तीन साल तक अपनी बीवी की कब्र पर नाचता रहा ये आदमी

वो औरत मुगले-ए-आजम की अनारकली जैसी थी. जिसे जि‍ंदा दीवार में चिनवा दिया गया था. वह कोई आम औरत नहीं बल्कि मैसूर राजघराने के दीवान की बेटी थी. अमीर भी और खूबसूरत भी. मगर उस औरत को ताबूत के साथ कब्र में ज़िंदा दफना दिया गया और इस काम को अंजाम दिया एक ऐसे आशिक ने जिसके लिए वो सबकुछ छोड़कर आई थी.

मृतका शाकिरा और हत्यारा स्वामी श्रद्धानंद
परवेज़ सागर
  • बेंगलुरु,
  • 07 जनवरी 2016,
  • अपडेटेड 11:24 AM IST

वो औरत मुगले-ए-आजम की अनारकली जैसी थी. जिसे जि‍ंदा दीवार में चिनवा दिया गया था. वह कोई आम औरत नहीं बल्कि मैसूर राजघराने के दीवान की बेटी थी. अमीर भी और खूबसूरत भी. मगर उस औरत को ताबूत के साथ कब्र में ज़िंदा दफना दिया गया और इस काम को अंजाम दिया एक ऐसे आशिक ने जिसके लिए वो सबकुछ छोड़कर आई थी. पहले उस शख्स ने अपनी मोहब्बत की कब्र तैयार की और फिर तीन साल तक उसी कब्र पर वो नाचता रहा. जुर्म की इसी 24 साल पुरानी दास्तान के पन्ने हम उलटने जा रहे हैं. जो डान्सिंग ऑन ग्रेव के नाम से मशहूर हुई. कौन थी वो 'अनारकली'बात अप्रैल 1991 की है. बला की खूबसूरत शाकिरा नमाजी खलीली मैसूर राजघराने की दीवान की बेटी थीं. वह रिटार्यड आईएफएस अफसर और आॅस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर रहे अकबर मिर्जा खलीली की पहली बीवी थी. मई 1991 में अचानक वह बैंगलोर से गायब हो गई. उन्हें खूब तलाश किया गया मगर उनका कुछ पता नहीं चला. इसके बाद शाकिरा की तीसरी बेटी सबा खलीली ने परेशान होकर नौ महीने बाद यानी जून 1992 में बैंगलोर के अशोक नगर पुलिस स्टेशन में अपनी मां शाकिरा खलीली की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई.तीन साल बाद खुला राजगुमशुदगी के तीन साल बाद यानी मई 1994 में आखिरकार शाकिरा नमाजी खलीली का पता मिल ही गया. यही नहीं खुद शाकिरा खलीली भी मिल गई. और वो भी अपने ही घर में. अपने ही घर के आंगन में. मगर एक ताबूत में कैद, कंकाल की शक्ल में. जी हां, वो अपने घर में ही दफन थी. क्या हुआ था शाकिरा के साथइस पूरे मामले को जानने के लिए हमें इस इस वारदात के खुलासे से ठीक 9 साल पीछे जाना होगा. यानी 1985 में. बात मुंबई की है. शादी के करीब 25 साल बाद चार बेटियों की मां शाकिरा खलीली और उनके शौहर अकबर मिर्जा खलीली के रिश्तों में कड़ुवाहट आ गई थी. और इस कड़ुवाहट का नाम था मुरली मनोहर मिश्र उर्फ स्वामी श्रद्धानंद. मुरली मनोहर मिश्र मध्य प्रदेश के सागर का रहने वाला था. शाकिरा से उसकी पहली मुलाकात 1982 में हुई थी. तब शाकिरा दिल्ली में उत्तर प्रदेश के एक राज परिवार के यहां एक कार्यक्रम में शिरकत करने आई थीं. मुरली मनोहर उन दिनों उसी राज परिवार का नौकर हुआ करता था, लेकिन नौकर होने के बावजूद उसने टैक्स और प्रॉपर्टी के काम में महारत हासिल कर ली थी. धीरे-धीरे वो एक स्वयंभू बाबा बन गया. बेटे की चाहत शाकिरा को स्वामी श्रद्धानंद के पास लाईशाकिरा नमाजी खलीली हमेशा से चाहती थी कि उसका एक बेटा भी हो. बस इसी चाहत में तड़पती शाकिरा को स्वामी श्रद्धानंद ने अपने जाल में फंसा लिया. उसकी मुराद पूरी करवाने का झांसा दे कर वह उसके क़रीब आ गया. लेकिन खलीली परिवार में तब पहला भूचाल आया, जब शाकिरा ने 1985 में अपने पति अकबर मिर्ज़ा खलीली को तलाक दे कर स्वामी श्रद्धानंद से शादी कर ली. शादी के बाद दोनों बैंगलोर शिफ्ट हो गए. शाकिरा नमाज़ी की दूसरी शादी से हर कोई हैरान था. उम्र के पचासवें पड़ाव पर चार-चार जवान बेटियों के होते हुए भी शाकिरा ने स्वामी श्रद्धानंद से शादी की थी. पर ये एक अजीब शादी थी. अजीब इस मायने में कि शाकिरा ने सिर्फ एक बेटे की चाहत में दूसरी शादी की थी. जबकि स्वामी श्रद्धानंद शाकिरा की बेशुमार दौलत को हड़पना चाहता था. तीन बेटियां शाकिरा से अलग हो गईंइस शादी से शाकिरा खलीली की चार में से तीन बेटियां नाराज होकर अपनी मां से अलग हो गई. सिर्फ एक बेटी सबा खलीली ने अपनी मां को नहीं छोड़ा. सबा तब मुंबई में मॉडलिंग की दुनिया में अपनी किस्मत आजमा रही थी. बीच-बीच में वो अपनी मां से मिलने बैंगलोर आती जाती रहती थी. फोन पर तो लगभग हर रोज ही बात करती थी. मगर जब अप्रैल 1991 में 50 साल की शाकिरा अचानक ग़ायब हो गई. तो सबा से फोन पर बातचीत का सिलसिला भी बंद हो गया. कई दिन और हफ्ते गुजर गए तो सबा ने अपनी मां के बारे में स्वामी श्रद्धानंद से पूछा. मगर उसने गोल-मोल जवाब देकर सबा को टाल दिया. कभी कहा हैदराबाद गई है तो कभी कहा कि वो विदेश चली गई है. शाकिरा को गायब हुए नौ महीने बीत चुके थे. इसी बीच एक रोज स्वामी ने सबा को बताया कि उसकी मां प्रेगनेंट है और बच्चे को जन्म देने अमेरिका के रूजवेल्ट अस्पताल में भर्ती है.सबा का शक यकीन में बदलाबस यही वो बात थी जिसने सबा के मन में पैदा हुए शक को यकीन में बदल दिया. सबा ने रुजवेल्ट अस्पताल में टेलीफ़ोन किया और अपनी मां शाकिरा खलीली के बारे में पूछताछ की. लेकिन उसे यह जानकर हैरानी हुई कि अस्पातल में शाकिरा नाम की कोई मरीज़ कभी आई ही नहीं. बस इसी के बाद सबा फौरन बैंगलोर पहुंची और अशोक नगर थाने में रिपोर्ट लिखा दी. रिपोर्ट लिखने के बाद बैंगलोर सेंट्रल क्राइम ब्रांच की टीम शाकिरा खलीली का पता लगने की कोशिश रही. मगर कोई सुराग नहीं मिला. ज़रूर पढ़ें- खौफनाक हत्या की साजिश की दास्तान बना तंदूरकांड सबा को था स्वामी श्रद्धानंद पर शकसबा के शक की सुई स्वामी श्रद्धानंद की तरफ ही घूम रही थी. पर बिना सबूत के वो इस केस से बेदाग बाहर निकल गया. केस लगभग क्लोज ही हो गया था. पुलिस भी उम्मीद छोड़ चुकी थी. पर तभी एक चमत्कार हुआ और शाकिरा मिल गई. सबा को शुरू से शक था कि उसकी मां की गुमशुदगी के पीछे सिर्फ और सिर्फ स्वामी श्रद्धानंद का ही हाथ है. मगर स्वामी श्रद्धानंद का शहर में अच्छा खासा रुसूख था. पुलिस ने कभी उससे सख्ती से पूछताछ ही नहीं की. नौकर ने नशे में खोला शाकिरा की मौत का राज29 अप्रैल 1994 की बात है. बैंगलोर क्राइम ब्रांच का एक कांस्टेबल शहर के एक ठेके पर बैठा था. तभी वहां एक शख्स आया. वह नशे में चूर था. नशे में ही वो कांस्टेबल के सामने कहने लगा कि जिस शाकिरा खलीली की पुलिस इतने साल से ढूंढ रही है, उसका पता वो जानता है. उसने नशे में कहा कि शाकिरा तो जिंदा ही नहीं है और खुद स्वामी श्रद्धानंद ने उसे मार कर अपने ही घर में दफना दिया है. जिस बक्से में दफनाया है, उस बक्सा वो खुद लेकर आया था. उस कांस्टेबल को शाकिरा खलीली का केस पता था. लिहाज़ा उसने फौरन नशे में झूमने वाले उस शख्स को पकड़ लिया. और अपने सीनियर अफसरों को इस बात की खबर दी. खबर मिलते ही 30 अप्रैल 1994 को पुलिस सबसे पहले बैंगलोर के उस कारपेंटर की दुकान पर पहुंची, जिसने स्वामी श्रद्धानंद के लिए लकड़ी का आदमकद बक्सा बनाया था. कारपेंटर ने पुलिस को बताया कि तीन साल पहले श्रद्धानंद ने एंटिक वैल्यू की आदमकद मूर्तियों को हिफ़ाज़त से रखने के लिए उससे एक खास बक्सा बनवाया था. पुलिस के लिए इतनी जानकारी काफी थी. कड़ियां जुड़ रही थीं. स्वामी श्रद्धानंद की गिरफ्तारीलिहाज़ा अब बिना वक्त गंवाए पुलिस ने सीधे स्वामी श्रद्धानंद को हिरासत में ले लिया. उससे सख्ती से पूछताछ की गई. और आखिरकार स्वामी श्रद्धानंद पुलिस को अपने साथ अपने घर ले गया. और घर के आंगन की तरफ इशारा किया. जब आंगन की खुदाई की गई. तो थोड़ी देर में ही जमीन के अंदर से वो खास ताबूत बाहर निकल आया. तीन साल बीत चुके थे. ताबूत में शाकिरा खलीली के नाम पर बस कंकाल बचा था. ताबूत सामने था अब बस स्वामी को बोलना था. उसने बोलना शुरू किया. दरअसल स्वामी श्रद्धानंद ने शाकिरा खलीली से शादी सिर्फ उसकी दौलत के लिए की थी. मगर शादी के बाद शाकिरा को असलीयत पता चल गई थी. इसलिए शाकिरा धीरे धीरे अपनी सारी दौलत और प्रापर्टी चारों बेटियों को दे रही थी. स्वामी को ये बर्दाश्त नहीं हुआ. और उसने शाकिरा को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. उसने सबसे पहले एक खास आदमकद बक्सा बनवाया. बाद में अपने नौकरों से घर के आंगन में पानी का टैंक बनवने के नाम पर गड्ढे खुदवाए. शाकिरा को जि‍ंदा दफनाया28 अप्रैल 1991 का दिन था. शाकिरा की मौत के लिए स्वामी ने यही तारीख चुनी थी. उसने प्लान के तहत सारे नौकरों को छुट्टी दे दी. फिर शाकिरा के लिए खुद चाय बनाई. पर चाय मे बेहोशी की दवा मिला दी. चाय पीने के बाद शाकिरा जैसे ही बेहोश हुई उसने गद्दे में लपेट कर शाकिरा को ताबूत में डाल दिया. फिर ताबूत को बाहर से लॉक कर इसी गड्ढे में दफना दिया. अगले ही रोज़ मिस्त्री को बुला कर उसने मिट्टी के ऊपर शानदार टाइल्स लगवा दिए. और तीन साल तक वो उसी आंगन में अपनी बीवी की कब्र के ऊपर रात को पार्टी करता रहा. शराब पीकर दोस्तों के साथ नाचता रहा.ताबूत के अंदर मिले नाखून की खंरोच के निशानताबूत बाहर निकालने के बाद जब उसकी जांच की गई तो अंदर नाखून की खरोंच के बेशुमार निशान  मिले. एक्सपर्ट के मुताबिक मौत से पहले शाकिरा नमाजी को ताबूत के अंदर होश आ चुका था. उसका दम घुंट रहा था. इसलिए वो आखिरी वक्त तक ताबूत को खोलने की कोशिश करती रही. अपने नाखून से ताबूत को नोचती रही. मगर ताबूत बाहर से बंद था. और इस तरह वो जिंदा दफन होकर मर गई. ताबूत से बरामद अंगूठियों और चूड़ियों को देख कर शाकिरा की पहचान हुई. मगर फिर लाश का डीएनए भी हुआ.खास बातें30 अप्रैल 1994 को स्वामी श्रद्धानंद को गिरफ्तार किया गया. 11 साल तक बैंगलोर सेशन कोर्ट में यह मुक़दमा चला. जिसमें कुल 155 गवाहों की गवहियां हुईं. 21 मई 2005 को बैंगलोर सेशन कोर्ट ने स्वामी श्रद्धानंद को फांसी की सज़ा सुनाई. 12 सितंबर 2005 को हाई कोर्ट ने उसकी सज़ा-ए-मौत को बरकरार रखने का फरमान सुनाया. 3 साल बाद 22 जुलाई, 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा को उम्र क़ैद में बदल दिया. तब से स्वामी श्रद्धानंद कर्नाटक के बेलगाम जेल में बंद है. 1994 में जब वो पकड़ा गया था तब वो 54 साल का था. अब उसकी उम्र 75 साल है.हिंदुस्तानी जुर्म के इतिहास की ये वो दास्तान है, जिसे बाद में नाम दिया गया डांसिंग ऑन द ग्रेवयार्ड. एक पति पूरे तीन साल तक अपनी ही बीवी की कब्र के ऊपर थिरकता रहा, नाचता रहा, पार्टियां करता रहा. महफिलें सजाता रहा. लेकिन इस बात को सिर्फ सोच कर भी अजीब लगता है.

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