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बड़ी अजब है येरूशलम की कहानी, जानें- इजरायल ने कब किया था कब्जा

aajtak.in
  • 08 दिसंबर 2017,
  • अपडेटेड 11:21 AM IST
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से येरूशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के बाद गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक के पास हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. फिलीस्तीन के लोग इसका विरोध कर रहे हैं, जो कि येरूशलम को अपनी राजधानी मानते हैं. येरूशलम को भले ही इजरायल अपना मानता है, लेकिन इजरायल के येरूशलम पर कब्जे की कहानी भी दिलचस्प है. आइए जानते हैं कैसे और कब इजरायल ने येरूशलम को अपने कब्जे में लिया...

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येरूशलम पर जमीनी विवाद के साथ साथ धार्मिक मान्यताओं को लेकर कई विवाद हैं. इस शहर को तीन धर्म ईसाई, मुस्लिम और यहूदी अपनी पवित्र नगरी मानते हैं और इस पर अधिकार को लेकर यहां कई युद्ध भी हो चुके हैं.

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क्या है येरूशलम का इतिहास- बता दें कि साल 1948 में इजरायल की स्थापना हुई थी और उस वक्त ही येरूशलम का पश्चिमी हिस्सा इजरायल के कब्जे में आ गया था. वहीं पूर्वी हिस्से पर फिलीस्तीन अपना अधिकार मानता था और इसे अपनी राजधानी घोषित करवाना चाहता है.

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उसके बाद 1967 में एक लड़ाई में येरूशलम के पूर्वी हिस्से पर भी इजरायल ने कब्जा कर लिया, लेकिन पूरे शहर पर इजरायली कब्जे को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली. उसके बाद राजधानी घोषित करने के लिए कोशिश होती रही.

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बता दें कि अमेरिका की ओर से येरूशलम को राजधानी घोषित करने के बाद भी कई देश इसका विरोध कर रहे हैं. इन देशों में तुर्की, सऊदी अरब, मिस्र, ईरान, जॉर्डन, फ्रांस, चीन, रूस, ब्रिटेन आदि देश शामिल है.

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येरूशलम पर कब्जा करने के बाद साल 1980 में इजरायल ने येरूशलम को राजधानी बनाने का ऐलान कर दिया, जिसकी हर तरफ आलोचना हुई. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में इसकी निंदा की गई.

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गौरतलब है कि 86 देशों ने इजरायल को मान्यता दी है लेकिन सभी के दूतावास तेल अवीव में है, जहां अमेरिका अपने दूतावास हटा सकता है. साल 1995 में अमेरिकी कांग्रेस ने दूतावास को येरूशलम को शिफ्ट करने के लिए कानून पास किया था.

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धार्मिक तौर पर महत्वपूर्ण इस शहर में 158 चर्च और 73 मस्जिदे हैं. वहीं यहां करीब 75 फीसदी आबादी यहूदियों की है और कुल 10 लाख लोग यहां रहते हैं.

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बता दें कि साल 1995 में भी अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की सरकार में कांग्रेस ने येरूशलम को इजरायल की राजधानी मानते हुए एंबेसी एक्ट पास किया था. हालांकि बाद में इस कानून को वापस ले लिया गया. ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान इस एक्ट को पास करने का वादा किया था.

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यह शहर तीन धर्मों के लिए खास है. शहर के ईसाई हिस्से में पवित्र सेपुलकर चर्च है, जो दुनियाभर के ईसाइयों के लिए खास है, ये ऐसी जगह है, जो ईसा मसीह गाथा का केंद्र है. बताया जाता है कि ईसा को यहीं सूली पर लटकाया गया था, इसे कुछ लोग गोलगोथा कहते हैं. इसलिए यह ईसाइयों के लिए खास है.

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वहीं मुस्लिम हिस्सा चारों में सबसे बड़ा है और इस क्षेत्र में पवित्र गुंबदाकार 'डोम ऑफ रॉक' यानी कुब्बतुल सखरह और अल-अक्सा मस्जिद है. यह एक पठार पर स्थित है जिसे मुस्लिम हरम अल शरीफ या पवित्र स्थान कहते हैं. ये मस्जिद इस्लाम की तीसरी सबसे पवित्र जगह मानी जाती है. मुसलमान मानते हैं कि पैगंबर अपनी रात्रि यात्रा में मक्का से यहीं आए थे और उन्होंने आत्मिक तौर पर सभी पैगंबरों से दुआ की थी.

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यहूदियों का मानना है कि यहां कभी पवित्र मंदिर खड़ा था, ये दीवार उसी की बची हुई निशानी है. यहां मंदिर में अंदर यहूदियों की सबसे पवित्रतम जगह 'होली ऑफ होलीज' है. यहूदी मानते हैं यहीं पर सबसे पहली उस शिला की नींव रखी गई थी, जिस पर दुनिया का निर्माण हुआ, जहां अब्राहम ने अपने बेटे इसाक की कुरबानी दी.

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