रिटायरमेंट की तैयारी में आगे महिलाएं, लेकिन सता रहा है अकेलेपन का डर

शहरी भारत की कामकाजी महिलाएं अब अपनी रिटायरमेंट को लेकर अधिक योजनाबद्ध हो गई हैं. वे न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहती हैं, बल्कि अपनी सेहत को लेकर भी पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं.

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कामकाजी महिलाओं की रिटायरमेंट प्लानिंग (Photo-Pixabay) कामकाजी महिलाओं की रिटायरमेंट प्लानिंग (Photo-Pixabay)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:44 PM IST

शहरी भारत की कामकाजी महिलाएं अब अपने रिटायरमेंट  के लिए पहले से कहीं अधिक जागरूक और तैयार नजर आ रही हैं. हाल ही में एक्सिस मैक्स लाइफ इंश्योरेंस द्वारा जारी 'इंडिया रिटायरमेंट इंडेक्स स्टडी' (IRIS 5.0) के अनुसार, महिलाओं की वित्तीय और स्वास्थ्य संबंधी तैयारियों में काफी सुधार हुआ है.

साल 2022 में उनकी तैयारी का स्कोर 44 था, जो 2025 में बढ़कर 49 हो गया है, जो कि 48 के राष्ट्रीय औसत से भी बेहतर है. यह अध्ययन मुख्य रूप से तीन पैमानों पैसे, सेहत और भावनात्मक मजबूती पर आधारित है.

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अकेलेपन का डर क्यों?

हालांकि, इस प्रगति के बीच एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है. जहां महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं और अपनी सेहत का ख्याल रख रही हैं (करीब 60% महिलाएं अब नियमित चेकअप कराती हैं), वहीं अकेलेपन का डर उन्हें आज भी सता रहा है. रिपोर्ट बताती है कि रिटायरमेंट के बाद की भावनात्मक सुरक्षा को लेकर चिंताएं अभी भी काफी अधिक हैं. कुल मिलाकर, महिलाएं अपने भविष्य की योजना तो बना रही हैं, लेकिन उनकी यह तैयारी शारीरिक और वित्तीय रूप से जितनी मजबूत है, मानसिक और भावनात्मक रूप से उतनी ही संवेदनशील बनी हुई है.

रिपोर्ट के नतीजे दिखाते हैं कि महिलाएं अपने भविष्य की प्लानिंग तो कर रही हैं, लेकिन उनकी यह तैयारी हर मामले में एक जैसी नहीं है. अच्छी बात यह है कि महिलाओं में अपनी सेहत को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है. स्वास्थ्य के मामले में उनकी तैयारी का स्कोर 2022 के 40 से बढ़कर 2025 में 47 हो गया है, जो कि देश के औसत सुधार से थोड़ा बेहतर है. अब ज्यादा महिलाएं बीमारियों से बचने के लिए पहले से सावधानी बरत रही हैं. नियमित या समय-समय पर बॉडी चेकअप कराने वाली महिलाओं की संख्या 57% से बढ़कर अब 60% हो गई है, जो पूरे भारत के औसत आंकड़े से कहीं ज्यादा है.

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रिटायरमेंट के दौरान स्वस्थ रहने के भरोसे में भी सुधार हुआ है, जहां 82% महिलाओं का कहना है कि उन्हें अपने आने वाले वर्षों में फिट रहने की उम्मीद है, जो पहले 79% था. हालांकि, इन सुधारों के बावजूद भावनात्मक तैयारी  कमजोर हुई है. महिलाओं के लिए 'इमोशनल प्रिपेयर्डनेस इंडेक्स' 60 से गिरकर 58 हो गया है, जो रिटायरमेंट के बाद के जीवन को लेकर बढ़ती मनोवैज्ञानिक चिंताओं को दर्शाता है. अध्ययन में पाया गया कि महिलाओं में अकेलेपन का डर तेजी से बढ़ा है, जो 69% से बढ़कर 74% हो गया है, जबकि अखिल भारतीय स्तर पर इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है.

वित्तीय सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी अभी बरकरार हैं. लगभग 73% महिलाओं ने कहा कि वे रिटायरमेंट के दौरान अपने बच्चों पर आर्थिक रूप से निर्भर होने को लेकर चिंतित हैं, जो व्यक्तिगत बचत और बीमा कवर के निरंतर महत्व को दर्शाता है. जोखिम से सुरक्षा के औपचारिक तरीकों (जैसे बीमा) में सुधार हो रहा है, लेकिन यह अभी भी शुरुआती दौर में है. महिलाओं के बीच स्वास्थ्य बीमा अपनाने की दर 2022 के 42% से बढ़कर 2025 में 48% हो गई है, हालांकि इसकी बढ़ने की रफ्तार राष्ट्रीय औसत से थोड़ी धीमी है.  

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साथ ही, पारिवारिक सहयोग को लेकर नजरिए में धीरे-धीरे सुधार देखा गया है. ऐसी महिलाओं की हिस्सेदारी, जो रिटायरमेंट के दौरान परिवार के सदस्यों से मिलने वाले सहयोग को लेकर सुरक्षित महसूस करती हैं, 49% से बढ़कर 53% हो गई है. यह बाद के वर्षों में सामाजिक समर्थन मिलने के भरोसे में मामूली बढ़ोतरी को दर्शाता है. एक्सिस मैक्स लाइफ का कहना है कि ये निष्कर्ष दिखाते हैं कि रिटायरमेंट प्लानिंग अब केवल वित्तीय बचत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि लंबी अवधि की सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य और भावनात्मक तंदुरुस्ती भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है.

कंतार (Kantar) के साथ मिलकर 28 शहरों में किए गए इस अध्ययन से संकेत मिलता है कि भले ही कामकाजी महिलाएं रिटायरमेंट की तैयारी के लिए अधिक सक्रिय कदम उठा रही हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में भावनात्मक मजबूती और वित्तीय स्वतंत्रता ऐसे मुख्य क्षेत्र बने रहेंगे जिन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है.
 

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