भारत में घर किराए पर लेना अक्सर एक बड़ा पेंचीदा मामला रहा है. किरायेदारों ने हमेशा भारी सिक्योरिटी मनी और अचानक किराए में बढ़ोतरी की शिकायत रहती है, जबकि मकान मालिकों को देरी से भुगतान और बेदखली की लंबी कानूनी लड़ाइयों से जूझना पड़ा है.
हालांकि, इस रिश्ते का एक बड़ा हिस्सा भरोसे, अनौपचारिक समझौतों और असमान नियमों पर चलता रहा है. अब, यह पुराना समीकरण एक बदलाव की ओर है.
'मॉडल टेनेंसी एक्ट, 2021' पर आधारित एक नया रेंटल ढांचा भारत में घरों को किराए पर देने के तरीके को औपचारिक बनाने की कोशिश कर रहा है. इसका उद्देश्य स्पष्टता लाना, विवादों को कम करना और किरायेदारों एवं मकान मालिकों दोनों के लिए एक अधिक संतुलित प्रणाली बनाना है.
किरायेदारी में क्या बदला है
ऋषभ गांधी एंड एडवोकेट्स के संस्थापक, ऋषभ गांधी ने कहा कि सबसे बड़ा बदलाव एक औपचारिक प्रणाली की ओर बढ़ना है, उन्होंने कहा, "नया रेंटल ढांचा भारत के मुख्य रूप से अनौपचारिक रेंटल हाउसिंग मार्केट को औपचारिक बनाने का प्रयास करता है. सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक यह है कि लिखित किरायेदारी समझौते और रेंट अथॉरिटी के साथ उनका पंजीकरण इस प्रणाली का केंद्र बन गया है."
पहले किराये पर घर लेते समय कागजी कार्रवाई को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता था. उन्होंने आगे कहा, "कई समझौते मौखिक थे या मानक 11-महीने के अनुबंधों पर आधारित थे, जिन्हें शायद ही कभी पंजीकृत किया जाता था. नया ढांचा औपचारिक अनुबंधों, स्पष्ट रूप से दर्ज शर्तों और मकान मालिकों एवं किरायेदारों के बीच अधिक पारदर्शिता पर जोर देता है."
D.M. हरीश एंड कंपनी के पार्टनर, अधिराज हरीश ने कहा कि कानून का इरादा पारदर्शिता में सुधार करना और विवादों को कम करना है, उन्होंने कहा, "कानून का उद्देश्य मकान मालिक-किरायेदार संबंधों को अधिक पारदर्शी बनाना और विवादों के त्वरित समाधान के लिए एक प्रणाली बनाना है."
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किराए से जुड़े पैसों के लेन-देन और घर चलाने के नियमों को अब सबके लिए एक जैसा बनाया जा रहा है." उन्होंने कहा, "कानून सिक्योरिटी डिपॉजिट पर सीमा तय करता है, जिसे आमतौर पर आवासीय संपत्तियों के लिए दो महीने के किराए और व्यावसायिक परिसरों के लिए छह महीने के किराए तक सीमित किया जाता है."
मकान मालिकों और किरायेदारों के बीच मरम्मत की जिम्मेदारियों का भी स्पष्ट विभाजन किया गया है. उन्होंने आगे कहा कि कानून असाधारण स्थितियों को भी कवर करता है. "यह 'फोर्स मेज्योर' जैसी स्थितियों में जिम्मेदारियों को परिभाषित करता है और रेंट अथॉरिटी के साथ दो महीने के भीतर रेंटल एग्रीमेंट पंजीकृत करना अनिवार्य बनाता है.'
ऋषभ ने बताया, "असल में अब बदलाव यह हो रहा है कि हम उस पुराने सिस्टम को छोड़ रहे हैं, जहां नियम-कायदे ढीले थे और सिर्फ मकान मालिक की मनमर्जी चलती थी. अब इसकी जगह एक ऐसा कानूनी ढांचा बन रहा है जहां लिखित समझौते होंगे और दोनों पक्षों के हक सुरक्षित रहेंगे."
किरायेदार के अधिकार बनाम मकान मालिक का संरक्षण
नए नियमों का एक मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के हितों को संतुलित करना है, ऋषभ ने कहा, "किरायेदार के दृष्टिकोण से, कानून मनमाने तौर-तरीकों के खिलाफ अधिक पूर्वानुमान और सुरक्षा प्रदान करता है."
सुरक्षा जमा की सीमा तय है, किरायेदारी समझौते में किराया, अवधि और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होनी चाहिए, और मकान मालिक किरायेदारी के दौरान किराया तब तक नहीं बदल सकते जब तक कि समझौता इसकी अनुमति न दे और उचित नोटिस न दिया जाए.
किरायेदारों को मजबूत कानूनी समर्थन भी मिलता है
उन्होंने आगे कहा, "किरायेदारों को प्रक्रियात्मक सुरक्षा मिलती है क्योंकि अब बेदखली कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त आधारों पर ही होनी चाहिए और विवादों को सामान्य दीवानी अदालतों के बजाय विशेष रेंट अथॉरिटीज के सामने लाया जा सकता है." साथ ही, मकान मालिकों को भी वे सुरक्षाएं मिलती हैं जो पहले अक्सर गायब थीं.
ऋषभ ने कहा, "मकान मालिकों के पास अब अपनी संपत्ति का कब्जा वापस पाने, किराया भुगतान में चूक करने वाले किरायेदारों के खिलाफ कार्रवाई करने और अनुबंध की शर्तों को लागू करने के स्पष्ट अधिकार हैं."
यदि कोई किरायेदार किरायेदारी समाप्त होने के बाद भी टिका रहता है, तो कानून मकान मालिकों को बढ़े हुए किराए या मुआवजे का दावा करने की अनुमति देता है. हरीश ने इस प्रावधान को रेखांकित किया. उन्होंने कहा, "यदि किरायेदार समझौता समाप्त होने के बाद खाली करने में विफल रहता है, तो मकान मालिक बढ़ा हुआ किराया वसूल सकता है, जो मासिक किराए का चार गुना तक हो सकता है."
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ऋषभ ने अंत में कहा, "समग्र उद्देश्य किरायेदारों को अनुचित व्यवहार से बचाते हुए हितों को संतुलित करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि मकान मालिक अंतहीन किरायेदारी विवादों में न फंसें."
बेदखली के नियम अब अधिक स्पष्ट
रेंटल विवादों में बेदखली लंबे समय से सबसे बड़े फ्लैशपॉइंट्स में से एक रही है. नए ढांचे के तहत शर्तें स्पष्ट रूप से परिभाषित हैं. ऋषभ का कहना है- "बेदखली केवल स्पष्ट रूप से परिभाषित कानूनी आधारों पर ही हो सकती है. इनमें किराए का भुगतान न करना या बकाया जमा होना, परिसर का दुरुपयोग, सहमति के बिना सबलेटिंग, संरचनात्मक क्षति पहुंचाना या अवैध बदलाव करना शामिल है."
विशिष्ट स्थितियों में भी बेदखली की अनुमति
उन्होंने आगे कहा, "अगर संपत्ति को बड़ी मरम्मत, पुनर्निर्माण या अन्य वैध उद्देश्यों के लिए आवश्यक है जिसे किरायेदार के कब्जे में रहते हुए नहीं किया जा सकता, तो भी इसकी अनुमति दी जा सकती है."
यह पिछली प्रणालियों से एक बदलाव को दर्शाता है. कई राज्यों में पुराने रेंट कंट्रोल कानून किरायेदारों के पक्ष में बहुत अधिक थे और अक्सर उन्हें अनिश्चित काल तक रहने की अनुमति देते थे जब तक कि वे नियंत्रित किराया देते रहते थे. नया ढांचा मकान मालिक के स्वामित्व अधिकारों को मान्यता देकर एक अधिक संतुलित प्रणाली बहाल करने का प्रयास करता है, जबकि यह भी सुनिश्चित करता है कि बेदखली केवल उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से हो.
विवादों का तेज़ समाधान
एक और बड़ा बदलाव यह है कि विवादों को कैसे संभाला जाता है. नया ढांचा रेंटल विवादों से निपटने के लिए एक विशेष संस्थागत संरचना बनाता है. पहले स्तर पर रेंट अथॉरिटी है, जो किरायेदारी समझौतों को पंजीकृत करती है और नियमित विवादों को संभालती है. अपील या अधिक गंभीर विवादों को रेंट कोर्ट में ले जाया जा सकता है, और आगे की अपील रेंट ट्रिब्यूनल के सामने की जा सकती है.
हरीश ने ट्रिब्यूनल की भूमिका की ओर भी इशारा करते हुए कहा "कानून विवादों के निवारण के लिए एक रेंट ट्रिब्यूनल पेश करता है." इस प्रणाली से देरी कम होने की उम्मीद है.'
वहीं ऋषभ कहते हैं "यह विशेष रूप से किरायेदारी के मामलों के लिए डिज़ाइन किया गया है, बजाय इसके कि ऐसे विवादों को सामान्य दीवानी अदालतों में भेजा जाए, जहां मामलों में अक्सर सालों लग जाते हैं."
हालांकि, दोनों विशेषज्ञों ने एक मुख्य चिंता की ओर भी इशारा किया. उन्होंने ने कहा, "वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें इन संस्थानों को कितनी सक्रियता से लागू करती हैं और क्या पर्याप्त प्रशासनिक क्षमता बनाई जाती है.
किराया बढ़ाने के नियम
नया ढांचा किराए में वृद्धि पर भी स्पष्टता लाता है, ऋषभ ने कहा, "मकान मालिक अभी भी किराया बढ़ा सकते हैं, लेकिन वृद्धि को एक संरचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा." किराया संशोधन आमतौर पर किरायेदारी समझौते में ही निर्दिष्ट किया जाना चाहिए, अक्सर एक 'एस्केलेशन क्लॉज' के माध्यम से .इसका उद्देश्य अचानक होने वाली बढ़ोतरी से बचना है.
उन्होंने कहा, "मकान मालिक को किराया वृद्धि लागू करने से पहले अग्रिम लिखित सूचना देनी होगी. यह किरायेदार को स्वीकार करने, फिर से बातचीत करने या परिसर खाली करने की अनुमति देता है. यदि किरायेदार वृद्धि पर विवाद करता है, तो मामले को रेंट अथॉरिटी के सामने ले जाया जा सकता है."
राज्य के नियम अभी भी मायने रखेंगे
एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि यह कानून पूरे भारत में स्वचालित रूप से समान नहीं है. हरीश ने कहा, "संविधान के तहत भूमि राज्य का विषय है, और इसलिए राज्य इन नियमों को अलग रूप में लागू कर सकते हैं, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों ने पहले ही इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं."
इसका मतलब है कि प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग होगा, उन्होंने कहा, "प्रत्येक राज्य के कानून की अपनी बारीकियां हैं."
उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए इसे समझाया- 'महाराष्ट्र में, वर्तमान में 'महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट' मकान मालिक-किरायेदार संबंधों को नियंत्रित करता है, जिसमें पगड़ी मॉडल और लीव एंड लाइसेंस जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं. मुंबई जैसे शहरों में, अधिकांश रेंटल पहले से ही पंजीकृत लीव एंड लाइसेंस समझौतों के तहत आते हैं, जिनमें मानक टेम्पलेट और ऑनलाइन पंजीकरण होता है."
यह देखना होगा कि विधायिका और कार्यपालिका मौजूदा कानूनों और नए किरायेदारी ढांचे के बीच संतुलन कैसे बनाती है. इसी तरह, प्रत्येक राज्य को अपने मौजूदा कानूनों और स्थानीय स्थितियों को ध्यान में रखते हुए कानून को सावधानीपूर्वक लागू करना होगा."
किरायेदारों और मकान मालिकों के लिए इसका क्या मतलब है
किरायेदारों के लिए, इन बदलावों का मतलब है कम सिक्योरिटी डिपॉजिट, स्पष्ट समझौते और अचानक की जाने वाली कार्रवाइयों के खिलाफ बेहतर सुरक्षा. मकान मालिकों के लिए, नए नियम उनकी संपत्ति पर स्पष्ट अधिकार, विवादों में बेहतर कानूनी समर्थन और उन किरायेदारों के खिलाफ सुरक्षा लाते हैं जो अवधि समाप्त होने के बाद भी रुक जाते हैं या भुगतान में चूक करते हैं.
लेकिन बड़ा बदलाव संरचनात्मक है. भारत का रेंटल मार्केट धीरे-धीरे अनौपचारिक, भरोसे पर आधारित व्यवस्थाओं से हटकर लिखित अनुबंधों, परिभाषित जिम्मेदारियों और कानूनी स्पष्टता पर आधारित प्रणाली की ओर बढ़ रहा है.
रिपोर्ट- सोनू विवेक
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