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वो राष्ट्रपति, जिन्होंने किए थे इमरजेंसी के आदेश पर दस्तखत...

मोहित पारीक
  • 25 जून 2018,
  • अपडेटेड 1:18 PM IST
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आज ही के दिन साल 1975 में भारत आपातकाल का गवाह बना और 25 जून 1975 की आधी रात को लगी इमरजेंसी 21 मार्च 1977 तक रही. इमरजेंसी का नाम सुनते ही सबसे पहले इंदिरा गांधी का ध्यान आता है, लेकिन इस इमरजेंसी में एक और शख्स थे, जिनकी अहम भूमिका थी. वे शख्स थे देश के 5वें और तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद, जिन्होंने इमरजेंसी के आदेश पर दस्तखत किए थे.

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दिल्ली में जन्में फखरुद्दीन की शुरुआती पढ़ाई गोंडा में हुई और उसके बाद दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से उन्होंने ग्रेजुएशन की. फिर वह इंग्लैंड के कैंब्रिज शहर में लॉ की पढ़ाई करने पहुंचे. यहां उनकी मुलाकात और फिर दोस्ती नेहरू से हुई.

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इंडिया वापस लौटकर फखरुद्दीन ने वकालत शुरू की. साथ ही अपने गृहप्रांत असम में कांग्रेस के आंदोलन से भी जुड़ गए. जल्द ही वह स्टेट काउंसिल के लिए चुने जाने लगे. भारत में वे आजादी की लड़ाई में भी जुड़ गए. 1942 में भारत छोडो अभियान में उन्हें गिरफ्तार किया गया और उन्हें साढ़े तीन साल जेल में रहने की सजा सुनाई गई.

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1936 से वे असम प्रदेश कांग्रेस कमिटी के सदस्य और 1947 से 74 तक AICC के सदस्य रहे और साथ ही 1938 में गोपीनाथ बोर्डोलोई की मिनिस्ट्री में फाइनेंस, रेवेन्यु और लेबर मिनिस्टर भी बने.

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आजादी के बाद राज्य सभा (1952-1953) में उनकी नियुक्ति की गई और इसके बाद वे असम सरकार के अधिवक्ता-प्रमुख भी बने. वे 1957-1962 और 1962-1967 में असम वैधानिक असेंबली से कांग्रेस की टिकट लेकर चुने गए. बाद में, 1967 में और फिर दोबारा 1971 में असम के बारपेटा निर्वाचन क्षेत्र से वे लोक सभा के लिए चुने गए.

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उस दौरान सरकारी करप्शन की खबरें आ रही थीं. इस वक्त देश में सरकार के विरोध में स्वर गूंज रहे थे. छात्र आंदोलन की आग गुजरात से बिहार तक पहुंच चुकी थी. इस विरोध को नैतिकता मुहैया करा रहे थे धुर गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण. ऐसे वक्त में इंदिरा गांधी ने 1974 में फखरुद्दीन अली अहमद को देश का राष्ट्रपति बनाया.

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इसी बीच 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के लोक सभा चुनाव को रद्द घोषित कर दिया. उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप साबित हुए और उन्हें कुर्सी छोड़ने और छह साल तक चुनाव ना लड़ने का निर्देश मिला.

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इंदिरा आसानी से सिंहासन खाली करने के मूड में नहीं थीं. संजय गांधी कतई नहीं चाहते थे कि उनकी मां के हाथ से सत्ता जाए. उधर विपक्ष सरकार पर लगातार दबाव बना रहा था. नतीजा ये हुआ कि इंदिरा ने 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू करने का फैसला लिया.

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उस दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी. जिसके बाद उनकी आलोचना भी हुई.

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11 फरवरी 1977 के दिन राष्ट्रपति भवन के दफ्तर में वह सुबह के वक्त गिर गए. अस्पताल ले जाए गए. पता चला कि उन्हें दिल के दो दौरे पड़े. जिसके चलते देहांत हो गया. उस वक्त फखरुद्दीन की बेगम आबिदा ही उनके साथ थीं.

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