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कभी अरविंद के खासमखास थे ये चेहरे, आज बने सबसे बड़े विरोधी

aajtak.in
  • 16 अगस्त 2017,
  • अपडेटेड 3:06 PM IST
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अरविंद केजरीवाल एक प्रतिभाशाली व्‍यक्तित्‍व हैं. इसमें कोई शक नहीं है. पर उनके राजनीतिक करियर में एक ऐसा पक्ष ऐसा भी है, जो उनकी महत्‍वाकांक्षाओं को कटघरे में ले आता है. ये पक्ष है उनके उन पूर्व साथियों या दोस्‍तों का, जिन्‍हें वे पीछे छोड़ते गए. इनमें से कई तो ऐसे थे, जिन्‍होंने अरविंद को वहां पहुंचाया, जहां वो आज हैं. जानते हैं ऐसे ही लोगों के बारे में-

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अन्ना हजारे
अरविंद केजरीवाल ने इनके ही नेतृत्‍व में जनलोकपाल की ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी. अनशन अन्‍ना ने किया, पर राजनीतिक पार्टी बनाई अरविंद ने. कहा जाता है कि अन्‍ना इस पार्टी को बनाने के पक्ष में नहीं थे.

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शांति भूषण
पार्टी के सबसे वृद्ध नेताओं में से एक. शांति भूषण को धीरे-धीरे केजरीवाल की तानाशाही खटकने लगी. पैसे लेकर टिकट बांटने का आरोप भी लगाया. बदले में केजरीवाल ने उन्हें पार्टी का दरवाजा दिखा दिया.

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प्रशांत भूषण
अन्ना आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी बनाने तक में हर मोड़ पर केजरीवाल के साथ खड़े नजर आए. प्रशांत को पार्टी का थिंक टैंक भी कहा जाता था. पर जैसे ही उन्‍होंने कुछ मुद्दों पर केजरीवाल के खिलाफ आवाज उठाई, उन्‍हें भी पार्टी से बाहर कर दिया गया.

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योगेन्द्र यादव
यादव ही आम आदमी पार्टी की हर रणनीति तय करते थे. कहा जाता है कि आप पार्टी को शून्य से शिखर तक लाने में उनका बड़ा योगदान था. पर जब इन्‍होंने केजरीवाल की मनमानी का विरोध किया, तो इन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया.

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किरण बेदी
अन्ना आंदोलन में दोनों साथ आए थे. पर केजरीवाल के पार्टी बना लेने के बाद बेदी उनसे दूर होती गईं. केजरीवाल की तानाशाही रवैये का उन्होंने हमेशा विरोध किया.

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अरुणा रॉय
कहा जाता है कि अरविंद केजरीवाल का मन आईआरएस की नौकरी से ज्यादा अपनी संस्था ‘परिवर्तन’ में लगता था. इसी दौरान उनको मैगसासे अवार्ड मिला और उसके धन से दिसबंर 2006 में एक नई संस्था पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन बनाया. इसके बाद सितंबर 2010 में अरुणा रॉय के नेतृत्व में स्वयंसेवी संस्थाओं के ग्रुप नेशनल कैंपेन फॉर पीपल राइट टू इनफॉरमेशन की लोकपाल ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने. यहां से केजरीवाल को एक नये आंदोलन की रूप-रेखा समझ में आयी और अरुणा राय को छोड़कर अन्ना हजारे के साथ आंदोलन की तैयारी करने लगे.

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हर्ष मंदर
लेखक, समाज सेवी हर्ष मंदर के साथ भी अरविंद का ऐसा ही रिश्‍ता रहा. पहले उनकी विचारधारा से प्रभावित हो मंदर उनके पक्ष में आए पर बाद में दूर हो गए.

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संदीप पांडे
समाज सेवी संदीप पांडे का भी जल्‍द ही केजरीवाल से मोह भंग हो गया था. उन्‍होंने कहा था कि आप पार्टी भी दूसरी राजनीतिक पार्टियों की ही तरह हो गई है. वो भूल चुकी है कि उसका गठन भारत का भ्रष्‍टाचार से मुक्‍त करने के लिए किया गया था.

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संतोष हेगड़े
संतोष हेगड़े तो पार्टी से इतने खिन्‍न हो गए थे कि उन्‍होंने कहा था कि आप ने लोगों का विश्वास खो दिया है. बड़ी-बड़ी बातें और कोई काम नहीं. मुझे लगता है कि केजरीवाल दिल्ली की अपनी जिम्मेदारियों को छोड़कर राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षाओं में उलझ गए. अपने आप को राष्ट्रीय नेता बनाने के चक्कर में उन्होंने असल मुद्दों को छोड़ दिया. वो अपना ही भविष्य खराब कर रहे हैं.

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