30 साल की कॉर्पोरेट जॉब, अब रिटायरमेंट के बाद स्‍कूल खोलकर बांट रहीं मोरल एजुकेशन

सीमा पिछले 7 सालों से गुड़गांव की बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रही हैं. ये वो बच्चे हैं जो गुड़गांव की बस्तियों में रहते हैं. इनके घर के आसपास कोई स्कूल नहीं है इसलिए पहले यह स्कूल नहीं जा पाते थे, लेकिन सीमा की पहल के कारण आज यह बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं.

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Teacher Seema Seth: Teacher Seema Seth:

तेजश्री पुरंदरे

  • गुरुग्राम,
  • 20 सितंबर 2022,
  • अपडेटेड 5:23 PM IST

हमारे समाज में कुछ ऐसे बच्चे हैं जो आर्थिक रूप से बेहद कमज़ोर होने के कारण या फिर स्कूल में दाखिला न मिल पाने के कारण पढ़ाई से और शिक्षा से वंचित रह जाते हैं. ऐसे बच्चों का भविष्य अंधेरे से घिरा रहता है. लेकिन ऐसे ही बच्चों की जिंदगी में रोशनी ला रही हैं 66 वर्षीय सीमा सेठ.

सीमा पिछले 7 सालों से गुरुग्राम की बस्तियों में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रही हैं. ये वो बच्चे हैं जो गुरुग्राम की बस्तियों में रहते हैं. इनके घर के आसपास कोई स्कूल नहीं है इसलिए पहले यह स्कूल नहीं जा पाते थे, लेकिन सीमा की पहल के कारण आज यह बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं.

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दरअसल, सीमा ने इन बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी उठाते हुए एक ऐसे स्कूल की शुरुआत की है जहां पर उन्हें शिक्षा के साथ-साथ संस्कार और बेसिक बिहेवियर भी सिखाया जा रहा है. कक्षा नर्सरी से कक्षा 5वीं तक का यह स्कूल बच्चों को शिक्षा की नई दिशा दे रहा है.

सीमा बताती हैं कि उन्होंने इस स्कूल की शुरुआत महज 10 बच्चों से की थी, लेकिन अब उनके साथ कुल 180 से भी ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं. आपको जानकर हैरानी होगी की 66 वर्षीय सीमा ने अपने जिंदगी के 30 साल कॉरपोरेट की दुनिया में बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हुए बिताए. रिटायर होने के बाद उनका मन था कि समाज की भलाई के लिए कुछ ऐसा करें जिससे किसी की जिंदगी में बदलाव आ सके. इसके बाद से ही उन्होंने ठान लिया कि वे अपना बचा हुआ जीवन इन्हीं बच्चो के लिए समर्पित करेंगी. 

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उनका कहना है कि इन बच्चों को शिक्षित कर उन्हें गर्व होता है. वे कहती हैं कि उनके द्वारा पढ़ाए गए बच्चे आज DPS जैसे स्कूलों में दाखिला लेकर आगे की पढ़ाई कर रहे हैं. बच्चों को स्कूल की पढ़ाई के अलावा, गुड टच-बैड टच, सेल्फ डिफेंस, जनरल अवेरनेस की भी ट्रेनिंग दी जाती है. जब यह बच्चे उनके पास आते हैं तब उन्हें बेसिक हैंड वाश जैसी आदतों के बारे में भी जानकारी नहीं होती. उन्हें इसी स्कूल में इन सभी आदतों का पाठ पढ़ाया जाता है.

सीमा कहती हैं कि इन बच्चों को पढ़ाने में सबसे बड़ी चुनौती भाषा की आती है. चूंकि इनके माता पिता प्रवासी मजदूर हैं और जयादातर लोग बंगाल से आए हैं, इसलिए इन्हें समझना और समझाना दोनों ही एक चुनौती है. उनका कहना है कि हमारे यहां के टीचर्स पूरी कोशिश करते हैं कि इन्हें सबकुछ सिखाया जाए. सीमा का सपना है कि वे आने वाले समय में इसी तरह से ज्यादा से ज्यादा बच्चों को अपने इस मिशन से जोड़े और उन्हें शिक्षा दें.

 

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