भारत की विविधता का इस्तेमाल राजनीतिक दल अपने वोट बैंक के तौर पर करते हैं. हिंदुओं को आक्रमणों का पीड़ित बताकर, दलितों को जातिगत उत्पीड़न का शिकार दिखाकर और मुसलमानों को बहुसंख्यकवाद से दबा हुआ वर्ग बताकर अलग अलग ग्रुप्स को आपस में लड़ाते हैं. इस संस्कृतिक विविधता का हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का नतीजा यह है कि सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने वाली एक निष्पक्ष व्यवस्था बनने के बजाय, सामाजिक दरारें गहरी हो रही हैं.
2026 के यूजीसी के नए नियम भी इसी शस्त्रीकरण का एक उदाहण है. दरअसल, इस तरह के फैसले कमजोरों की रक्षा करने वाली ढाल नहीं बनते बल्कि ये उन्हें एक ऐसी तलवार से लैस कर देते हैं जिसका इस्तेमाल दूसरों के खिलाफ किया जा सकता है, जिससे कैंपस एक 'युद्धक्षेत्र' में तब्दील हो जाते हैं.
यूजीसी शील्ड
हाल ही में जनवरी में UGC Regulations, 2026 अधिसूचित किए गए, जिन्हें जाति-आधारित भेदभाव को रोकने वाले नियम बताया गया. इनके अनुसार, हर उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र, इक्विटी कमेटी (जिनमें SC, ST, OBC, महिला और दिव्यांग सदस्य होना आवश्यक है.), 24/7 हेल्पलाइन, जागरूकता कार्यक्रम होना चाहिए.
सजा भी का भी प्रावधान
अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो उसके लिए सजा का भी प्रावधान है, जिसमें यूजीसी से मिलने वाली फंडिंग वापस लेना, योजनाओं को निलंबित करना, डिग्री प्रोग्राम्स सस्पेंड करना या मान्यता रद्द करना या लिस्ट से नाम हटाना आदि शामिल हैं. ये नियम एससी, एसटी के साथ ही ओबीसी छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को भी खास सुरक्षा प्रदान करते हैं. इसके साथ ही इसमें जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता, जन्म स्थान के आधार पर होने वाले भेदभाव भी शामिल हैं.
इस नियमों का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि यूजीसी का ये नियम समावेशी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर आधारित है और इसका लंबे समय से इंतजार हो रहा था. वे जातिगत भेदभाव के मामलों में हुई बढ़ोतरी और रोहित वेमुला, पायल ताडवी के सुसाइड जैसी घटनाओं का हवाला देते हुए कहते हैं कि कमजोर व्यवस्थाएं, कमजोर बैकग्राउंड वाले छात्रों की मदद करने में विफल रहीं.
भेदभाव की तलवार
कोई भी कानून जिसका दुरुपयोग होने की संभावना हो, वह भेदभावपूर्ण होता है. इसका उद्देश्य न्याय के तराजू को संतुलित करना है, लेकिन यह उसे एक ही दिशा में झुका दे रहा है. इसका रिजल्ट होता है न्याय का मजाक. यूजीसी सिर्फ अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोगों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को ही जाति-आधारित भेदभाव के रूप में परिभाषित करता है.
वहीं, जनरल वर्ग के व्यक्तियों को पीड़ित का दर्जा देने से मना करते हुए ये कानून अप्रत्यक्ष रूप से यह सुझाव देता है कि उनकी पहचान के आधार पर उन्हें परेशान नहीं किया जा सकता. यह महज़ एक चूक नहीं है. यह इस सिद्धांत का भी घोर उल्लंघन है कि जिसमें कहा जाता है कि न्याय को शिकायतकर्ता के बैकग्राउंड से अप्रभावित रहना चाहिए.
शिकायतों के समाधान का ये सिस्टम कुछ ऐसा ही नजर आता है. इक्विटी कमेटियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए, लेकिन जनरल वर्ग के प्रतिनिधित्व के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे इस स्ट्रक्चर को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं.
'बदले की भावना के लिए कोई सजा नहीं'
खास बात ये है कि धारा 10 को हटाकर यूजीसी ने प्रभावी रूप से शिकायतों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की खुली छूट दे दी है, जिसमें स्पष्ट रूप से झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर दंडित करने का प्रावधान था.
जब झूठ बोलने की कीमत शून्य हो और आरोप लगाने की कीमत पूरा करियर, तो कानून सच्चाई खोजने का माध्यम नहीं रह जाता. फिर यह एक ऐसी व्यवस्था बन जाती है जो शिकायत पोर्टल पर सबसे पहले पहुंचने वाले व्यक्ति को पुरस्कृत करती है, भले ही उसका मकसद दुर्भावनापूर्ण हो.
अस्पष्टता का सिद्धांत
यूजीसी ने 'भेदभाव' की अस्पष्ट परिभाषा दी है. नियमों के अनुसार, किसी भी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता या इनमें से किसी भी आधार पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से किया गया कोई भी अनुचित, पक्षपातपूर्ण व्यवहार भेदभाव है. इसके साथ ही इसमें समान शिक्षा व्यवस्था को खत्म करने या उसे प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया बहिष्कार, वरीयता आदि भी इसमें शामिल हैं.
इसका असल मतलब क्या है? स्पष्ट मापदंड के बिना यूजीसी कैसे "समानता का हनन" और "मानवीय गरिमा के साथ भेदभाव" जैसे शब्दों को परिभाषित करता है? इसका अर्थ तो ये निकलता है कि होगा वही, जो कमेटी चाहती है.
अब दिक्कत एकदम स्पष्ट है कि अगर कोई कानून इतना अस्पष्ट रूप से तैयार किया गया है कि बिना सबूत के भी उसका इस्तेमाल किसी का करियर बर्बाद करने के लिए किया जा सकता है, तो वह सुरक्षात्मक होने के बजाय शोषणकारी बन जाता है. न्याय को बढ़ावा देने के बजाय, यह कैंपस में भय और भय का माहौल बनाता है.
गैर जरूरी कानून
दरअसल, इससे पहले ही पिछड़े वर्ग के लिए देश में पहले से ही दुनिया के सबसे शक्तिशाली कानून हैं, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम है.
यह अधिनियम पहले से ही पर्याप्त है, जिसमें मौखिक अपमान से लेकर शारीरिक हिंसा और व्यवस्थागत बहिष्कार तक सब कुछ शामिल है. वैसे नए नियम बनाने के बजाय, इस अधिनियम को बेहतर कवरेज (अन्य वर्गों को शामिल करके) और अधिक प्रभावशीलता के लिए संशोधित किया जा सकता था. इस मौजूदा विकल्प के बावजूद 2026 के नियमों का तैयार किया जाना यह दर्शाता है कि लक्ष्य सुरक्षा नहीं, बल्कि एक गैर-न्यायिक व्यवस्था का निर्माण करना है.
भारत अपने अमृत काल का जश्न मना रहा है और वह परिवर्तनकारी दौर जब विकास का अमृत अतीत के विषों को प्रतिस्थापित करने की उम्मीद है. लेकिन यहां एक विचारणीय सवाल है कि भारत कब तक 'अन्य लोगों द्वारा किए गए अन्याय' को दूर करने का प्रयास करता रहेगा? एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह पूछने का साहस आवश्यक है: 'न्याय कैसे होगा—और कब तक दूसरों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी?' लेकिन भारत में, इन सवालों को इतना पवित्र माना जाता है कि इन पर बहस भी नहीं होती.
आरक्षण पर होने वाली बहस की अपारदर्शिता पर जरा गौर कीजिए. भारतीय संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को मूल रूप से सिर्फ दस सालों के लिए एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर देखा था. इसका उद्देश्य यह था कि आगे चलकर समानता और अवसरों की ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें सभी को बिना किसी को नुकसान पहुंचाए बराबर अवसर मिले. लेकिन, 75 साल बाद भी इसे एक स्थायी अधिकार की तरह बढ़ाया जा रहा है, बिना किसी स्पष्ट लक्ष्य के, बिना किसी केआरए के, बिना गंभीर सार्वजनिक बहस के और यह आकलन किए बिना कि योग्यता (मेरिट) को इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है.
UGC के नए नियम भी इसी राह पर चलते दिखाई देते हैं. इनका लक्ष्य यह नहीं है कि एक समय ऐसा आए जब पहचान आधारित सुरक्षा की जरूरत खत्म हो जाए, बल्कि ये पहचान को ही ढाल और हथियार के रूप में संस्थागत रूप दे रहे हैं, जिससे कैंपस में जाति एक प्रभावशाली औज़ार बनी रह सकती है.
न्याय में देरी होना तो न्याय से वंचित होना है ही, लेकिन अगर न्याय को हथियार बना दिया जाए, तो न्याय स्वयं नष्ट हो जाता है.
संदीपन शर्मा