तेल, महंगाई और शेयर बाजार... G7 की बैठक में रूस पर भी होगी बात? भारत तैयार

जी7 देश रूस पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने या मौजूदा 'प्राइस कैप' को और कड़ा करने पर विचार कर सकते हैं. भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है.

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महंगा कच्चा तेल सबसे बड़ा मुद्दा. (Photo: ITG) महंगा कच्चा तेल सबसे बड़ा मुद्दा. (Photo: ITG)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 19 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:44 AM IST

जी7 देशों की आगामी बैठक वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है. इस बैठक में लिए जाने वाले फैसलों का सीधा असर भारत के कच्चे तेल के आयात, महंगाई और शेयर बाजारों पर पड़ने की संभावना है. खासकर ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ते तनाव ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में कोई भी उछाल सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है.

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कच्चे तेल की कीमतें और रूस पर प्रतिबंध
भारत के लिए सबसे बड़ा संवेदनशील मुद्दा कच्चे तेल की आपूर्ति और उसकी कीमतें हैं. जी7 देश रूस पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने या मौजूदा 'प्राइस कैप' को और कड़ा करने पर विचार कर सकते हैं. भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर पूरा करता है. अगर जी7 इन नियमों को सख्त करता है, तो भारत के लिए सस्ता तेल खरीदना मुश्किल हो सकता है, जिससे देश का आयात बिल बढ़ेगा.

इसके अलावा अगर वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव या जी7 के फैसलों के कारण कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर भारत में माल ढुलाई और परिवहन लागत पर पड़ेगा. ईंधन महंगा होने से खाने-पीने की चीजों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखना एक बड़ी चुनौती बन जाएगा. 

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शेयर बाजार पर दबाव
वैश्विक स्तर पर नीतिगत अनिश्चितता के कारण निवेशकों में डर पैदा होता है. जी7 बैठक के नतीजों और भू-राजनीतिक निर्णयों के आधार पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय बाजार से पैसा निकाल सकते हैं या नया निवेश कर सकते हैं. इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती या कमजोरी भी इस बैठक के बाद वैश्विक व्यापारिक धारणाओं से तय होगी.

जी7 बैठक में चीन पर निर्भरता कम करने और 'फ्रेंड-शोरिंग' (मित्र देशों के साथ व्यापार बढ़ाने) पर भी चर्चा होने की उम्मीद है. भारत खुद को एक सुरक्षित और भरोसेमंद ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग केंद्र के रूप में पेश कर रहा है. ऐसे में जी7 देशों की रणनीतियां भारतीय निर्यात और 'मेक इन इंडिया' जैसी पहलों को बढ़ावा दे सकती हैं. 

दुनिया की क्या चिंता?

G7 बैठक में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, फ्रांस, इटली और कनाडा शामिल होते हैं. इन देशों के प्रमुख हर साल वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मिलते हैं. 15 से 17 जून, 2026 के बीच फ्रांस में G7 का शिखर सम्मेलन होने वाला है.

यही नहीं, कई देशों ने चिंता जताई कि लगातार ऊंची ऊर्जा कीमतें वैश्विक आर्थिक विकास को धीमा कर सकती हैं. भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा महंगाई का है. तेल महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं. इससे RBI पर ब्याज दरें ऊंची रखने का दबाव बढ़ सकता है. अगर ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो शेयर बाजार और निवेश दोनों प्रभावित हो सकते हैं. 

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शेयर बाजार पर भी इसका असर दिख सकता है. विदेशी निवेशक जोखिम बढ़ने पर भारतीय बाजार से पैसा निकाल सकते हैं. हाल के तनाव के बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से अरबों डॉलर निकाले हैं, जिससे बाजार में दबाव बढ़ा है. 
 

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