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एजुकेशन

जमीन के भीतर तेल क्यों छुपा रहा है भारत?

प्रज्ञा बाजपेयी
  • 29 जून 2018,
  • अपडेटेड 1:34 PM IST
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मोदी सरकार ने बुधवार को ओडिशा और कर्नाटक में दो अंडरग्राउंड ऑयल स्टोरेज बनाने का फैसला किया है. सरकार के इस कदम के पीछे सोची-समझी रणनीति है. दरअसल, 1990 में खाड़ी देशों के युद्ध के दौरान भारत ने आर्थिक संकट का सामना किया था. भारत अपने खनिज तेल की जरुरत का बड़ा भाग इराक और कुवैत से आयात करता था लेकिन 1990 के इराक-कुवैत युद्ध से भारत को तेल आयात संकट का सामना करना पड़ा. युद्ध के चलते तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला और भारत भी इसकी चपेट में आने से बच नहीं सका.

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अन्य देशों से ऊंचे दामों पर आयात करने से विदेशी मुद्रा कोष में तेजी से कमी हो रही थी, ऐसी स्थिति में जनता अत्यधिक महंगाई का सामना करना पड़ रहा था. भारत के पास उस समय केवल 3 दिनों तक के लिए तेल भंडार बचा था. इन वर्षों में भारत 1947 के बाद पहली बार भुगतान संतुलन संकट से जूझ रहा था.

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भारत ऊंची कीमतों का तेल खरीदने को मजबूर था और ऐसे में अप्रैल 1991 के अंत तक भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी कमी आई और यह 1.2 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था. अगर आप इस भयावह स्थिति का अंदाजा ना लगा पा रहे हों तो बता दें कि बीते सप्ताह (15 जून 2018) को देश का विदेशी मुद्रा भंडार 410.07 बिलियन डॉलर था.

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नीति में बदलाव की जरूरत-
हालांकि वर्तमान में 1991 में आए विदेशी मुद्रा भंडार संकट जैसी स्थिति नहीं है लेकिन तेल की कीमतों में अस्थिरता और अनिश्चितता को आसानी से भांपा जा सकता है. हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी ने सरकार को नीति में बदलाव करने को मजबूर किया.

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दीर्घकालीन हल-
तेल की समस्या का दीर्घकालीन हल निकालने के लिए भारत गुफाओं में तेल स्टोर करने की योजना बना रहा है. इन्हें रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स या SPR) कहा जाता है. इस बफर का उद्देश्य तेल की बाहरी कीमतों में उछाल आने या किसी अन्य परिस्थिति में तेल का आपूर्ति संकट से बचना है.

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देश में सुरक्षित तेल भंडार की योजना पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में बनाई गई थी. उस वक्त राम नाइक केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री थे.

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जमीन के अंदर तेल भंडार-

भारत के पास पहले से ही तीन अंडरग्राउंड स्टोरेज फैसिलिटी है. इन्हें 4100 करोड़ की लागत से बनाया गया था. इनमें करीब 5.33 मिलियन टन क्रूड ऑयल स्टोर किया जा सकता है.

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एक रिजर्व विशाखापट्टनम में है जिसमें 1.33 MMT ऑयल रखा गया है. दूसरा 1.50 मिलियन टन की क्षमता वाला रिजर्व मंगलोर में है. इसकी क्षमता का एक-चौथाई तेल स्टोर किया गया है. तीसरा स्टोर कर्नाटक के पादूर में है लेकिन अभी तक तेल का इंतजार कर रहा है.


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स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स (SPR)-

कैबिनेट ने अब दो नए स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व बनाने को मंजूरी दी है. ओडिशा के चांदीखोल में 4.4 मिलिटन टन की क्षमता और कर्नाटक के पादूर में 2.5 मिलियन टन की क्षमता वाले रिजर्व बनाए जाएंगे.

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देश में पुराने 3 SPR 10 दिन के कच्चे तेल की जरूरत को पूरा कर सकते हैं जबकि प्रस्तावित दो SPR 12 दिनों की आपूर्ति के लिए पर्याप्त होंगे. इस तरह देश के पास कुल 22 दिनों का तेल स्टॉक उपलब्ध रहेगा.

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कुछ समय पहले केंद्रीय कैबिनेट ने यूएई के साथ रणनीतिक तेल भंडार समझौते को मंजूरी दी है. भारतीय रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (आईएसपीआरएल) और यूएई की कंपनी अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (एडीएनओसी) के बीच जनवरी में एक करार हुआ था. करार के मुताबिक, यूएई भारत के मंगलौर में बन रहे भूमिगत भंडार में करीब 8.6 मिलियन बैरल कच्चा तेल रखेगा. इसमें से एक हिस्सा भारत को मुफ्त मिलेगा. यह हिस्सा 5 लाख टन के करीब होगा. यहां बता दें कि भारत को अपनी कुल जरूरत का 79 फीसदी कच्चा तेल आयात करना पड़ता है. किसी भी खाड़ी देश का भारत के ऊर्जा क्षेत्र में ये पहला निवेश है.

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रणनीतिक जरुरत हैं तेल भंडार
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम में आने वाले उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखते हुए आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम, कर्नाटक के पाडुर और मेंगलुरु में जमीन के नीचे रणनीतिक तेल भंडार बनाए जा रहे हैं. इनमें 53.30 लाख टन कच्चे तेल को स्टोर किया जा सकेगा. वैश्विक उठा-पटक और आपात स्थिति में इन भंडारों का इस्तेमाल किया जा सकेगा.

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