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भारत की दमयंती गुप्ता जिन्होंने अमेरिका में रच दिया इतिहास

प्रज्ञा बाजपेयी
  • 26 जून 2018,
  • अपडेटेड 10:29 AM IST
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भीड़ का हिस्सा बनना तो बहुत आसान होता है पर किसी ऐसी राह पर निकल जाना जिस पर कभी कोई पहले गया ही ना हो, जुनूनी लोगों के बस की ही बात होती है. भारतीय मूल की टेकी दमयंती गुप्ता एक ऐसी शख्सियत हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद फोर्ड कंपनी की पहली डिग्रीधारी महिला इंजीनियर बनने में कामयाब हुईं. दमयंती ने फोर्ड के लिए कई सालों तक काम किया और उनकी कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है. टाइम मैगजीन ने भी पुरुष प्रधान इंडस्ट्री में इकलौती महिला दमयंती की उपलब्धियों और उनके हौंसले को सलाम करते हुए उन पर कवर स्टोरी छापी थी.

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आइए जानते हैं दमयंती के संघर्ष और सफलता की पूरी कहानी उन्हीं के शब्दों में.

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दमयंती पुराने दिनों की याद करते हुए बताती हैं, "मैं ब्रिटिश भारत में एक छोटे से शहर में पैदा हुई थी.  देश में विश्व के इतिहास के सबसे खूनी विभाजन की कहानी लिखी जा रही थी. 1947 में ब्रिटिशर्स ने आखिरकार भारत छोड़ दिया लेकिन भारत-पाकिस्तान का विभाजन हो गया. जहां मेरा परिवार रहता था, वह पाकिस्तान में आ गया लेकिन यह सब कुछ इतना आसान नहीं था. हर तरफ दंगे हो रहे थे और उस समय मेरी उम्र केवल 5 साल थी. हमें आधी रात को कराची के तटीय शहर की तरफ भागना पड़ा. उसके बाद हमें मुंबई के लिए कार्गो शिप पर बैठा दिया गया."

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मेरे पैरेंट्स के पास खूब जमीनें और दुकानें थीं लेकिन कुछ दिनों के भीतर ही हमें सब कुछ छोड़ना पड़ा. मुझे याद है कि मेरी मां गोपीबाई हिंगोरानी ने केवल 4 कक्षा तक ही पढ़ाई की थी लेकिन उन्होंने मुझसे कहा कि वह मुझे कुछ ऐसा दिलाएंगी जो कोई ना छीन सके. यानी शिक्षा. अगला दशक हमने भले ही शरणार्थियों की तरह गुजारा लेकिन मेरी मां ने अपना वादा निभाया.

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बकौल दमयंती, उन्होंने पहली बार इंजीनियर शब्द 13 साल की उम्र में सुना था. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू उनके छोटे से शहर में पहुंचे थे. उन्होंने कहा था, "ब्रिटिश शासन के 200 साल बाद भी भारत के पास कोई इंडस्ट्री नहीं है, हमें इंजीनियर्स की जरूरत है. मैं केवल लड़कों से बात नहीं कर रहा हूं, मैं लड़कियों से भी ये कह रहा हूं."

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इतना सुनते ही मैंने तय कर लिया कि मुझे अपनी जिंदगी में क्या करना है. मैंने सोचा कि अब चाहे कुछ भी हो जाए,  मैं इंजीनियर ही बनूंगी. उस दिन में अपने घर गई और मैंने मां से कहा कि मैं पहली महिला इंजीनियर्स में से एक बनूंगी.

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मैं पहली महिला थी जिसने भारत के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया. इसमें कोई दोराय नहीं कि यह बहुत ही चुनौतियों से भरा हुआ था. पुरुषप्रधान व्यवस्था के बीच कैंपस में एक भी लेडीज वॉशरूम तक नहीं था. मैं 1 मील की दूरी तय करके अपनी बाइक से वॉशरूम जाती थी. हालांकि कुछ महीनों के भीतर डीन को एहसास हो गया कि मैं यहां टिकने के इरादे से आई हूं, इसलिए उन्होंने एक लेडीज रूम बनवा दिया.

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19 की उम्र में  मैंने हेनरी फोर्ड की बायोग्राफी पढ़ी और सपने देखने लगीं कि एक दिन मैं भी इसी कंपनी में ही काम करूंगी. भारत में कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद मेरे पैरेंट्स ने अपनी जिंदगी भर की कमाई अपनी बेटी के सपनों को पूरा करने में लगा दी. यह मेरे परिवार के लिए बहुत कठिन था लेकिन मेरी मां बहुत ही दूरदर्शी थी.

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उनकी सोच थी कि अगर एक बच्ची पढ़-लिख गई तो इससे पूरे परिवार का भविष्य बदल जाएगा. वह बिल्कुल सही थीं. बाद में मैं अपने छोटे-भाई-बहनों की मदद की और अपने पैरेंट्स को अमेरिका ले आई.

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मैं जनवरी 1967 में मोटर सिटी डेट्रायट पहुंची. मेरे पास ना तो स्नो बूट्स थे, ना गर्म जैकेट और ना ही कार. जब मैंने पहली बार फोर्ड में अप्लाई किया तो मुझे रिजेक्ट कर दिया गया पर मैंने हार नहीं मानी. मैंने कुछ महीनों बाद फिर से कोशिश की. कंपनी का एचआर हैरत में था.

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उन्होंने मेरे रेज्यूमे को देखा और कहा कि आप इंजीनियरिंग जॉब के लिए अप्लाई कर रही हैं लेकिन हमारे यहां तो कोई महिला है ही नहीं. मैंने उनसे कहा, मैं यहां हूं, अगर आप मुझे मौका नहीं देंगे तो आपकी कंपनी में कैसे कोई महिला कर्मचारी होगी. यह काम कर गया और मैं फोर्ड मोटर कंपनी में हायर की गई पहली डिग्रीधारी महिला इंजीनियर बन गई.

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उस वक्त ज्यादातर लोगों की अरेंज मैरिज ही होती थी लेकिन यूएस में मैं अपने होने वाली पति सुभाष से मिली. इसे ही हम लव मैरिज कहते हैं.  मेरी ड्रीम जॉब मिलने के बाद ये हुआ. मेरी पहली प्रेग्नेंसी के बाद मेरे बॉस ने मुझसे कहा कि अब मुझे काम नहीं करना चाहिए. मैं बच्चे को जन्म देने के बाद फिर से फोर्ड में दूसरी पोजिशन पर लौटी और 3 महीनों के भीतर मुझे प्रमोट कर दिया गया.

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मेरे दो बेटे हैं- संजय और सुनील जिन्होंने अपनी जिंदगी में बड़ी कामयाबी हासिल की. संजय न्यूरोसर्जन है और सीएनएन में चीफ मेडिकल कॉरेस्पोंडेट है. सुनील एक वकील है और उसने एमबीए किया है. वह फिलहाल यूएस कांग्रेस के लिए काम कर रहा है.

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सुभाष और मेरे 5 पोतियां हैं. मैंने कभी यह नहीं तय किया कि उन्हें क्या बनना है. जब वह खुद मेहनत करेंगी और उनका पैशन जगेगा, वे अपने आप एक दिन 'फर्स्ट' बन जाएंगी.

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