स्कूलों में NCERT की जगह महंगी किताबें क्यों? प्राइवेट पब्लिशर्स की मनमानी पर NHRC ने मांगा जवाब

NHRC के इस एक्शन के बाद अब राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक शोषण न हो. शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह आदेश सख्ती से लागू हुआ, तो आने वाले सत्र में अभिभावकों को हजारों रुपये की राहत मिल सकती है.

Advertisement

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 23 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:06 PM IST

देश के निजी स्कूलों में हर साल अभिभावकों की जेब पर पड़ने वाले 'महंगी किताबों' के बोझ को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया है. आयोग ने छात्रों और अभिभावकों पर निजी पब्ल‍िशर्स की महंगी किताबें खरीदने के लिए दबाव डालने के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर दिया है.

Advertisement

एनएचआरसी मेंबर प्रियंक कानूनगो की खंडपीठ का कड़ा रुख यह पूरी कार्रवाई नमो फाउंडेशन की उस शिकायत के आधार पर हुई है, जिसमें निजी स्कूलों द्वारा कमीशन के चक्कर में महंगी और भारी-भरकम किताबें थोपने का आरोप लगाया गया था. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने न केवल राज्यों से रिपोर्ट मांगी है, बल्कि शिक्षा मंत्रालय को भी जवाब तलब किया है.

क्या इसे 'अकादमिक भेदभाव' माना जाए? 
आयोग ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाया है. NHRC के अनुसार, सरकारी और निजी स्कूलों में अलग-अलग पाठ्यक्रम और अलग-अलग किताबें लागू करना अकादमिक भेदभाव की श्रेणी में आ सकता है. आयोग ने पूछा है कि जब देश में SCERT और NCERT जैसी संस्थाएं मानक पुस्तकें तैयार करती हैं तो निजी प्रकाशकों की किताबों को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?

Advertisement

आयोग ने राज्यों से मांगे इन 3 बिंदुओं पर जवाब 
1. क्या स्कूलों में भारी बस्तों के बोझ को कम करने के लिए तय नीति का पालन हो रहा है?
2. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) की धारा 29 के तहत निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रियाओं और मानकों का पालन सुनिश्चित किया गया है या नहीं?
3. निजी स्कूलों में NCERT की जगह निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें चलाने के पीछे क्या ठोस आधार है?

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement