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केरल में 10 लाख मछुआरे, बाढ़ में फंसे लोगों के लिए बने जीवनरक्षक

मोहित पारीक
  • 21 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 10:37 AM IST
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केरल में बाढ़ ने भायनक तबाही मचाई है, जिससे 10 लाख से अधिक लोग राहत कैंप में रहने को मजबूर हैं. वहीं बाढ़ की त्रासदी से 370 जिंदगियां खत्म हो चुकी हैं अभी तक सेना, अन्य एजेंसियों और मछुआरों द्वारा करीब 38 हजार से ज्यादा लोगों को बचाया जा चुका है. वहीं 67 हेलिकॉप्टर, 24 प्लेन, 548 मोटरबोट लगातार राहत कार्यों में जुटे हुए हैं. इस राहत कार्य में सरकारी एजेंसियों के साथ मछुआरों का भी खास योगदान है. आइए जानते हैं केरल के इन मछुआरों के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें...

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हजारों मछुआरे राहत कार्य में जुटे हुए हैं और उन्होंने अपनी नावें भी राहत कार्य में ही लगा रखी है. केंद्रीय मंत्री के. जे. अल्फॉन्स ने खुद बताया कि इस मुसीबत के समय में मछुआरे सबसे बड़े हीरो बनकर उभरे हैं. बचाव अभियान के दौरान उन्होंने अपनी करीब 600 बोट मदद के लिए दी.

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तिरुवनंतपुरम, एर्नाकुलम, कोल्लम और अलप्पुझा के मछुआरे राज्य के बाढ़ प्रभावित इलाकों में निकल पड़े हैं. इस मिशन के लिए केरल स्वतंत्र मत्स्यथोझिलाली फेडरेशन ने क्षेत्रीय केंद्र बनाए हैं. मछुआरे राहत कार्य में सेना की लगातार मदद कर रहे हैं. इस बाढ़ से पहले भी ये मछुआरे पर्यावरण और केरल की जनता के लिए काम करते रहे हैं.

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केरल के मछुआरे समुद्र से प्लास्टिक कचरे को हटाने के लिए भी काम कर रहे हैं. वे समुद्र से प्लास्टिक खर्चे को निकालते हैं और बाद में इससे सड़क बनाने का कार्य किया जाता है. ये मछुआरे प्लास्टिक कचरे को तट पर लाते हैं. इसके बाद फिशिंग कम्युनिटी के लोग इसे एक जगह पर जमा करते हैं.

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बता दें कि प्रदेश में 10 लाख से अधिक मछुआरे हैं, जो मछली पालन का काम करते हैं. केरल में जहां मछुआरे रहते हैं वहां का घनत्व करीब 2000 है जबकि केरल के अन्य क्षेत्र में यह जनसंख्या घनत्व 850 है.

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वहीं फिशिंग इंडस्ट्री भी केरल में अहम भूमिका निभाती है. प्रदेश में मछुआरे करीब 1200 करोड़ का निर्यात व्यापार और 600 करोड़ का घरेलू व्यापार करते हैं. बता दें कि ये प्रदेश के राजस्व का तीन फीसदी हिस्सा है. वहीं भारत में फिश प्रोडक्शन में केरल का 20 फीसदी हिस्सा है.

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यहां के मछुआरे अलग-अलग नावों से व्यापार करते हैं, जिसमें मोटराइज्ड, नॉन मोटराइज्ड और अन्य शामिल है. दरअसल, इन मछुआरों के पास जो नावें हैं उनकी विशेष डिजाइन इन्हें तेज और अप्रत्याशित बहाव से निकलने में मदद करती है. इन देसी नावों में दो इंजन होते हैं और ये लकड़ी और फाइबर से बनी होती हैं. इससे बाढ़ के राहत कार्य में भी मदद मिलती है.

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यहां के मछुआरे अलग-अलग नावों से व्यापार करते हैं, जिसमें मोटराइज्ड, नॉन मोटराइज्ड और अन्य शामिल है. दरअसल, इन मछुआरों के पास जो नावें हैं उनकी विशेष डिजाइन इन्हें तेज और अप्रत्याशित बहाव से निकलने में मदद करती है. इन देसी नावों में दो इंजन होते हैं और ये लकड़ी और फाइबर से बनी होती हैं. इससे बाढ़ के राहत कार्य में भी मदद मिलती है.

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यहां के मछुआरे अलग-अलग नावों से व्यापार करते हैं, जिसमें मोटराइज्ड, नॉन मोटराइज्ड और अन्य शामिल है. दरअसल, इन मछुआरों के पास जो नावें हैं उनकी विशेष डिजाइन इन्हें तेज और अप्रत्याशित बहाव से निकलने में मदद करती है. इन देसी नावों में दो इंजन होते हैं और ये लकड़ी और फाइबर से बनी होती हैं. इससे बाढ़ के राहत कार्य में भी मदद मिलती है.

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खास बात ये है कि मछुआरे अपने धार्मिक तरीकों को भी अपने व्यापार में आजमाते हैं. वे समुद्र को मां मानते हैं और समुद्र के पानी को पवित्र मानते हैं और वे इसका इस्तेमाल कई धार्मिक अनुष्ठानों में करते हैं. कई मछुआरे मंत्रों के माध्यम से मछलियों को इकट्ठा करने का कार्य करते हैं.

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