अल्लाह- हू- अकबर की जगह ईरान में लहरा रहा शेर-सूरज वाला झंडा... कैसे एक झंडे से हुआ गेम?

ईरान के आधिकारिक फ्लैग की जगह, वर्तमान शासन का विरोध करने वाले प्रदर्शनकारी शेर-सूरज के चिह्न वाला झंडा लहरा रहे हैं. ऐसे में समझते हैं कि कैसे एक झंडा कैसे ईरान के इस्लामिक शासन के विरोध का प्रतीक बन गया.

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ईरान का झंडे का पुराना प्रतीक शेर और सूरज वहां के आंदोलन की पहचान बन गया है (Photo - Pexels) ईरान का झंडे का पुराना प्रतीक शेर और सूरज वहां के आंदोलन की पहचान बन गया है (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:33 PM IST

ईरान के ऐतिहासिक शेर और सूर्य के निशान वाला झंडा हालिया विरोध प्रदर्शनों का प्रतीक बन गया है. इसके साथ ही एक बार फिर से ये ऐतिहासिक फ्लैग चर्चा में है,  जो लगभग आधी सदी तक देश की आधिकारिक पहचान से गायब रहा था.

अशांति के शुरुआती दिनों से ही कुछ प्रदर्शनकारियों ने  ईरान की पुरानी पहचान - शेर-सूर्य वाला झंडा लहराकर इस्लामी गणराज्य के धर्म आधारित शासन को खारिज करने की भावना प्रकट कर रहे हैं. इसके बाद जब ईरान के निर्वासित राजकुमार रजा पहलवी ने विदेशों में रहने वाले ईरानियों से दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों में इस्लामी गणराज्य के ध्वज को बदलने का आह्वान किया है. तब से ईरान का शेर और सूर्य वाला ये ऐतिहासिक झंडा राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है.

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रजा पहलवी के आह्वान से पहले ही, एक ईरानी प्रदर्शनकारी ने लंदन में ईरान के दूतावास की दीवार पर चढ़कर उसके आधिकारिक ध्वज को शेर और सूर्य के ध्वज से बदल दिया. इसका वीडियो ऑनलाइन तेजी से फैल गया और यहां तक ​​कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी इसे साझा किया. अगले दिन भी यही घटना दोहराई गई, जिससे दूतावास राष्ट्रीय पहचान को लेकर एक प्रतीकात्मक युद्धक्षेत्र में बदल गया.

ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, कैनबरा, स्टॉकहोम, ओस्लो, रोम, म्यूनिख, हैम्बर्ग और लजुब्लजाना में भी इसी तरह की कार्रवाई हुई, जहां ईरानियों ने आधिकारिक प्रतीकों को बदल दिया. दूतावासों या या राजनयिक भवनों के गेटों पर शेर और सूर्य के प्रतीक चिह्न और विरोध के नारे बना दिए गए.  

ईरान के कई शहरों से आए वीडियो में प्रदर्शनकारियों को आंदोलन के दौरान शेर और सूर्य का प्रतीक चिह्न का प्रदर्शन करते हुए दिखाया गया - यह एक तात्कालिक दृश्य संकेत था कि स्थानीय विरोध प्रदर्शन एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा था.कई लोगों के लिए, यह झंडा राजशाही से कम और इस्लामी गणराज्य से खुद को अलग करने से अधिक जुड़ा है.

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यह पुराना राष्ट्रीय प्रती ईरान के वर्तमान शासन की अस्वीकृति और वहां एक वैकल्पिक दृष्टिकोण की पहचान के साथ उभरा है. पुराने झंडे का ये निशान अशांति में शासन के विरोध में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला प्रतीक बन गया है. शायद इसीलिए X ने भी अपने इमोजी में ईरान ध्वज के प्रतीक को शेर और सूर्य में बदल दिया है. एक्स ने ऐसा वहां हो रहे आंदोलन के सपोर्ट में किया है. 

शेर और सूर्य किसी सरकार का नहीं, बल्कि ईरान का प्रतीक है
ईरान का हरा, सफेद और लाल तिरंगा 20वीं शताब्दी के आरंभिक संवैधानिक क्रांति के दौरान औपचारिक रूप से अपनाया गया था, जब आधुनिक ईरानी राष्ट्र-राज्य का विचार पहली बार आकार लेने लगा था. समय के साथ, इन रंगों को व्यापक रूप से स्वीकृत मिला. हरा रंग जीवन शक्ति और भूमि का प्रतीक है, सफेद शांति और स्पष्टता का और लाल साहस और बलिदान का.

तिरंगे की विशिष्टता इसकी निरंतरता में निहित है. यह राजशाही, तख्तापलट, क्रांतियों और युद्धों के दौर से न्यूनतम विवादों के साथ बचा रहा. राजनीतिक विभाजनों से परे, यह उन कुछ प्रतीकों में से एक बना रहा है जिन्हें व्यापक रूप से "सरकारी" के बजाय "ईरानी" के रूप में देखा जाता है. क्योंकि, शेर और सूर्य का प्रतीक ईरान के सबसे पुराने राजनीतिक प्रतीकों में से एक है.

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इसका औपचारिक उपयोग सफवी काल से होता आ रहा है और काजरों और बाद में पहलवी शासकों के शासनकाल में भी इसका इस्तेमाल होता रहा. इसमें एक चमकते सूरज के नीचे तलवार पकड़े हुए शेर को दर्शाया गया है. ईरानी प्रतीकों में, शेर शक्ति, संरक्षण और स्वतंत्रता का प्रतीक है. सूर्य ज्ञान, संप्रभुता और नवजीवन का प्रतीक है. ये दोनों मिलकर एक ऐसे समाज का निर्माण करते हैं, जो  इस्लामी गणराज्य से भी पहले की है.

इससे यह स्पष्ट होता है कि क्यों कई ईरानी इस प्रतीक को किसी विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्था के बजाय स्वयं ईरान का प्रतिनिधित्व करने वाला मानते हैं. क्योंकि, यह किसी शासन विशेष का प्रतीक कभी नहीं रहा है, यह ईरान की भावना को दर्शाता है. वहां के लोगों, संस्कृति, परंपरा और इतिहास का प्रतीक है. 

इस्लामिक क्रांति के बाद हटा दिया गया देश का ऐतिहासिक चिह्न
1979 की क्रांति के बाद, इस्लामी गणराज्य ने शेर और सूर्य के प्रतीक को हटा दिया और उसके स्थान पर शैलीबद्ध इस्लामी शिलालेखों से निर्मित एक नए प्रतीक को अपनाया. क्रांति के बाद की धार्मिक सरकार ने शेर और सूर्य के प्रतीक को दमनकारी वेस्टर्न कल्चर वाले राजशाही का प्रतीक बताया. चार दशकों से अधिक समय तक मंत्रालयों, सैन्य वर्दी, सार्वजनिक भवनों, पाठ्यपुस्तकों और राज्य मीडिया पर इसके प्रदर्शन के कारण, यह प्रतीक तेजी से 'ईरान के ध्वज' के बजाय 'इस्लामिक गणराज्य के ध्वज' के रूप में देखा जाने लगा.

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2009 से 2019, 2022 और अब 2026 में बार-बार ईरान अपनी पुरानी पहचान को हासिल करने की कोशिश करता दिखा. कई वामपंथी, गणतंत्रवादी और राष्ट्रवादी लोग राजशाही से जुड़े होने के डर से इससे दूर रहे. इस साल के विरोध प्रदर्शनों ने इस सोच को बदल दिया है. अशांति के व्यापक पैमाने और गैर-शासनवादी प्रतीक की आवश्यकता ने वैचारिक सीमाओं को नरम कर दिया है. राजशाही से कोई लगाव न रखने वाले कई ईरानी अब शेर और सूर्य के प्रतीक को पुनर्स्थापित करने के बजाय प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में 'इस्लामी गणराज्य के बिना ईरान' के प्रतीक के रूप में दिखा रहे हैं. 

डिजिटल ब्लैकआउट, सेंसरशिप और दमन के इस दौर में यह प्रतीक एक बार फिर सड़कों पर हो रही आंदोलन की आवाज बन गया है. ऐसे में अब देखना है कि क्या शेर और सूर्य एक अस्थायी विरोध-प्रदर्शन का प्रतीक भर बनकर रह जाएंगे या भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव के बाद एक स्थायी चिह्न बनेंगे.  यह इस वर्ष की अशांति से उभरने वाले सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है.

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