देश के सबसे बड़े स्कूल बोर्ड यानी सीबीएसई (CBSE) के एक नए फैसले ने इस वक्त नौवीं क्लास (क्लास-9) के छात्रों, उनके पैरेंट्स और स्कूल प्रिंसिपल्स के बीच खलबली मचा दी है. नया अकादमिक सत्र शुरू हुए डेढ़ महीने से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, कई स्कूलों में यूनिट टेस्ट भी खत्म हो चुके हैं और इसी बीच सीबीएसई ने 'थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी' (तीन भाषाओं का नियम) को इसी साल 1 जुलाई से अनिवार्य करने का फरमान सुना दिया है.
इस नए नियम के तहत नौवीं के छात्रों को अब तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिसमें कम से कम दो भारतीय मूल की (नैटिव इंडियन लैंग्वेज) भाषाएं होना जरूरी है. नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) के तहत लिया गया यह फैसला भले ही प्रगतिशील लगे, लेकिन इसके टाइमिंग को लेकर इस वक्त देश भर में भारी आक्रोश है. पैरेंट्स और शिक्षाविद पूछ रहे हैं कि जब सेशन आधा निकल चुका है तो बीच मझधार में बच्चों पर यह अतिरिक्त बोझ क्यों डाला जा रहा है?
यूनिट टेस्ट हो गए और अब कह रहे हैं फ्रेंच छोड़ो!
दिल्ली के एक नामी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र की मां रोजी देवी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि मेरे बेटे ने पहली भाषा के रूप में इंग्लिश और दूसरी भाषा के रूप में फ्रेंच चुनी थी. स्कूल में 40-40 नंबर के यूनिट टेस्ट भी खत्म हो चुके हैं. अब अचानक CBSE की गाइडलाइन आ गई कि उसे इनमें से एक भाषा छोड़नी होगी. जब आपको यह नियम लाना ही था तो मार्च में क्यों नहीं बताया? दो महीने बाद आप कहते हैं कि आप यह नहीं पढ़ सकते, क्या यह फैसला पूरी तरह मनमाना नहीं है?
दरअसल, इस नए बदलाव में सबसे बड़ा पेंच यह फंसा है कि सीबीएसई ने इंग्लिश को 'विदेशी भाषा' (फॉरेन लैंग्वेज) की श्रेणी में रख दिया है. बोर्ड के नए फ्रेमवर्क के मुताबिक छात्र पूरे सिलेबस में सिर्फ एक ही विदेशी भाषा चुन सकते हैं. यानी अब कोई भी छात्र इंग्लिश के साथ फ्रेंच, जर्मन या स्पेनिश जैसी दूसरी विदेशी भाषा नहीं पढ़ पाएगा. उसे इंग्लिश के अलावा दो भारतीय भाषाएं (जैसे हिंदी, संस्कृत आदि) चुननी ही होंगी.
नौवीं के बच्चे को कैसे पढ़ाएं छठी क्लास की किताब?
माउंट आबू स्कूल की प्रिंसिपल ज्योति अरोड़ा ने बोर्ड के इस कदम को बहुत अचानक और हैरान करने वाला बताया. उन्होंने कहा कि सेशन शुरू होने के बाद ऐसे बदलावों से स्कूलों में बेचैनी का माहौल है. टाइम टेबल पूरी तरह बिगड़ जाएगा. सबसे बड़ी व्यावहारिक दिक्कत यह है कि अगर कोई बच्चा नौवीं क्लास में अचानक संस्कृत जैसी तीसरी भाषा चुनता है, जिसने छठी, सातवीं या आठवीं में इसे कभी पढ़ा ही नहीं, तो वह कैसे कोप-अप करेगा?
इस समस्या पर सीबीएसई ने एक अजीबोगरीब सुझाव दिया है कि नौवीं के छात्र तीसरी भाषा की बेसिक समझ के लिए फिलहाल छठी क्लास की किताबों से पढ़ाई शुरू कर सकते हैं. शिक्षाविदों का कहना है कि यह केवल एक कामचलाऊ व्यवस्था है, कोई ठोस समाधान नहीं.
'क्या सीबीएसई कभी प्लानिंग करना सीखेगी?'
मशहूर शिक्षाविद और करियर काउंसलर केशव अग्रवाल ने भी सीबीएसई की टाइमिंग पर तीखा प्रहार किया है. उन्होंने कहा कि अभी तक कई क्लासेस के लिए नई किताबें तक बाजार में नहीं आई हैं. छात्र पहले से ही नए सिलेबस के तनाव से जूझ रहे हैं और उनके ऊपर यह नया बम फोड़ दिया गया. सही प्लानिंग न करना, फेल होने की प्लानिंग करने जैसा है. सीबीएसई यह कब सीखेगी? भाषा सिखाना अच्छी बात है, लेकिन किसी बच्चे को जबरन सिखाना खुशी नहीं, बल्कि मानसिक दबाव है."
सोशल मीडिया (X) पर भी पैरेंट्स लगातार बोर्ड को घेर रहे हैं. उनका कहना है कि नौवीं क्लास वैसे ही आठवीं के मुकाबले बहुत भारी होती है. बच्चों पर पहले से ही पढ़ाई का भारी दबाव रहता है. ऐसे में बिना किसी तैयारी या इंफ्रास्ट्रक्चर के स्कूलों पर यह नियम थोप देना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है.
आजतक एजुकेशन डेस्क