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कभी स्कूल में टीचर था अमेरिका की नाक में दम करने वाला सद्दाम हुसैन

aajtak.in
  • 09 अप्रैल 2017,
  • अपडेटेड 2:35 PM IST
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इराक के इतिहास में आज का दिन बेहद अहम है. आज 9 अप्रैल के दिन जहां एक तरफ इराक को 2003 में तानाशाही से मुक्ति मिली, तो दूसरी तरफ अमेरिकी फौजों ने डेरा डाल दिया. सद्दाम हुसैन दुनिया के सबसे बदनाम कातिलों में से एक माना जाता है, जिसने अपनी तानाशाही के बल पर लाखों को मौत के मुंह में धकेल दिया था. सद्दाम इराक का 5वां राष्ट्रपति था, जिसने इराक पर करीब-करीब 25 वर्षों तक राज किया. आगे की स्लाइड्स में आइये आपको अरब के उस बदनाम कातिल और तानाशाह बादशाह के जीवन से रूबरू करवाते हैं. एक टीचर से किस तरह सत्ता तक पहुंच गया सद्दाम हुसैन देखें फोटो में...

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सद्दाम का पूरा नाम सद्दाम हुसैन अब्द-अल-मजीद अल-टिकरी था. उसका जिस परिवार में जन्म हुआ था वो एक भूमिहीन सुन्नी परिवार था जो पैगम्बर मोहम्मद के वंशज होने का दावा किया करते थे. सद्दाम की मां का नाम तुलफा-अल-मुस्स्लत और पिता का नाम हुसैन आबिद-अल-मजीद था. सद्दाम ने अपने पिता को कभी नहीं देखा और ना उसके बारे में जान पाया, क्योंकि उसके जन्म के 6 महीने पहले ही वो घर से गायब हो गए थे और बाद में मौत हो गई थी.
पिता की मौत के बाद सद्दाम की मां ने आत्महत्या करने का विचार किया, लेकिन परिवार वालों के समझाने पर उसने गर्भपात ना करवाकर बालक को जन्म दिया. सद्दाम के जन्म के कुछ दिनों बाद ही सद्दाम के बड़े भाई की कैंसर से मौत हो गई, जो 13 साल का था. अब शिशु सद्दाम को बगदाद में उसके मामा खैरअल्लाह तलफ के पास भेज दिया जब तक कि वो तीन साल का नहीं हो गया.
सद्दाम की मां ने दूसरा निकाह कर लिया, जिससे सद्दाम के तीन सौतेले भाइयों का जन्म हुआ. सद्दाम के सौतेले पिता इब्राहीम हसन ने उसके वापस लौटने पर उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया था. सौतेले पिता के बुरे बर्ताव से परेशान होकर सदाम 10 वर्ष की उम्र में अपने घर से भागकर बगदाद में अपने मामा के पास वापस चला गया. सद्दाम का मामा तुलफा एक सुन्नी मुस्लिम था, जो इराकी सेना में उच्च अधिकारी था, जिसने साल 1941 के एंग्लो-इराकी युद्ध में हिस्सा लिया था. उसने ही सद्दाम की देखभाल की थी और उसे बगदाद के ही सेकेंडरी नेशनलिस्ट स्कूल में दाखिला दिलाया. इसके बाद सद्दाम ने तीन साल तक इराकी लॉ स्कूल में पढ़ाई की.

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साल 1957 में अपने मामा की मदद से 20 साल की उम्र में ही सद्दाम अरब बाथ पार्टी में शामिल हो गया. इससे पहले सद्दाम हुसैन एक स्कूल में कुछ समय के लिए अध्यापक का काम कर रहा था. सद्दाम को साल 1966 में अरब बाथ पार्टी में सहायक महासचिव बना दिया गया. साल 1968 में विद्रोह के बाद सद्दाम हुसैन ने जनरल अहमद हसन-अल-बक्र के साथ मिलकर सत्ता पर कब्जा कर लिया. अल-बकर राष्ट्रपति और सद्दाम उपराष्ट्रपति बना. अल-बकर बुजुर्ग हो गया था, इसलिए उसका सारा काम सद्दाम हुसैन ही देखता था.

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सत्ता की ताकत हाथ में आते ही सद्दाम ने पश्चिमी देशों को परेशान करना शुरू कर दिया. और इसकी शुरुआत की साल 1972 में सोवियत संघ के साथ 15 वर्षों का सहयोग समझौता करके. यह समझौता उस वक्त किया गया था, जब शीत युद्ध अपनी चरम पर था. इराक ने अपनी उन तेल कंपनियों का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया, जो पश्चिमी देशों को तब तक काफी सस्ती दरों में तेल दे रही थी. ऐसा करते ही अमेरिका पर सबसे पहले प्रभाव पड़ा, क्योंकि अमेरिका में आयात होने वाला तेल में इराक बड़ी हिस्सेदारी थी.
धीरे-धीरे सद्दाम हुसैन ने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी और अपने रिश्तेदारों और सहयोगियों को उच्च पदों पर नियुक्त कर दिया था. सद्दाम हुसैन ने सत्ता में रहते हुए हर वो काम किया, जिससे उसकी ताकत बढ़ सकती थी. साल 1978 में उसने एक नया कानून बनाया, जिसके तहत विपक्षी दलों की सदस्यता लेने वाले लोगों को मौत के घाट उतारा जा सकता था. खबरों की मानें तो साल 1979 में सद्दाम हुसैन ने खराब स्वास्थ्य के नाम पर जनरल बक्र को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया और खुद देश का राष्ट्रपति बन गया. सत्ता में आते ही सद्दाम ने सबसे पहले अपने दुश्मनों का सफाया करना शुरू कर दिया.

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सद्दाम को अपनी ताकत और जुनून के आगे किसी के जान की परवाह नहीं थी. अपनी ताकत बढ़ाने के लिए उसने साल 1980 में नई इस्लामिक क्रांति के प्रभावों को कमजोर करने की कोशि‍श शुरू कर दी और इसके लिए उसने पश्चिमी ईरान की सीमओं पर अपनी सेना उतार दी. आठ साल तक चले इस युद्ध में लाखों लोगों मारे गए. सद्दाम की बढ़ती बरबरता को देखते हुए साल 1982 में कुछ लोगों ने उस पर आत्मघाती हमला किया. लेकिन सद्दाम बच निकला और फिर सद्दाम ने शिया बाहुल्य दुजैल गांव को ही खत्म कर दिया, जिसके कुछ लोग उसे मारने की साजिश में शामिल थे.

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सद्दाम हुसैन के तख्तापलट के साथ बगदाद तो अमेरिका के नियंत्रण में आ गया, लेकिन सद्दाम का फिर भी पता नहीं चल पा रहा था. 14 दिसंबर 2003 को अमेरिका ने इस बात की पुष्टि की कि सद्दाम को एक दिन पहले गिरफ्तार कर लिया गया है. हिरासत में रहने के करीब एक साल बाद सद्दाम पर औपचारिक आरोप लगाए गए और उन्हें दुजैल हत्याकांड का जिम्मेदार ठहराया गया. करीब एक साल की कार्रवाई के बाद 2006 नवंबर में सद्दाम को फांसी की सजा सुनाई गई.

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सद्दाम ने सजा से बचने की अपील भी की लेकिन उसकी अपील खारिज कर दी गई. आखिरकार 30 दिसम्बर 2006 को उसे फांसी के सजा दे दी गई.

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सद्दाम ने अपना प्रभुत्व बनाये रखने के लिए लम्बी दूरी तक मार करने वाली मिसाईलों और परमाणु हथियारों को बनवाने का काम शुरू करवा दिया. लेकिन साल 2000 में अमेरिका में जॉर्ज बुश की ताजपोशी के साथ ही सद्दाम सरकार की मुसीबत बढ़ गई. दरअसल, अमेरिका को यह शक था कि सद्दाम अमेरिका पर टेररिस्ट अटैक करने की तैयारी कर रहा है. ऐसे में साल 2002 में सयुंक्त राष्ट्र के दल ने इराक का दौरा किया और इस दौरान इराक की कई मिसाईलों को खत्म कर दिया. मार्च 2003 में अपने कुछ सहयोगी देशों के साथ मिलकर अमेरिका ने इराक पर हमला कर दिया. 09 अप्रैल 2003 को सद्दाम हुसैन सरकार को गिरा दिया गया और 20 मार्च को इराकी सेना ने आत्मसमपर्ण कर दिया था.

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बगदाद के मुख्य फिरदौस चौराहे पर लगी सद्दाम हुसैन की मूर्ति को 9 अप्रैल को गिरा दिया गया. पहले नागरिकों ने इसे हथौड़ी मार कर, फिर गले में फंदा डालकर गिराने की कोशिश की. लेकिन नाकाम होने पर फिर अमेरिकी सैनिक आगे आए और सैनिक वाहन की मदद से मूर्ति को गिरा दिया गया. यह इराक में तानाशाही के खात्मे का संकेत था.

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सद्दाम हुसैन की दो पत्नियां और पांच संतानें थीं, जिसमें तीन पुत्रियां और दो पुत्र थे.

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सद्दाम के दोनों बेटों उदै और कुशे इराक पर किये जाने वाले अमेरिकी हमले में मारे गए.

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सद्दाम की अंतिम इच्छा थी कि उन्हें फांसी की बजाय शूट करके मारा जाए ताकि वो सम्मान की मौत मरे, लेकिन उनकी इच्छा पुरी नहीं की गई. उसकी फांसी के बाद उसको अपने पैतृक गांव में दफन कर दिया गया.

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