यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च संस्थानों में जातिगत भेदभाव को खत्म करने और समानता का माहौल बनाए रखने के लिए एक नया नियम (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations) बनाया है. इस नियम को सभी कॉलेज और विश्वविद्यालयों में लागू किया जाना है. अब विडंबना ये है कि जिस नए कानून को कॉलेज परिसर में समानता का माहौल बनाए रखने का जरिया बताकर लागू किया गया, वही दूसरे वर्ग के लोगों में भेदभाव और पक्षपात पनपने का कारण बनता जा रहा है. यही वजह है कि बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इसे अंग्रेजों का काला कानून रॉलेट एक्ट बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
यूजीसी के नए नियम - Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लेकर मचे बवाल के बीच इसकी तुलना रॉलेट एक्ट से की जा रही है. ऐसे में जानते हैं कि ये रॉलेट एक्ट आखिर था क्या और क्यों ऐसा कहा जा रहा है.
क्या था रॉलेट एक्ट
1919 में ब्रिटिश सरकार भारत में राष्ट्रवादी आंदोलनों को दबाने के लिए रॉलेट एक्ट लेकर आई थी. इसमें ऐसे प्रावधान थे, जिसमें सिर्फ संदेह के बिना पर आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता था. इसके लिए किसी आरोप, वारंट और मुकदमें की जरूरत नहीं होती थी. यहां तक कि बिना जूरी के सजा देने का भी प्रावधान था.
अप्रैल 1918 में समिति ने सिफारिश की कि भारत रक्षा अधिनियम (1915) के तहत लागू किए गए आपातकालीन युद्धकालीन कानूनों को युद्ध खत्म होने के छह महीने बाद भी स्थायी कर दिया जाए. इन कानूनों का इस्तेमाल प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने और राष्ट्रवादी राजनीति को कुचलने के लिए किया गया था. इसके तहत ब्रिटिश अफसरों को कट्टरपंथी राजनीतिक गतिविधि में संदिग्ध किसी भी व्यक्ति को अनिश्चित काल के लिए हिरासत में रखने की अनुमति थी.
रॉलेट एक्ट के प्रावधान
18 मार्च 1919 को ब्रिटिश सरकार की इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने आयोग की सिफारिशों पर आधारित एक विधेयक को जल्दबाजी में पारित कर रॉलेट एक्ट को कानून बना दिया. जबकि, काउंसिल के सभी भारतीय सदस्यों ने इसके खिलाफ मतदान किया था. रॉलेट एक्ट ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों को छीन लिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व प्रेस की आजादी पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए. इससे सरकार को औपनिवेशिक शासन के किसी भी वास्तविक या काल्पनिक विरोध को दबाने की शक्ति मिल गई.
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इसके प्रमुख प्रावधानों के तहत राजद्रोह के संदेह में किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट या मुकदमे के गिरफ्तार किया जा सकता था. उसकी तलाशी ली जा सकती थी और उसे हिरासत में लिया जा सकता था. आरोपियों पर विशेष अदालतों में बिना जूरी के, जनता की नजरों से दूर मुकदमा चलाया जा सकता था और उन्हें कानूनी प्रतिनिधित्व की अनुमति नहीं थी और न ही वे मुकदमे के परिणाम के खिलाफ अपील कर सकते थे.
यूजीसी के नए नियम की क्यों हो रही इससे तुलना
अब यूजीसी के नए इक्विटी रूल की रॉलेट एक्ट से तुलना की जा रही है. क्योंकि इस नए नियम के प्रावधान के तहत कोई भी पीड़ित इक्विटी कमेटी को लिखित कंप्लेन कर सकता है. समिति शिकायतकर्ता की पहचान उजागर किए बिना इस पर कार्रवाई के लिए पुलिस को बढ़ा देगी. इसके बाद आरोपी पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी. इस बिंदू पर नाराजगी जताई जा रही है कि प्रावधान में ये कहीं उल्लेख नहीं है कि आरोप लगाने वाले को साक्ष्य देना होगा.
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इसलिए बहुत ज्यादा संभावना है कि ऐसे में झूठे आरोप लगाए जाएंगे और उन पर कार्रवाई भी कर दी जाएगी. अगर कोई शिकायतों को झूठा साबित कर भी देता है तो नियम में झूठे आरोप लगाने वालों पर की जाने वाली कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है.
इसके अलावा नए नियम के तहत इक्विटी सेंटर, इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वाड बनाने का भी प्रावधान है. इनमें कहीं भी किसी भी कमेटी या सेंटर के सदस्य के तौर पर सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व का प्रावधान नहीं है. इस वजह से भी लोग इसे एकतरफा बताकर इसका विरोध कर रहे हैं.
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