20 साल पूरे हो चुके हैं जब करगिल युद्ध में पाकिस्तान के सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देकर भारत ने विजय हासिल की थी. इस युद्ध में भारत के एक पायलट के. नचिकेता पाकिस्तानी सेना के हत्थे चढ़ गए थे. करगिल युद्ध के दौरान नचिकेता को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया था. आइए जानते हैं कैसे हुई उनकी स्वदेश वापसी और उन्हें क्या-क्या सहना पड़ा.
कारगिल युद्ध के दौरान नचिकेता भारतीय सेना के नौंवे स्क्वाड्रन में तैनात थे. यह स्क्वाड्रन युद्धग्रस्त बटालिक सेक्टर में तैनात था. करगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना के फाइटर पायलट नचिकेता को भारतीय वायु सेना की ओर से चलाए गए 'ऑपरेशन सफेद सागर' में MIG 27 उड़ाने का काम सौंपा गया था. उस वक्त उनकी उम्र 26 साल थी. 27 मई की तारीख थी. जब नचिकेता को 17 हजार फीट की
ऊंचाई पर रॉकेट दागने की जिम्मेदारी दी गई थी. जहां उन्होंने 17 फीट की ऊंचाई से
80mm के रॉकेट दागे थे. वहीं इसी बीचे उनका विमान MIG 27 का इंजन खराब हो
गया था. जिसके बाद उन्हें इजेक्ट करना पड़ा. वह पैराशूट की मदद से नीचे
उतरे. जहां वह उतरे वह पाकिस्तानी सीमा थी. जहां उन्हें
पाकिस्तानी आर्मी ने घेर लिया.
कुछ ही देर में पाकिस्तानी सेना ने उन्हें अपनी बंदी बना लिया था और रावलपिंडी की जेल में भेज दिया. जिसके बाद पाकिस्तानी सेना ने उन्हें लगातार 3 से 4 दिनों तक शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से टॉर्चर किया था. पाकिस्तानी आर्मी उनसे भारतीय आर्मी की जानकारी निकालने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया.
पाकिस्तान भारत से करगिल यु्द्ध के दौरान पहले ही हार चुका था. ऐसे में पाकिस्तान में कैद नचिकेता की खबरें इंटरनेशन मीडिया की सुर्खियां बन रही थी. जिसके बाद पाकिस्तान पर काफी दवाब बना और महज 8 दिन बाद पाकिस्तानी आर्मी ने नचिकेता को इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस को सौंपा.
इसके बाद नचिकेता को वाघा बॉर्डर के रास्ते भारत भेजा गया. नचिकेता ने 2016 में हिंदुस्तान टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में बताया, "मैं अपने शब्दों में उस पल का दर्द बयां नहीं कर सकता कि मुझे किस
स्थिति में रखा गया और क्या- क्या सहना पड़ा. उस वक्त मुझे महसूस हुआ कि
मरना ज्यादा आसान है. मैं आज शुकगुजार हूं कि उस वक्त भगवान और किस्मत मेरे
साथ थी."
तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जोरदार तरीके से उनका स्वागत किया. करगिल युद्ध 3 मई को शुरू हुआ था और 26 जुलाई 1999 को खत्म हुआ था.
वायु सेना में उनकी बहादुरी को देखते हुए नचिकेता को वायु सेना मेडल सम्मानित से किया गया है. उनका जन्म 31 मई 1973 को हुआ था. उन्होंने अपनी पढ़ाई दिल्ली में केंद्रीय विद्यालय से की. इसके बाद पुणे के करीब खडकवासला नेशनल डिफेंस अकेडमी में ट्रेनिंग ली. उन्होंने 1990 से साल 2017 तक वायु सेना को अपनी सेवा दी. बता दें, उनकी रैंक भारतीय वायुसेना में बातौर ग्रुप कैप्टन थी.
आपको बता दें, नचिकेता की स्वदेश वापसी जेनेवा संधि के तहत हुई थी. जेनेवा संधि मुख्य प्रकार से युद्ध बंदियों के मानवाधिकार को बनाए रखने के लिए बनाया गया था. संधि युद्ध के दौरान दुश्मन देश द्वारा पकड़े गए सैनिक के साथ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती और धमकी या अमानवीय व्यवहार नहीं किया जा सकता.