'परमवीर चक्र' सीरीज में आज बात ऐसे शूरवीर की, जिन्होंने अकेले दम पर पाकिस्तानी आतंकियों के टीठवाल पर कब्जे करने के सपनों को नेस्त नाबूद कर दिया था. इस वीर का नाम है लांस नायक करम सिंह, जिन्होंने साल 1947 में जम्मू कश्मीर में वीरतापूर्ण कार्यों के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.
करम सिंह परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले दूसरे शूरवीर थे और वे पहले ऐसे जाबांज थे, जिन्हें जीवित रहते हुए परमवीर चक्र दिया गया था. इससे पहले सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत यह सम्मान दिया गया.
करम सिंह का जन्म 15 सितंबर 1915 को ब्रिटिश भारत के पंजाब में बरनाला जिले के सेहना गांव में हुआ था. उनके पिता उत्तम सिंह एक किसान थे और सिंह भी एक किसान बनना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अपने गांव के प्रथम विश्व युद्ध के दिग्गजों की कहानियों से प्रेरित होने के बाद सेना में शामिल होने का फैसला किया.
15 सितम्बर 1941 को उन्होंने सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन में दाखिला लिया. उसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध के बर्मा अभियान में हिस्सा लिया और एडमिन बॉक्स की लड़ाई में उनके आचरण और साहस के लिए उन्हें मिलिट्री मैडल से सम्मानित किया गया था.
वह 1947 में आजादी के बाद पहली बार भारतीय ध्वज को उठाने के लिए चुने गए पांच सैनिकों में से एक थे. सिंह बाद में सूबेदार के पद पर पहुंचे और सितंबर 1969 में उनकी सेवानिवृत्ति से पहले उन्हें मानद कैप्टन का दर्जा मिला.
मेजर पीरू सिंह की वीरता ने टीटवाल से दुश्मनों को पीछे कर दिया था, लेकिन दो महीने बाद ही 13 अक्टूबर 1948 पाकिस्तान ने यहां हमला कर दिया. पाकिस्तान ने टीठवाल की रीछमार गली से हमला किया और यहां सिख रेजिमेंट के सिर्फ एक ही जवान थे और दुश्मनों की भीड़ ने हमला बोल दिया.
दुश्मन गोलीबारी कर रहे थे, जिससे भारतीय बंकर तबाह हो गए थे और सेना की हालत खराब हो गई थी. उस वक्त करम सिंह इस गली में फॉरवर्ड पॉइंट पर तैनात थे और उस वक्त हालत इतने खतरनाक थे कि वो उनके पास आगे संदेश पहुंचाने के लिए कोई साधन नहीं था.
करमसिंह खुद घायल थे और अलग अलग बंकर पर गए और अन्य घायलों को इकट्ठा किया और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया. उस दौरान दुश्मन ने करीब 8 बार हमला किया, लेकिन हर बार करमसिंह ने मोर्चा संभाला.
दुश्मन के करीब आने पर सिंह खाई से बाहर उनपर कूद पड़े और संगीन (बैनट) से उनको मौत के घाट उतार दिया, जिससे पाकिस्तानी काफी हताश हो गए. इसके बाद उन्होंने तीन और हमलों को नाकाम किया और सफलतापूर्वक दुश्मन को पीछे हटा दिया.
उस वक्त उन्होंने दुश्मन को ऐसा जवाब दिया कि दुश्मन के कब्जे के इरादे चूर-चूर हो गए और टीठवाल पर कब्जा करने का सपना भी सपना ही रह गया. यह सिर्फ करम सिंह की वजह से संभव हुआ, जिन्होंने अकेले के दम पर दुश्मनों से मुकाबला किया. इस जंग के लिए उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया.