आज भारतीय सेना के ऐसे ऑफिसर का जन्मदिन है, जो एक फौजी होने के साथ-साथ अपनी शरारत, बेबाक मजाक, अपने बातों पर अडिग रहने वाले ऑफिसर के रूप में जानते हैं. उन्हें भारतीय सेना का वो सम्मान दिया गया, जो इतिहास में सिर्फ दो लोगों को ही हासिल हुआ है. इस शख्स का नाम है फील्ड मार्शल मानेकशॉ. मानेकशॉ अपने सैन्य कारनामों के साथ अपनी हाजिर जवाबी के लिए भी जाने जाते थे. जानते हैं उनके जीवन के बारे में और उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से, जिन्हें कई किताबों में लिखा गया.
आज भारतीय सेना के ऐसे ऑफिसर का जन्मदिन है, जो एक फौजी होने के साथ-साथ अपनी शरारत, बेबाक मजाक, अपने बातों पर अडिग रहने वाले ऑफिसर के रूप में जानते हैं. उन्हें भारतीय सेना का वो सम्मान दिया गया, जो इतिहास में सिर्फ दो लोगों को ही हासिल हुआ है. इस शख्स का नाम है फील्ड मार्शल मानेकशॉ. मानेकशॉ अपने सैन्य कारनामों के साथ अपनी हाजिर जवाबी के लिए भी जाने जाते थे. जानते हैं उनके जीवन के बारे में और उनके जीवन से जुड़े कई ऐसे किस्से, जिन्हें कई किताबों में लिखा गया.
सैम मानेकशॉ का पूरा नाम होरमुजजी फ्रामदी जमशेदजी मानेकशॉ था. सैम का जन्म तीन अप्रैल 1914 को अमृतसर में हुआ था. बचपन से ही निडर और बहादुरी की वजह से इनके चाहने वाले इन्हें सैम बहादुर कहा जाता था. वो भारतीय सेना के पहले ऐसे जनरल बने जिनको प्रमोट कर फील्ड मार्शल की रैंक दे दी गई थी.
सैम ने करीब चार दशक फौज में गुजारे और इस दौरान पांच युद्ध में हिस्सा लिया. फौजी के रूप में उन्होंने अपनी शुरुआत ब्रिटिश इंडियन आर्मी से की थी. दूसरे विश्व युद्ध में भी उन्होंने हिस्सा लिया था. 1971 की जंग में उनकी बड़ी भूमिका रही.
फील्ड मार्शल मानेकशॉ की सर्विस 1934 से 2008 तक थी. जिसमें उन्होंने दूसरे वर्ल्ड वॉर, 1962 के भारत-चाइना वॉर, 1965 के भारत-पाकिस्तान वॉर और 1971 के भारत-पाकिस्तान वॉर में हिस्सा लिया. भारत-चाइना वॉर और उसके बाद की सारी लड़ाइयों मानेकशॉ की लीडरशिप में लड़े गए थे.
साल 1969 में वे भारतीय सेना के आठवें सेनाध्यक्ष बनाए गए और उनके नेतृत्व में भारत ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त की, जिसके बाद ही बांग्लादेश का जन्म हुआ था. कहा जाता है कि वे अपनी बात बेबाकी के साथ रखते थे और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके कई किस्से काफी प्रचलित है.
कहा जाता है कि वो प्रधानमंत्री को मैडम नहीं बल्कि प्रधानमंत्री ही कहते थे. साथ ही वो प्रधानमंत्री को भी सीधे और बेबाक तरीके से जवाब देते थे. 1971 की जंग से पहले जब इंदिरा गांधी ने उन्हें युद्ध के लिए कहा था तो उन्होंने इंदिरा गांधी का विरोध किया था और जंग के लिए मना कर दिया था. साथ ही जंग के लिए टाइम मांगा था. हालांकि साल 1971 की जंग उनके नेतृत्व में ही जीती गई थी.
बटालियन को भेज दी थी चूड़ियां
बात साल 1962 की है, जब मिजोरम की एक बटालियन ने भारत-चीन युद्ध से दूरी बनाने की कोशिश की तो मानेकशॉ ने उस बटालियन को पार्सल में चूड़ी के डिब्बे के साथ एक नोट भेजा. जिस पर लिखा था कि अगर लड़ाई से पीछे हट रहे हो तो अपने आदमियों को ये पहनने को बोल दो. फिर उस बटालियन ने लड़ाई में हिस्सा लिया और काफी अच्छा काम कर दिखाया.
उनके शानदार करियर के दौरान उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए और सन 1972 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया. 27 जून 2008 में वो सब को हमेशा के लिए अलविदा कह गए.