राजस्थान का जोधपुर अपनी राजशाही परंपराओं के लिए जाना जाता है. इन परंपराओं में खास है जोधपुर के किले मेहरानगढ़ किले से चीलों को खाना खिलाने की परंपरा. अगर आप जोधपुर जाते हैं तो यह परंपरा देखना आपके लिए अलग अनुभव हो सकता है. जानें- हर रोज ऐसा क्यों किया जाता है और इसमें क्या खास है...
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जोधपुर राजघराने का मानना है कि चील उनकी रक्षक हैं, इसीलिए मेहरानगढ़ किले से दोपहर में एक समय उनको खाना खिलाया जाता है. इस वक्त खुद ही बड़ी संख्या में चील किले पर आ जाती हैं और खान खाती हैं. इस दौरान उन्हें मांस खिलाया जाता है.
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चीलों को खाना खिलाने वाले लतीफ कुरैशी के अनुसार, 'मेरा परिवार पिछली कई पीढ़ियों से यही काम कर रहा है. यह परंपरा करीब 500 साल पहले, राव जोधाजी के समय से शुरू हुई. हमारे बाप-दादा भी यही काम करते रहे हैं. यहां दिन में एक बार मेहरानगढ़ किले के बुर्ज से चीलों को मांस खिलाया जाता है. (फोटो: facebook)
माना जाता है कि चीलें उनकी रक्षक हैं और जब तक वह यहां रहेंगी तब तक राजघराना और मेहरानगढ़ का किला भी रहेंगे. चीलों को यहां चामुंडा देवी का रूप माना जाता है. कुरैशी ने बताया कि एक बार में चीलों को खिलाने के लिए बकरे का करीब पांच से छह किलो मांस लग जाता है.
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यहां चीलों को खाना खिलाने के दौरान एक बात विशेष तौर पर देखने लायक होती है. खास बात ये है कि मांस के टुकड़े चाहे जमीन पर पड़े हों या किले की मुंडेर पर रखे हों, जब तक कुरैशी उन्हें अपने हाथ से उछालकर नहीं देते तब तक चील उन टुकड़ों को छूते भी नहीं.
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कुरैशी का कहना है कि जब वो खाना उछालते हैं तो चील तभी उसे पकड़ते हैं और वह कभी भी उसे नीचे नहीं गिरने देते.
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बता दें कि कुरैशी भी जोधपुर में मांस की दुकान चलाते हैं और इस काम के लिए किसी से कुछ लेते नहीं.
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लोग दान और श्रद्धा से इस काम के लिए जो कुछ दे जाते हैं, उनकी पूर्ति उसी से हो जाती है.
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