लड़कियां पढ़ाई में आगे, जॉब्स में पीछे क्यों? सवाल पर क्या बोले एक्सपर्ट्स

इंडिया टुडे एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 में शिक्षा के बदलते ट्रेंड, नई चुनौतियों समेत क्लासरूम में हो रहे बदलावों और साथ ही लर्निंग प्रोसेस को लेकर भी बातचीत हुई. वक्ताओं ने अपने-अपने तर्कों को लोगों के सामने रखा.

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इंडिया टुडे एजुकेशन कॉन्क्लेव में एक्सपर्ट्स ने लर्निंग प्रोसेस पर बात की इंडिया टुडे एजुकेशन कॉन्क्लेव में एक्सपर्ट्स ने लर्निंग प्रोसेस पर बात की

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 09 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:10 PM IST

इंडिया टुडे एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 में देशभर से शिक्षक और शिक्षा विशेषज्ञ जुटे. इस कॉन्क्लेव में शिक्षा के बदलते ट्रेंड, नई चुनौतियों समेत क्लासरूम में हो रहे बदलावों और साथ ही लर्निंग प्रोसेस को लेकर भी बातचीत हुई. इस बातचीत में सामने आया कि, भारत में स्कूलों तक पहुंच का मुद्दा काफी हद तक सुलझ चुका है, लेकिन लर्निंग प्रोसेस को लेकर अभी भी गंभीर संकट बना हुआ है. 

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एएसईआर सेंटर की निदेशक विलिमा वाधवा ने कहा कि लंबे समय तक हाई नॉमिनेशन कमजोर लर्निंग आउटकम्स को छिपाता रहा है. हालात यह हैं कि ऊंची कक्षाओं में पहुंचने के बावजूद कई बच्चे न तो ठीक से पढ़ पाते हैं और न ही बुनियादी सवालों (खासकर मैथमेटिक्स के ) को हल कर पाते हैं. 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्या पड़ा है असर?
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान (Foundational Literacy and Numeracy) में जो सुधार दिख रहा है, वह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और निपुण भारत मिशन के असर को दर्शाता है. लेकिन प्राइमरी लेवल के बाद सीखने की रफ्तार तेजी से धीमी पड़ जाती है, इससे बच्चों की समझ में मौजूद खामियां आगे की कक्षाओं में और गहरी होती चली जाती हैं.

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वहीं, एजुकेट गर्ल्स की हेड ऑफ पार्टनरशिप्स अलका सिंह ने कहा कि सिर्फ नाम लिखवाने (नेम रजिस्ट्रेशन) से यह तय नहीं होता कि बच्चे नियमित रूप से स्कूल आएंगे, पढ़ाई जारी रखेंगे या वास्तव में सीख पाएंगे, खासकर लड़कियों के मामले में.

उन्होंने बताया कि स्कूलों में ज्यादा अनुपस्थिति, कक्षा 8 से 9 में जाने के दौरान कमजोर ट्रांजिशन और सामाजिक बाधाएं कई बच्चों को पढ़ाई से बाहर कर देती हैं. 

क्या है वर्कप्लेस पर कम लड़कियों की वजह?
अलका सिंह ने लड़कियों के बढ़ते पास प्रतिशत पर होने वाले जश्न पर भी सवाल उठाए. उन्होंने SDG के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा, 'भारत में 13 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न शिक्षा में हैं, न रोजगार में, न ट्रेनिंग में. इनमें 9 करोड़ लड़कियां हैं, अगर ज्यादा लड़कियां पास हो रही हैं, तो वे वर्कफोर्स में क्यों नहीं दिख रहीं?' सीमित गतिशीलता, बिना भुगतान वाला केयर वर्क और अवसरों की कमी, ये सब मिलकर लड़कियों को स्कूल के बाद भी सिस्टम से बाहर धकेल देते हैं.

NEP में आ रही दिक्कतों पर दोनों वक्ताओं ने शिक्षकों या इंफ्रास्ट्रक्चर को अकेला जिम्मेदार मानने से इनकार किया. वाधवा ने कहा कि, यह सिर्फ अर्थशास्त्र का सवाल नहीं, यह राजनीतिक अर्थशास्त्र का मामला है, उन्होंने सीखने के ट्रांजिशन को आसान बनाने पर जोर दिया, सिर्फ कक्षा 1 के लिए नहीं, बल्कि कक्षा 5 से 6 जैसे अहम पड़ावों पर भी ध्यान देना जरूरी है.

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सिंह ने विभागों के बीच तालमेल की कमी को बड़ी बाधा बताया, 'प्री-स्कूल, स्किलिंग और ओपन स्कूलिंग, इन सबके लिए अलग-अलग मंत्रालयों को साथ काम करना होगा. यह आसान नहीं रहा है.'

कैसे हल होगी लर्निंग क्राइसिस?
एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 में दोनों वक्ताओं ने सीखने के अंतर को पाटने के लिए कैच-अप रणनीतियों, समुदाय की मजबूत भागीदारी, नीतियों के बेहतर समन्वय और स्किलिंग को आकांक्षात्मक बनाने पर जोर दिया. वक्ताओं का कहना था कि जब तक शिक्षा सीधे आजीविका से नहीं जुड़ती, खासकर लड़कियों के लिए, तब तक यह लर्निंग क्राइसिस पूरी तरह हल नहीं हो पाएगी.

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