रिजाइन करने के बाद नहीं सर्व किया नोटिस पीरियड तो क्या हो सकता है लीगल एक्शन? क्या है इसके लिए कानून!

नौकरी बदलना जितना उत्साह भरा होता है, पुरानी कंपनी छोड़ने की प्रक्रिया उतनी ही सिरदर्द भरी होती है. अक्सर लोग पूछते हैं कि क्या इस्तीफा देने के बाद नोटिस पीरियड पूरा करना जरूरी होता है? क्या कंपनी इसके लिए कानूनी कार्रवाई कर सकती है? 

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आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 22 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:07 PM IST

नौकरी छोड़ना दिखने में तो आसान लगता है, लेकिन इसके पीछे की प्रोसेस आपको थका देती है. अक्सर नए अवसर को लेकर उत्साह होता है, लेकिन साथ ही लंबे नोटिस पीरियड, काम को सौंपने की प्रक्रिया और समय से पहले निकलने के लिए बातचीत करने का तनाव भी शामिल होता है. कई कर्मचारी जब नौकरी छोड़ रहे होते हैं, तो उनके मन में एक सवाल जरूर उठता है क्या सच में 30, 60 या 90 दिनों तक नोटिस पीरियड सर्व करना अनिवार्य है? या आप इससे पहले भी छोड़ सकते हैं? अगर नोटिस नहीं देते हैं तो क्या कंपनी कोई कानूनी कदम उठा सकती है?

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नोटिस पीरियड के बारे में क्या कहता है कानून? 

ग्रेविटास लीगल के पार्टनर अपूर्वा चंद्र बताते हैं कि भारत में कानून हर किसी के लिए एक जैसा नोटिस पीरियड तय नहीं करता. नौकरी जॉइन करते समय जिस एग्रीमेंट पर साइन करते हैं, वही सबसे ज्यादा मायने रखता है. यानी, आपके और कंपनी के बीच जो बात तय हुई है, वहीं कानून की तरह काम करती है. भारत में कानून सभी कर्मचारियों के लिए एक समान नोटिस अवधि निर्धारित नहीं करता है. अगर आप किसी प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं, तो कोई सर्वव्यापी सरकारी नियम आपको नहीं रोकता. आपकी नोटिस अवधि पूरी तरह से उस समझौते पर निर्भर करती है जो आपने जॉइनिंग के वक्त किया था.

वहीं, अल्फा पार्टनर्स के चिराग गुप्ता का कहना है कि सरकार के नए श्रम कानून (विशेष रूप से औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 और वेतन संहिता, 2019 के तहत) भी इसी बात की पुष्टि करते हैं. इन नए नियमों में भी सभी कर्मचारियों के लिए नोटिस पीरियड को अनिवार्य नहीं बनाया गया है. इसमें भी यही कहा गया है कि सभी श्रेणियों के कर्मचारियों के लिए नोटिस अवधि अनिवार्य नहीं है. हालांकि, कंपनी और कर्मचारी के बीच का कॉन्ट्रैक्ट ही यह तय करेगा कि किसे कितने दिन का नोटिस देना है. 

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अगर नहीं सर्व करते हैं नोटिस... तो क्या होगा? 

अक्सर कर्मचारियों के मन में यह डर बैठा रहता है कि अगर उन्होंने नोटिस पीरियड पूरा नहीं किया, तो पुलिस केस हो जाएगा या वे जेल चले जाएंगे. लेकिन सच तो यह है कि मामला इतना गंभीर नहीं होता. कानूनी जानकार चिराग गुप्ता बताते हैं कि नोटिस पीरियड न देना कोई क्रिमिनल ऑफेंस (अपराध) नहीं है. मतलब साफ है कि कंपनी आपके खिलाफ कोई आपराधिक केस या FIR दर्ज नहीं करा सकती. देखा जाए तो ये पूरा मामला सिविल है. अगर आपने कॉन्ट्रैक्ट तोड़ा है तो कंपनी इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 के तहत आपके खिलाफ सिविल कार्रवाई कर सकती है.

रुकने के लिए मजबूर कर सकती है कंपनी 

हालांकि, कर्मचारियों के बीच इस बात का भी डर रहता है कि क्या उन्हें नोटिस पीरियड के दौरान काम जारी रखने के लिए मजबूर किया जा सकता है. इन मामलों में कानून साफ है. विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 14(1)(b) के अनुसार, कोई भी कंपनी किसी कर्मचारी को नोटिस के दौरान ऑफिस में बैठने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. अगर आपका मन वहां से हट गया है, तो आप वहां रुकने के लिए कानूनी तौर पर बाध्य नहीं हैं. 

क्या नोटिस पीरियड को कम कर सकते हैं? 

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कुछ ऐसी परिस्थितियां होती हैं जहां कर्मचारियों को पूरी नोटिस अवधि दिए बिना नौकरी छोड़ने का अधिकार होता है. गुप्ता बताते हैं कि सैलरी का भुगतान न होना भी इसी तरह का एक मामला है. वेतन संहिता, 2019 की धारा 17 के तहत सैलरी का भुगतान न करना या देर करना उल्लंघन माना जाता है. जब कंपनी सीधे तौर पर नहीं निकालती, लेकिन ऑफिस का माहौल ऐसा बना देती है कि आपका वहां टिकना मुश्किल हो जाए जैसे आपको परेशान करना, बिना वजह डांटना या आपके काम को जानबूझकर मुश्किल बनाना ताकि आप तंग आकर खुद ही इस्तीफा दे दें, तो इसे रचनात्मक बर्खास्तगी (Constructive Dismissal) कहते हैं. इस स्थिति में कर्मचारी तुरंत नौकरी छोड़ सकते हैं. 
 

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रिपोर्टर- सोनू विवेक

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