सैयद मोहम्मद यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन का जन्म 18 फरवरी 1946 को बड़गाम, जम्मू कश्मीर में हुआ. सैयद सलाउद्दीन उस जमात का चेहरा है, जिसने जेहाद के नाम पर जमीन की जन्नत को जहन्नुम बना दिया. सलाउद्दीन के अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित होते ही अमेरिका में उसकी सारी संपत्तियां जब्त हो जाएंगी.
हिंदुस्तान की जमीन पर सलाउद्दीन 27 साल से दहशत के खौफनाक खेल को अंजाम दे रहा है. चुनावी मैदान में ताल ठोकने में नाकाम होने के बाद वो पाकिस्तान की गोद में जा बैठा और बेगुनाहों का खून बहाने की नापाक साजिशों का सरगना बन गया.
सलाउद्दीन भारत के लिए किसी नासूर से कम नहीं. सीमा पार पाकिस्तान का दामाद बना सलाउद्दीन हर रोज साजिशे रचता है. भारत के लिए गड्ढे खोदता है. उसके लड़ाके सुरक्षाबलों पर हमला करने से कभी पीछे नहीं हटते.
पटानकोर्ट एयरबेस पर आतंकी हमला हो या फिर सेना के कैंप पर अटैक सैय्यद सलाउद्दीन सीमापार से लगातार साजिशें थमती नहीं. पाकिस्तान में उसे कोई रोकने टोकने वाला नहीं है. हाफिज सईद के साथ वो खुले मंच से भारत के खिलाफ आग उगलता रहा.
सैयद मोहम्मद यूसुफ शाह का मकसद कश्मीर को आजाद कराना है. सलाउद्दीन ने पिछले साल धमकी दी थी कि वह जम्मू-कश्मीर को भारतीय सैनिकों की कब्रगाह बना देगा. भारत पिछले कुछ समय से इसे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने में जुटा था.
साल 1990 में पाकिस्तान भागने से पहले को कश्मीर में यूसुफ शाह के नाम से जाना जाता था. आतंकी बनने से पहले उसने विधायक बनने की नाकाम कोशिश भी की थी. 1987 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट की टिकट पर विधानसभा पहुंचने की कोशिश की.
इसी चुनाव में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा. इस हार के साथ ही उसकी विधायक बनने की इच्छा दफन हो गई. तीन साल के अंदर वो सियासी चोला उतार आतंक की दुनिया में पहुंच गया. जहां से सैयद सलाहुद्दीन कत्लेआम का खेल खेल रहा है.
सैय्यद सलाउद्दीन को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से पैसे मिलते हैं. वह हिजबुल के लिए विदेशी लड़ाकों को साथ-साथ कश्मीरी युवको को भी बहकाने में अव्वल है. उसकी मांग है कि भारत कश्मीर से अपनी सेना को पीछे हटा ले. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वो भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध तक की धमकी देता है.
सलाउद्दीन के पिता भारतीय डाक विभाग में काम करते थे. अपने परिवार में वो 7वीं संतान है. पहले उसने मेडिसिन की पढ़ाई की लेकिन वह सिविल सर्विस में जाना चाहता था. बाद में उसका रुझान जमात-ए-इस्लामी संगठन की तरफ हो गया और वह उस संगठन के लिए कश्मीर में काम करने लगा.
1987 में सलाउद्दीन श्रीनगर की अमीराकदल विधान सभा सीट से चुनाव लड़ा. मतगणना के दौरान वह जीत रहा था, लेकिन उसी वक्त उस पर बूथ कैप्चरिंग के आरोप लगे और उसे गिरफ्तार कर लिया गया. इसी के बाद सलाउद्दीन आतंक का सरगना बना और एक के बाद एक नाकाम साजिशो को अंजाम देता गया.