भारी-भरकम फीस भरकर कॉलेज की डिग्री लेना अब अच्छी नौकरी की गारंटी नहीं रह गया है. Unstop Talent Report 2026 के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश के लाखों छात्रों के अरमान और जॉब मार्केट की हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है.
रिपोर्ट के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो स्थिति काफी गंभीर नजर आती है.
रिपोर्ट के अनुसार करीब 73% छात्र ग्रेजुएशन के बाद कम से कम 5 लाख रुपये सालाना के शुरुआती पैकेज की उम्मीद करते हैं. कड़वा सच यह है कि इनमें से केवल 40% छात्र ही अपनी इस उम्मीद को हकीकत में बदल पा रहे हैं. यानी 60% छात्र या तो अपनी उम्मीद से कम सैलरी पर काम कर रहे हैं या उनके पास नौकरी नहीं है.
MBA और इंजीनियरिंग का 'जादू' पड़ा फीका?
एक समय था जब इंजीनियरिंग या MBA की डिग्री हाथ में आते ही कंपनियों की लाइन लग जाती थी. लेकिन 2026 की यह रिपोर्ट कुछ और ही कह रही है. ये रिपोर्ट दिखाती है कि डिग्री का दबदबा लगभग खत्म हो रहा है. अब कंपनियां सिर्फ आपकी 'डिग्री' नहीं, बल्कि आपकी 'स्किल्स' और प्रॉब्लम सॉल्विंग क्षमता देख रही हैं.
कई बड़ी आईटी कंपनियां जहां एक तरफ 20,000 फ्रेशर्स की भर्ती कर रही हैं, वहीं पुराने रोल्स में कटौती भी कर रही हैं, जिससे नए छात्रों के लिए कॉम्पिटिशन बढ़ गया है. कई टॉप कॉलेजों के छात्रों को भी अब 10 लाख से कम के पैकेज पर समझौता करना पड़ रहा है क्योंकि कंपनियां अब 'कॉस्ट कंट्रोल' पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं.
क्यों टूट रहे हैं सपने?
विशेषज्ञों का मानना है कि कॉलेज के सिलेबस और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच एक बड़ी खाई है. AI और ऑटोमेशन ने कई एंट्री-लेवल नौकरियों का स्वरूप बदल दिया है. छात्र थ्योरी तो जानते हैं, लेकिन प्रैक्टिकल स्किल्स में पीछे रह जाते हैं, जिसकी वजह से उन्हें मनचाहा पैकेज नहीं मिल पाता.
आजतक एजुकेशन डेस्क