मकर संक्रांति भारत के सबसे महत्वपूर्ण और शुभ त्योहारों में से एक मानी जाती है. हर साल 14 जनवरी को यह पर्व पूरे देश में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है. आम धारणा यह है कि इसी दिन सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है और दिन बड़े होने लगते हैं. लेकिन अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में मकर संक्रांति मई या जून में भी मनाई जा सकती है? सुनने में यह अजीब लगता है, लेकिन इसके पीछे एक ठोस वैज्ञानिक कारण मौजूद है.
मकर संक्रांति आखिर है क्या?
मकर संक्रांति उस दिन को कहते हैं जब सूर्य मकर राशि (Capricorn) में प्रवेश करता है. भारतीय पंचांग सूर्य की स्थिति को राशियों और नक्षत्रों के आधार पर तय करता है. इसी वजह से मकर संक्रांति को खगोलीय घटना से जोड़ा जाता है, न कि सिर्फ तारीख से.
उत्तरायण और शीतकालीन संक्रांति का भ्रम
अक्सर यह माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करता है.लेकिन वैज्ञानिक सच्चाई यह है कि सूर्य उत्तर की ओर बढ़ना 21 दिसंबर के आसपास ही शुरू कर देता है. इस दिन को शीतकालीन संक्रांति (Winter Solstice) कहा जाता है.इस दिन सूर्य दोपहर में सबसे नीचे दिखाई देता है और इसके बाद दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं.
यानी उत्तरायण की वास्तविक शुरुआत → 21 दिसंबर
मकर संक्रांति → 14 जनवरी
पहले सब एक ही दिन क्यों होता था?
करीब 1700 साल पहले, यानी लगभग 285 ईस्वी में शीतकालीन संक्रांति, सूर्य का उत्तरायण में प्रवेश और सूर्य का मकर राशि में प्रवेश तीनों घटनाएं एक ही दिन होती थीं. इसी कारण मकर संक्रांति को उत्तरायण का प्रतीक माना जाने लगा और यह एक बड़ा पर्व बन गया.
फिर बदलाव कैसे आया?
पृथ्वी सिर्फ घूमती ही नहीं है, बल्कि वह एक लट्टू की तरह बहुत धीरे-धीरे डगमगाती भी है. इस धीमी डगमगाहट को वैज्ञानिक भाषा में प्रीसेशन (Precession) कहते हैं. इस प्रक्रिया में पृथ्वी का एक्सिस बहुत धीरे-धीरे झुकता है. जिससे तारों और राशियों की स्थिति बदलती रहती है. इसका असर यह हुआ कि हर 72 साल में लगभग 1 दिन का फर्क पड़ने लगा. करीब 1700 सालों में यह फर्क 24 दिन तक पहुंच गया.
इसका नतीजा क्या निकला?
जो तीनों घटनाएं पहले एक साथ होती थीं, अब वे अलग-अलग हो गईं.
शीतकालीन संक्रांति → 21 दिसंबर
उत्तरायण की शुरुआत → दिसंबर में ही
मकर संक्रांति → 14 जनवरी
आज हम मकर संक्रांति पर उत्तरायण मनाते हैं, जबकि असल में सूर्य उत्तर की ओर चलना तीन हफ्ते पहले शुरू कर चुका होता है. भारतीय और पश्चिमी कैलेंडर में फर्क है. यहां एक बड़ा फर्क समझना जरूरी है. भारतीय पंचांग स्थिर तारों (नक्षत्रों) पर आधारित है. पश्चिमी कैलेंडर पृथ्वी के झुकाव और मौसम पर आधारित है. इसलिए पश्चिमी कैलेंडर में संक्रांति और विषुव स्थिर रहते हैं. लेकिन भारतीय पंचांग में मकर संक्रांति धीरे-धीरे आगे खिसकती रहती है.
क्या सच में मकर संक्रांति मई में आएगी?
हां, अगर यही प्रक्रिया चलती रही तो आने वाले हजारों सालों में मकर संक्रांति गर्मियों के महीनों में यानी मई–जून या जून–जुलाई में भी पड़ सकती है. यह कोई धार्मिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि पृथ्वी की गति का स्वाभाविक परिणाम होगा. मकर संक्रांति सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि एक प्राचीन खगोलीय परंपरा है. आज हम इसे 14 जनवरी को इसलिए मनाते हैं क्योंकि यह उस ऐतिहासिक समय की याद दिलाता है. जब पृथ्वी, सूर्य और तारे पूरी तरह एक-दूसरे के साथ संतुलन में थे.
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