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...तो नेहरू नहीं सरदार पटेल होते देश के पहले PM

aajtak.in
  • 31 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 8:52 AM IST
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आज सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती है. सरदार पटेल भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐसा नाम है, जिन्हें भारत के वर्तमान भौगोलिक स्वरूप का निर्माता माना जाता है. पटेल को लौह पुरुष के नाम से जाना जाता है. आइए जानते हैं सरदार पटेल के उन योगदानों के बारे में, जो देश हमेशा याद रखेगा...

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बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व करने वाले वल्लभ भाई को वहां की महिलाओं ने 'सरदार' की उपाधि से नवाजा. वे साल 1875 में 31 अक्टूबर के दिन जन्मे थे और साल 15 दिसंबर 1950 को उनका निधन हो गया था.

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सरदार पटेल को 500 रियासतों को भारतीय गणराज्य में मिलाने का श्रेय जाता है. उन्होंने ही गुजराती किसानों को कैरा डिस्ट्रक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन बनाने के लिए प्रेरित किया, जो बाद में अमूल बनी.

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देश के पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री पटेल को आईएएस, आईपीएस और केंद्रीय सेवाओं का जनक कहा जाता है.

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सरदार पटेल अपने शुरुआती दिनों में एक वकील भी थे. वे गांधी से बेहद प्रभावित थे. साल 1917 में गाधी से प्रभावित होकर वे आजादी के आंदोलन की ओर मुड़ गए.

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1917 से 1924 तक सरदार पटेल ने अहमदनगर के पहले भारतीय निगम आयुक्त के रूप में सेवा प्रदान की और 1924 से 1928 तक वे इसके निर्वाचित नगरपालिका अध्यक्ष भी रहे.

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साल 1946 में आजादी से पहले तय हो चुका था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही देश का प्रधानमंत्री होगा. उस वक्त कांग्रेस की कमान मौलाना आजाद के हाथ में थी, लेकिन महात्मा गांधी ने उन्हें मना कर दिया था. गांधी ने प्रधानमंत्री के लिए नेहरू का समर्थन किया था.

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नेहरू को गांधी का समर्थन होने के बाद भी देश से समर्थन नहीं मिला और सरदार पटेल को 15 में से 12 राज्यों को समर्थन हासिल हुआ. इस वक्त गांधी को लगा कि ऐसे में कांग्रेस टूट न जाए. अंग्रजों को एक और बहाना मिल जाएगा. सरदार पटेल ने गांधी के सम्मान में अपना नामांकन वापस ले लिया.

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उन्होंने साल 1950 में प्रधानमंत्री नेहरू को पत्र लिखकर चीन से आगाह रहने की सलाह दी थी. दुर्भाग्य से पंडित नेहरू इस खतरे को भांप नहीं पाए. भारत को साल 1962 में युद्ध का सामना करना पड़ा.

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सरदार पटेल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी से गांधी जी की हत्या के बारे में बात की थी. पटेल ने यह बात तब कही थी, जब मुखर्जी ने उन्हें पत्र लिखकर इस बात पर आपत्ति की कि आरएसएस का नाम जबरन गांधीजी की हत्या में उछाला जा रहा है.

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साल 1909 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया. जब उन्हें यह खबर मिली तब वे कोर्ट मे जिरह कर रहे थे. खबर पर प्रतिक्रिया देने के बजाय वे अपने काम में लगे रहे. दो घंटे की जिरह के बाद उन्होंने यह खबर दूसरों से साझा की. भारत के वर्तमान भौगोलिक स्वरूप का श्रेय काफी हद तक उन्हें ही जाता है. वे राजनीति के साथ-साथ कूटनीति में भी माहिर माने जाते थे.

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