साल 1991 को इकोनॉमी रिफॉर्म के लिए याद किया जाता है. इसका श्रेय पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को जाता है, क्योंकि उस समय वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे और उनके आर्थिक फैसलों के बाद देश तरक्की की राह पर चल पड़ा.
इस बीच अब 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया कह रहे हैं कि मौजूदा दौर में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) से डील 1991 के आर्थिक सुधारों से भी बड़ा कदम है. क्योंकि इन दोनों समझौते से भारत को वैश्विक मजबूती मिलेगी, और विदेशी निवेश बढ़ेगा.
दरअसल, अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौता तय हुआ है, हालांकि इसकी पूरी डिटेल्स अभी सामने नहीं आई हैं. जब उनसे पूछा गया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर पूरी जानकारी आने तक इंतजार करना चाहिए, या फिर हम जश्न मना सकते हैं? इंडिया टुडे से बातचीत में अर्थशास्त्री ने कहा कि मुझे जश्न मनाने में कोई आपत्ति नहीं है.
EU-US के साथ डील बड़ी उपलब्धि
अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ हुए समझौते को साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए. भारत के नजरिये ये दोनों समझौते मिलकर वास्तव में सभी समझौतों के 'मां-बाप' हैं. क्योंकि ये दोनों देश अपने आप में बड़े हैं, जिनके साथ हम वैश्विक स्तर पर व्यापार करते हैं.
अर्थशास्त्री ने समझाया कि EU के साथ समझौता भारत को यूरोपीय बाजार तक पहुंच देता है, जबकि अमेरिका के साथ समझौता भारतीय निर्यातक के लिए एक बड़ा मौका साबित होने वाला है, क्योंकि अधिक टैरिफ की वजह से निर्यात को मुश्किलें बढ़ गई थीं. इन दोनों डील के बाद अब अगर भारत कारोबार के मोर्चे पर कुछ बड़े फैसले लेते हुए कारोबारी माहौल को और अधिक अनुकूल बनाएं, तो 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करना हमारी पहुंच में है.
उन्होंने कहा कि टैरिफ को दो तरीके से देखना चाहिए, एक अर्थशास्त्री की नजरिये मैं ये कह सकता हूं कि भारत कृषि जैसे सेक्टर को लेकर समझौता नहीं करेगा. लेकिन इस सेक्टर को ग्लोबल लेवल पर लाना चाहिए. इस सेक्टर को और मजबूत किया जा सकता है.
अमेरिकी कंपनियों से मुकाबले के लिए तैयार भारतीय कंपनियां
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारतीय कंपनियां वास्तव में अमेरिकी कंपनियों के साथ समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं, तो उन्होंने 1991 के बाद के भारत के अनुभव का हवाला दिया. उन्होंने कहा, '1991 में जब हमने पहली बार अर्थव्यवस्था खोली थी, तब भी ऐसी ही आशंकाएं थीं'.
उन्होंने बताया कि भारत का मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट साल 2002 में करीब 50 अरब डॉलर था, जो कि 2011 में बढ़कर 300 अरब डॉलर हो गया. इसलिए कॉम्पीटिशन हमेशा विकास को बढ़ावा देती है, भले ही कुछ कंपनियों के लिए चुनौतियां बढ़ गईं.
1991 के बाद सबसे बड़ा आर्थिक मोड़?
पनगढ़िया ने कहा कि मौजूदा समय घरेलू सुधारों के साथ मिलकर 1991 के पैमाने से भी बड़ा है. उन्होंने कहा, 'इन दोनों समझौतों के साथ हमने जो किया है, वह वास्तव में 1991 से भी बड़ा है.
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह तुलना आज के समय में सही है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि 1991 और मौजूदा हालात दोनों का अध्ययन करने के बाद मैं अपनी बात पर अडिग हूं, क्योंकि इसमें 2025 में किए गए बड़े सुधारों को भी शामिल कर रहा हूं, खासकर श्रम कानून सुधार को. अगर 2025 के इन सुधारों और इन दो व्यापार समझौतों को साथ रखा जाए, तो यह निश्चित रूप से 1991 से कहीं बड़ा है.
आजतक बिजनेस डेस्क