पेरू के दक्षिणी रेगिस्तान में कुछ आकृतियां बनी हुई हैं. देखने में लगता है कि मिट्टी पर बनी ये आकृतियां कुछ दिनों में मिट जाएंगी, लेकिन सालों तक इनका नामों निशान नहीं मिटा है. चाहें यहां आंधी आए या कितनी भी धूल हो यह निशान हमेशा नजर आते हैं.
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अक्सर लोग सोचते हैं कि आखिरी इतनी सटीक तरीके से रेगिस्तान में ऐसी आकृतियां बनाई किसने? यह जरूर सालों पुराना कोई रहस्य है. यही कारण है कि इन आकृतियों का मतलब जानने के लिए कई वैज्ञानिक इसपर खोज करते रहते हैं.
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वैज्ञनिकों की कई खोज में बताया गया है कि यह आकृतियों किस चीज की हैं. हालांकि, इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है. यह बस एक अनुमान है. यह जगह नाज़्का शहर के ठीक बाहर स्थित है. आकृतियों किस चीज की हैं यह अनुमान लगाने के बाद भी लाइनें वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बनी हुई हैं. कोई नहीं जानता कि इन्हें क्यों और किस उद्देश्य से बनाया गया था. सौभाग्य से, विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि नाज़्का लाइन्स कैसे बनाई गई थीं.
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नाज़्का लाइन्स पेरू के रेगिस्तानी इलाके में बनी बहुत बड़ी आकृतियां हैं. ये लगभग 170 वर्ग मील के क्षेत्र में फैली हुई हैं. इन रेखाओं को जमीन पर उकेरा गया है और इनमें हजारों अलग-अलग डिज़ाइन बनाए गए हैं. इन डिज़ाइनों में मकड़ी, हमिंगबर्ड, बंदर, छिपकली, पेलिकन और व्हेल जैसे जानवर दिखते हैं. इसके अलावा पेड़, फूल जैसे पौधों के चित्र और लहरदार रेखाएं, त्रिभुज, सर्पिल और आयत जैसे आकार भी शामिल हैं.
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machutravelperu.com के अनुसार, ये नाज़्का चित्र पेरू के रेगिस्तान में बनाए गए थे। इन्हें बनाने के लिए जमीन से पत्थर और मिट्टी हटाई गई थी। रेगिस्तान की ऊपरी सतह गहरी होती है, लेकिन जब पत्थर हट जाते हैं तो नीचे की रेत हल्की दिखाई देती है. इसी हल्के और गहरे रंग के फर्क से ये आकृतियां साफ दिखती हैं.
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रेगिस्तान का मौसम बहुत सूखा होने की वजह से ये रेखाएं हज़ारों सालों तक खराब नहीं हुईं और आज भी साफ दिखती हैं.ं वैज्ञानिकों का मानना है कि नाज़्का संस्कृति ने ये रेखाएं ईसा के बाद 10 से 700 साल के बीच बनाई थीं.
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