जानें- देश के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के बारे में ये खास बातें..

देश के तीसरे राष्ट्रपति व शिक्षाविद डॉक्टर जाकिर हुसैन की आज जयंती है. जानें उनसे जुड़ी कुछ खास बातें...

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देश के तीसरे राष्ट्रपति व शिक्षाविद डॉक्टर जाकिर हुसैन देश के तीसरे राष्ट्रपति व शिक्षाविद डॉक्टर जाकिर हुसैन

प्रियंका शर्मा

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  • 08 फरवरी 2018,
  • अपडेटेड 5:49 PM IST

देश के तीसरे राष्ट्रपति व शिक्षाविद डॉक्टर जाकिर हुसैन की 121वीं जयंती है. वे सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद राष्ट्रपति पद पर पहुंचने वाले तीसरे राजनीतिज्ञ थे और साथ ही वे भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे. उनका कार्यकाल 13 मई 1967 से तीन मई 1969 तक रहा. उनका जन्म 8 फरवरी, 1897 को आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुआ था.

शिक्षा से उनका शुरू से ही गहरा लगाव रहा, जिसे देखते हुए गांधी जी ने 1937 में उन्‍हें उस राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का अध्यक्ष बनाया, जिसकी स्थापना गांधीवादी पाठ्यक्रम बनाने के लिए हुई थी. आगे चलकर जाकिर हुसैन ने उस बुनियादी शिक्षा के क्रमिक विकास को बढ़ावा दिया, जिसकी कल्पना गांधी जी ने की थी. डा. हुसैन भारत रत्न से भी सम्मानित किए हो चुके हैं.

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जाकिर साहब 23 वर्ष की उम्र में ही जामिया मिल्लिया के स्थापना दल के सदस्य बने. उन्होंने 1920 में अलीगढ़ में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की नींव रखी जो बाद में दिल्ली आ गया. साल 1969 में निधन के बाद उन्हें उसी परिसर में दफनाया गया जहां वे 1926 से 1948 तक वाइस चांसलर थे. उन्होंने 1920 में अलीगढ़ में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की नींव रखी जो बाद में दिल्ली आ गया.

बता दें, जाकिर साहब ने अपने तीन भाइयों के साथ इस्लामिया हाई स्कूल में शिक्षा ग्रहण की थी. अलीगढ़ विश्वविद्यालय से अर्थशास़्त्र में एम.ए.करने के बाद जाकिर साहब 1923 में जर्मनी चले गए. बर्लिन विश्वविद्यालय से उन्होंने पीएचडी की. बाद में सास 1948 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भी वी.सी. बने. वे सन 1956 तक उस पद पर रहे.

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कहानियां भी लिखते थे जाकिर साहब

कम ही लोग जानते हैं कि जाकिर साहब बच्चों की कहानियां भी लिखते थे. उन्होंने प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक रिपब्लिक का भी उर्दू में अनुवाद किया था. अपने अंतिम समय में वे रिपब्लिक का हिंदी में अनुवाद करवा रहे थे. उनके अनुवाद पर तब एक विद्वान ने टिप्पणी की थी कि यदि खुद प्लेटो को उर्दू में रिपब्लिक लिखनी होती तो वे भी वैसे ही लिखते जैसा जाकिर साहब ने अनुवाद किया है.

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