देश में शिक्षा माफियाओं और ठगों द्वारा कागजों पर फर्जी यूनिवर्सिटी खोलने की बातें तो आपने अक्सर सुनी होंगी, मगर कोई चुनी हुई सरकार ही यही काम करने लगे तो क्या कहा जाए? राजस्थान से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है. यहां सरकार की कई यूनिवर्सिटीज सिर्फ किराए के कमरों में, कागजों पर चल रही हैं. धरातल पर न तो इनका कोई भवन है, न पर्याप्त स्टाफ और न ही कोई छात्र. लेकिन इन 'भूतिया' विश्वविद्यालयों के नाम पर सरकारी खजाने से हर साल करोड़ों रुपये धड़ल्ले से स्वाहा हो रहे हैं. 'आजतक' संवाददाता ने जब जयपुर के शिक्षा संकुल पहुंचकर इन विश्वविद्यालयों की जमीनी हकीकत टटोली, तो प्रशासनिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ती नजर आईं.
अहिल्याबाई होलकर भवन और तीन-तीन यूनिवर्सिटी के बोर्ड!
जयपुर के शिक्षा संकुल परिसर स्थित 'पुण्यश्लोका देवी अहिल्या बाई होलकर भवन' में घुसते ही आपको एक साथ तीन-तीन विश्वविद्यालयों के बोर्ड दिखाई दे जाएंगे. ये नाम हैं- बाबा आम्टे दिव्यांग विश्वविद्यालय, विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय और हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय.
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के दफ्तर में हर जगह बकायदा 'ऐरो' (तीर) का निशान दिखाकर बताया गया है कि दूसरे तल पर ये विश्वविद्यालय चलते हैं. 'aajtak.in' की टीम सबसे पहले बाबा आम्टे दिव्यांग विश्वविद्यालय की तरफ गई. वहां कुलगुरु (वाइस चांसलर) के कमरे में एसी और पंखा तो चल रहा था, मगर कुर्सी पर कोई मौजूद नहीं था.
आगे बढ़ने पर विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय का बोर्ड दिखा, जहां तीन कर्मचारी मोबाइल में पूरी तरह व्यस्त नजर आए. जब टीम कुलगुरु के कमरे की तरफ जाने लगी, तो वाइस चांसलर (जिनका पदनाम राजस्थान में बदलकर अब 'कुलगुरु' कर दिया गया है) डॉ. देवस्वरूप पीछे से आवाज लगाते हुए आए. आपको जानकर हैरत होगी कि इन दोनों ही विश्वविद्यालयों के कुलगुरु एक ही व्यक्ति हैं, डॉ. देवस्वरूप, जो इसी महीने 31 मई को रिटायर होने वाले हैं. इनसे जब दोनों विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली और गतिविधियों के बारे में जानने की कोशिश की गई, तो इनके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं था.
क्या बोले कुलगुरु
कुलगुरु डॉ. देवस्वरूप कैमरा बंद करवाकर दफ्तर में बैठाया और पानी पिलाते हुए बोले, 'हम तो जाने वाले हैं, हमारा क्यों खराब कर रहे हो? राज्यपाल यानी कुलाधिपति महोदय को सब बता दिया था. कुछ (बजट और संसाधन) देंगे, तब तो कुछ करेंगे.'
बाबा आम्टे दिव्यांग यूनिवर्सिटी: 4 कमरे, 4 स्टाफ, शून्य छात्र और ₹3.27 करोड़ खर्च!
दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने साल 2023 में अपनी सरकार जाने से ठीक पहले 'बाबा आम्टे दिव्यांग यूनिवर्सिटी' की घोषणा की थी. दावा था कि यह दिव्यांग छात्रों के लिए देश का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय बनेगा. पर हकीकत में वे देकर गए सिर्फ चार कमरे, चार स्टाफ और एक उधार के वाइस चांसलर!
जामडोली में इस यूनिवर्सिटी को 10 एकड़ जमीन तो आवंटित हो गई, मगर तीन सालों में यहां न तो कोई कॉलेज संबद्ध हुआ और न ही एक भी छात्र पढ़ने आया. इसके बावजूद, बिना किसी काम के बैठे-बैठे इस यूनिवर्सिटी पर 3 करोड़ 27 लाख रुपये खर्च कर डाले गए. इसका पूरा हिसाब-किताब इस प्रकार है.
₹2.5 करोड़: वेतन और भत्तों पर खर्च.
₹20 लाख: कुलगुरु की गाड़ी पर खर्च.
₹7.5 लाख: आवास की सुविधाओं पर खर्च.
₹50 लाख: एसी, फर्नीचर और चाय-पानी पर स्वाहा.
जब दफ्तर में बैठे स्टाफ से पूछा गया कि आप लोग दिनभर यहां क्या काम करते हैं, तो किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं था. उन्हें खुद नहीं पता कि उनकी नियुक्ति किस काम के लिए हुई है.
विश्वकर्मा कौशल यूनिवर्सिटी: सिंगापुर की तर्ज पर बनने का सपना 18 साल बाद भी अधूरा
इसी के ठीक बगल में विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय भी चल रहा है, जिसकी हकीकत 'aajtak.in' ने 7 सितंबर 2022 को भी दिखाई थी. मगर आज इतने समय बाद भी यहां कुछ नहीं बदला है, सिवाय इसके कि राजस्थान विश्वविद्यालय से हटाकर इसका नाम स्वतंत्र रूप से 'विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय' कर दिया गया.
साल 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसे खोला था. तब दावा किया गया था कि इसे सिंगापुर की तर्ज पर देश का सबसे बड़ा 'स्किल यूनिवर्सिटी' बनाया जाएगा, जहां 138 तरह के स्किल ट्रेनिंग कोर्स शुरू होने थे. जमीन आवंटित होने के बावजूद 18 साल में यहां एक ईंट तक नहीं हिली.
आज इस पूरी यूनिवर्सिटी में केवल चार लोग सरकारी स्टाफ के नाम पर हैं, जबकि चार लोग रिटायर्ड और ठेके पर रखे गए हैं. सरकार हर साल करीब ढाई करोड़ रुपये सिर्फ इसलिए खर्च कर रही है कि अगर किसी प्राइवेट कॉलेज को कोई कोर्स करवाना हो, तो वो यहां से अनुमति का पत्र ले जाता है. वह कॉलेज आगे क्या कर रहा है, इसे ट्रैक करने का इस यूनिवर्सिटी के पास कोई संसाधन नहीं है.
'यहां सिर्फ एफिलिएशन देते हैं'
मोहनलाल (रिटायर्ड कर्मचारी, कौशल विश्वविद्यालय) ने बताया कि यहां केवल अनुमति पत्र (एफिलिएशन) देने की प्रक्रिया होती है. इसके अलावा जमीनी स्तर पर कोई कोर्स या ट्रेनिंग नहीं चल रही है.
शेखावटी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी: गहलोत ने खोली, भजनलाल सरकार ने की बंद
कागजों पर यूनिवर्सिटी खोलने और बंद करने का यह खेल यहीं खत्म नहीं होता. ऐसा ही कुछ हाल झुंझुनू के दोदासर में खुली 'शेखावटी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी' का भी हुआ. साल 2012 में अशोक गहलोत ने इसकी घोषणा की थी. इसका पहला वाइस चांसलर अर्जुन सिंह को बनाया गया और इसका अस्थायी दफ्तर जयपुर के सवाई मानसिंह (SMS) स्टेडियम में खोला गया.
देश की इस सबसे बड़ी स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी का सिर्फ कागजी खाका तैयार हुआ था कि वीसी नौकरी छोड़कर चले गए. इसके बाद दूसरे वीसी लक्ष्मण सिंह आए. अंततः, साल 2024 में वर्तमान भजनलाल शर्मा की सरकार ने इस कागजी यूनिवर्सिटी को पूरी तरह बंद करने का ऐलान कर दिया और इसकी जगह जयपुर में 'महाराणा प्रताप स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी' खोलने की घोषणा की, जिसका काम अभी शुरू होना बाकी है.
राज्यपाल भी हैरान: बिना छात्रों के कैसे चल रहे हैं विश्वविद्यालय?
इस अजीबोगरीब प्रशासनिक लूपहोल पर खुद राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कांग्रेस और बीजेपी के तमाम नेताओं के सामने अपनी गहरी चिंता और हैरानी व्यक्त की है. राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कहा कि मैं देखकर हैरत में रहता हूं कि राजस्थान में ऐसे विश्वविद्यालय चल रहे हैं, जहां धरातल पर कोई छात्र ही नहीं है.
अब सवाल यह है कि आखिर सरकारें ऐसा करती क्यों हैं? दरअसल, इसके पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति होती है. सरकारें चुनाव से ठीक पहले जनता को लुभाने के लिए थोक के भाव यूनिवर्सिटी खोलने की घोषणा कर देती हैं. नियम यह है कि किसी भी नई यूनिवर्सिटी के पहले वाइस चांसलर (वीसी) की नियुक्ति के लिए यूजीसी (UGC) के कड़े नियमों की जरूरत नहीं होती. ऐसे में सरकारें सीधे अपने चहेते लोगों को इन पदों पर बैठाकर उपकृत कर देती हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने कार्यकालों में थोक के भाव ऐसी यूनिवर्सिटियां खोली हैं. उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में जोधपुर में भी एक दिव्यांग विश्वविद्यालय खोला था, जो बाद में बिना किसी परिणाम के बंद हो गया. साफ है कि नेताओं की चुनावी घोषणाओं और अपनों को रेवड़ियां बांटने की इस नीति का खामियाजा जनता के टैक्स के पैसों को भुगतना पड़ रहा है.
शरत कुमार