रिजल्ट आ रहा है... लेकिन बच्चे खुश क्यों नहीं? शुरू हुई पोस्ट रिजल्ट एंग्जायटी पर चर्चा 

देश के कई शिक्षा बोर्ड्स की ओर से रिजल्ट जारी किया जा रहा है. ये सिलसिल अब भी जारी है. लेकिन जहां एक ओर अखबारों और सोशल मीडिया पर टॉपर्स की तस्वीरें छाई हुई हैं वहीं, दूसरी तरफ एक साइलेंट संकट गहराता जा रहा है, जिसे एक्सपर्ट्स परिणाम के बाद की घबराहट यानी (Post-Result Anxiety) कह रहे हैं. आज के दौर में बच्चों के लिए रिजल्ट केवल एक ग्रेड कार्ड नहीं  बल्कि उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है.

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रिजल्ट आने के बाद बच्चे क्यों हो रहे हैं परेशान. (Photo : Pexels) रिजल्ट आने के बाद बच्चे क्यों हो रहे हैं परेशान. (Photo : Pexels)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 20 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 10:01 AM IST

अखबार के पहले पन्ने पर मुस्कुराते टॉपर्स की तस्वीरें और सोशल मीडिया पर बधाइयों का शोर... पहली नजर में ऐसा लगता है कि हर तरफ खुशियां हैं लेकिन इसी चमक-धमक के पीछे कई घरों के बंद कमरों में एक डरा हुआ बच्चा बैठा है, जो अपने ही रिजल्ट कार्ड को किसी सजा की तरह देख रहा है. इसे एक्सपर्ट्स परिणाम के बाद की घबराहट यानी (Post-Result Anxiety) कह रहे हैं.

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क्यों खुश नहीं हैं छात्र? 

अंकों की हाइपर- कॉम्पिटिशन- आज के समय में 90% या 95% नंबर लाना भी पर्याप्त नहीं है. प्रतिष्ठित कॉलेजों की कट-ऑफ 99%तक पहुंचने के कारण उच्च अंक लाने वाले छात्र भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. 

रिलेटिव डेप्रिवेशन- कई बार रिजल्ट जारी होने के बाद बच्चों को अपने अंकों से उतना दुख नहीं होता, जितना दूसरों से पीछे रह जाने की भावना से होता है. रिश्तेदारों और पड़ोसियों के फोन कॉल्स इस तनाव को और बढ़ा देते हैं. 

भविष्य को लेकर टेंशन- करियर की टेंशन और सबसे बड़ा सवाल कि क्या मुझे अच्छा कॉलेज मिलेगा? का प्रेशर छात्रों को जश्न मनाने के बजाय गहरी चिंता में डाल रहा है. 

ये हो सकते हैं संकेत? 

रिजल्ट आने के बाद से बच्चों में चिड़चिड़ापन, भूख न लगना और अकेले रहने की आदत पोस्ट एंग्जायटी रिजल्ट के लक्षण हो सकते हैं. अभिभावकों को समझना होगा कि उनके बच्चे की योग्यता कागज के एक टुकड़े से बहुत बड़ी है. यदि बच्चा तनाव में है, तो उसे डांटने या सलाह देने के बजाय उसकी बात सुनें. उसे महसूस कराएं कि आपके प्यार की शर्त उसके मार्क्स नहीं हैं. 

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क्या करें क्या न करें

कोशिश पर ध्यान दें- नंबरों के बजाय बच्चे की सालभर की मेहनत की सराहना करें. 

तुलना से बचें- इस दौरान अपने बच्चों की तुलना किसी और से न करें. 

भविष्य के विकल्प खोजें- यदि अंक कम हैं, तो स्किल्स और वोकेशनल कोर्सेस के बारे में बात करें. 

सोशल मीडिया शो-ऑफ- रिजल्ट को सोशल स्टेटस का जरिया न बनाएं. इसके बदले अपने बच्चों का प्रोत्साहित करें.

प्रोफेशनल हेल्प- यदि बच्चा बहुत ज्यादा गुमसुम है, तो काउंसलर से बात करने में न झिझकें. 

अंकों पर न दें इतना ध्यान- यह न कहें कि अब कुछ नहीं हो सकता।
 

WHO के मुताबिक, कोविड के बाद से डिप्रेशन और एंग्जायटी में 25 फीसदी की बढ़त हुई है. इंडिया के युवा मेंटल हेल्थ में 84 देशों में 60 वें रैंक पर हैं.  

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