोसिएशन, अभिभावक संघ सभी को मिल-बैठकर एक कॉमन एडमिशन प्रोसेस बनाना चाहिए जो साल या सरकार बदलने के साथ ना बदले. इस साल तो मिशन एडमिशन कानूनी दांव-पेंच में उलझ गया है, लेकिन उम्मीद है कि नए सत्र में नर्सरी दाखिले की गाइडलाइन अभिभावकों की राह आसान करेगी.

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