आज जब दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के पीछे भाग रही है. फीजिक्स के प्रो डॉ. एचसी वर्मा ने दो-टूक कहा है कि इंसानी दिमाग का कोई मुकाबला नहीं है. आइए जानते हैं दरभंगा के एक छोटे से कमरे से निकलकर IIT कानपुर के प्रोफेसर बनने तक का उनका दिलचस्प सफर जो किसी सक्सेस स्टोरी से कम नहीं है.
डॉ. वर्मा की शुरुआत बाकी बच्चों जैसी नहीं थी. गरीबी इतनी थी कि 9 साल की उम्र तक वे कभी स्कूल ही नहीं गए. जब सीधे छठी कक्षा में दाखिला हुआ, तो उन्हें पता ही नहीं था कि इम्तिहान क्या होता है. नतीजा यह हुआ कि वे हर विषय में फेल हो गए. कई विषयों में तो उन्हें 'जीरो' नंबर मिले. लेकिन उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी. जब वे फेल होते, तो पिता कहते कि शायद स्कूल खराब है और उनका दाखिला दूसरे स्कूल में करा देते. डॉ. वर्मा कहते हैं कि मैं नंबर भले ही खराब लाता था, लेकिन सीखने में मुझे हमेशा मजा आता था.
मां का 'ठेकुआ वाला फॉर्मूला' और बदल गई जिंदगी
डॉ. वर्मा को पढ़ाई की पटरी पर लाने का श्रेय उनकी मां को जाता है, जो खुद कभी स्कूल नहीं गईं. उन्होंने एक अनोखी डील की. मां ने कांच के डब्बे में बिहार का मशहूर 'ठेकुआ' भरकर रखा और कहा कि एक घंटा किताब लेकर बैठोगे, तो दो ठेकुआ मिलेंगे.
बस, उन मीठे ठेकुओं के चक्कर में नन्हे हरीश कमरे में बैठकर किताबें पलटने लगे. धीरे-धीरे उन्हें पढ़ने में आनंद आने लगा. इसका असर यह हुआ कि 9वीं क्लास में वे पहली बार सभी विषयों में पास हुए.
क्लास के लेक्चर से बने 'गोल्ड मेडलिस्ट'
डॉ. वर्मा के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि किताबों के लिए पैसे नहीं जुट पाते थे. उनके बड़े भाई ने भी बिना किताबें खरीदे ही गोल्ड मेडल जीता था. इसी संस्कार के साथ डॉ. वर्मा ने भी पढ़ाई की. वे क्लास में टीचर की हर बात को इतने ध्यान से सुनते थे कि उन्हें घर आकर पन्ने पलटने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी.
फिजिक्स से ऐसे जुड़ा रिश्ता
डॉ. वर्मा असल में गणित के प्रोफेसर बनना चाहते थे. लेकिन उनके एक शिक्षक ने उन्हें सलाह दी कि फिजिक्स में जाओगे तो 'डबल आनंद' मिलेगा. गणित का साथ भी बना रहेगा और दुनिया को समझने का मौका भी मिलेगा. इसी सलाह ने देश को एक ऐसा शिक्षक दिया जिसने भौतिकी (Physics) को हर छात्र के लिए आसान बना दिया.
AI को चुनौती: हमारा कोई मुकाबला नहीं
आज के दौर में जब छात्र पढ़ाई के लिए AI पर निर्भर हो रहे हैं, डॉ. वर्मा ने चेतावनी दी है. उनका कहना है कि AI की वजह से नई पीढ़ी की सोचने की क्षमता घट रही है. वे कहते हैं कि एआई हमें नहीं हरा सकता. हम जीत कर आएंगे क्योंकि हम अच्छे काम करना जानते हैं. यहां दिए वीडियो में देखिए उन्होंने किस तरह एआई को दी चुनौती.
पद्मश्री मिला, पर आज भी नेमप्लेट पर नहीं लिखा नाम
इतनी शोहरत और देश का प्रतिष्ठित 'पद्मश्री' सम्मान मिलने के बाद भी डॉ. वर्मा वैसे ही सादे इंसान हैं. उनके घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर आज भी 'पद्मश्री' नहीं लिखा है. वे आज भी अकेले ही इंटरव्यू देने पहुंच जाते हैं, बिना किसी बाउंसर या तामझाम के. डॉ. वर्मा का संदेश है कि सीखना और परीक्षा में नंबर लाना दो अलग बातें हैं. तड़क-भड़क से बचें और अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखें.
आजतक एजुकेशन डेस्क