जब हम बड़े हो रहे होते हैं तो हमें स्कूल में अच्छा रिजल्ट लाने का प्रेशर होता है. फिर हमें बताया जाता है कि सफल वही है जिसका अच्छा करियर है, जो मोटी सैलरी कमा रहा है. बीवी-बच्चों को हर खुशी दे पा रहा है. लेकिन ये सब कमाने के दौरान कुछ तो मिसिंग हो जाता है शायद दोस्ती, अपनों का साथ या खुशी? सोशल मीडिया पर एक आई प्रोफेशनल ने अपने मन की बात साझा की है जिस पर लोग अपनी तरह से रिएक्शन दे रहे हैं.
X पर Confessions and realities नाम से अपनी पोस्ट लिखते हुए एक शख्स ने लिखा कि मैं 42 साल का हूं. मैं आईटी सेक्टर में चेन्नई में एक सीनियर पोस्ट पर हूं. मेरी वाइफ बहुत सपोर्टिव है, दो बच्चे हैं. कहने को मेरे पास सबकुछ है जो एक परफेक्ट लाइफ के लिए जरूरी है. हर किसी को मेरी लाइफ परफेक्ट नजर भी आती है मैंने जीवन में वो हर शय हासिल की है, जिसके लिए समाज में कहा जाता है कि हर आदमी को ये अचीव करना चाहिए.
जब मेरे पास थे दोस्त
जब मैं 20वें साल में था, जिंदगी कुछ अलग थी. वक्त बिताने के लिए मेरे पास दोस्त थे. हम साथ में मरीना बीच से लेकर बसंत नगर बीच तक घूमते थे.हम रोहिणी, उदयम और कासी थियेटर्स में साथ में फिल्में देखते थे. अपनी RX100 में हम माउंट रोड में राइड करते थे.
फिर अपने 30वें साल में मेरे पास कलीग थे जिनसे टी ब्रेक्स पर मैं बातें किया करता था. हम अपार्टमेंट्स, ऑनसाइट ट्रिप्स की बातें करते थे. कभी कभी जिंदगी और काम की बातें कर लिया करते थे.
पर अब अपनी उम्र के 40वें पड़ाव में जिंदगी जैसे एक ढर्रे में ढल गई है. मेरे फोन पर रेयरली ही कोई पर्सनल कॉल आता है. ज्यादातर फोन ऑफिस के काम के या बैंक अलर्ट्स होते हैं. हां ये जरूर होता है कि कभी कभी घर से फोन आता है ये कहने के लिए कि रास्ते से लौटते वक्त दूध की थैली पकड़ लेना.
सब होने के बाद भी लगता है अधूरा
एक आदमी के 40वें पड़ाव में उसका अकेलापन अजीब ही होता है. मैं शारीरिक रूप से अकेला नहीं हूं पर अक्सर मुझे महसूस होता है कि मैं महज एक मशीन बन गया हूं.
जिस वक्त मैं घर में कदम रखता हूं तो मैं सिर्फ 'अप्पा' होता हूं. मैं वो इंसान हूं जो स्कूल की फीस भरता है, घर का खराब वाई-फाई ठीक कराता है और रिपेयर के दूसरे काम देखता है. मेरी पत्नी अपने काम और बच्चों में मशरूफ है और मेरे बच्चे अब टीनेजर हो गए हैं. वो अपनी ही दुनिया और अपने ही कमरों में सिमटे रहते हैं. वे मुझसे प्यार तो करते हैं, पर उनकी नजरों में मेरी पहचान बस इतनी है कि मैं उन्हें सुख-सुविधा और स्थिरता देने वाला एक जरिया हूं. वे मुझे एक इंसान के तौर पर देख ही नहीं पाते.
हर जवाब है मेरे पास...
दफ्तर में मैं 'सीनियर' हूं. वहां सब यही उम्मीद करते हैं कि मेरे पास हर सवाल का जवाब होगा. मैं अपनी टीम से ये नहीं कह सकता कि मैं थक गया हूं यार. मैं अपने बॉस को ये नहीं बता सकता कि नई तकनीक के साथ कदम मिला कर चलने में मुझे कभी-कभी मुश्किल होती है. मुझे हर हाल में आत्मविश्वास से लबालब और स्ट्रॉन्ग दिखना पड़ता है, भले ही भीतर ही भीतर मुझे भविष्य की चिंता खाए जा रही हो.
कभी-कभी दफ्तर से घर लौटते वक्त मैं गाड़ी बहुत धीरे चलाता हूं ताकि बस कुछ पल कार में खुद के साथ बिता सकूं. मैं अपने कॉलेज के दिनों के गाने सुनता हूं. उन 15 मिनटों के लिए मैं न कोई मैनेजर होता हूं, न कोई फादर. मैं बस 'मैं' होता हूं.
अब मुझे एहसास हुआ है कि सालों बीत गए, मैंने किसी से भी अपने मन की बात नहीं की. पुराने दोस्त अब बस व्हाट्सएप पर कुछ नामों की तरह रह गए हैं. हम एक-दूसरे को 'हैप्पी बर्थडे' या 'बधाई' के मैसेज तो भेज देते हैं, पर बात शायद ही कभी होती है. जब हम शादियों में मिलते हैं तो हमारी बातें बच्चों के ग्रेड्स या गाड़ियों के मॉडल के इर्द-गिर्द घूमती हैं. हम कभी इस बारे में बात नहीं करते कि हम असल में क्या महसूस कर रहे हैं.
नहीं कर सकता शिकायत
सबसे मुश्किल बात ये लगती है कि मैं शिकायत भी नहीं कर सकता. अगर मैं अपने परिवार से कहूं कि मुझे अकेलापन महसूस होता है तो वो हैरानी से देखते हैं और कहते हैं, 'पर हम सब तो आपके साथ हैं.'
वो ये नहीं समझते कि एक इंसान भीड़ से घिरा होकर भी खुद को किसी वीरान टापू पर महसूस कर सकता है.
समाज पुरुषों को यही सिखाता है कि अगर तुम पैसा और सुरक्षा दे पा रहे हो तो तुम जीवन में सफल हो. लेकिन कोई हमें ये नहीं सिखाता कि उस सफलता के साथ जो खामोशी आती है, उससे कैसे निपटा जाए.
निवेदिता गुप्ता