सेमीकंडक्टर पूरी दुनिया के लिए एक बहुमूल्य चीज बन चुकी है. बिना इसके इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्रीज पूरी तरह से ठप पड़ सकती है. यही कारण है कि अक्सर चिप को लेकर अमेरिका, चीन और ताइवान में तनाव दिखाई देता है. दूसरी ओर भारत ने भी स्वदेशी चिप बनाने की कोशिश कर रहा है. जिसके लिए सरकार ने इन्सेंटिव स्कीम भी पेश किए हैं और भारत अब दूसरे देशों से भी डील कर रहा है.
हाल ही में अभी भारत ने जर्मनी से चिप को लेकर एक डील की है. यह डील डायरेक्ट तौर पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट बनाने या निवेश को लेकर नहीं हुआ है, बल्कि लंबी अवधि के लिए तकनीकी सहयोग और इको-सिस्टम डेवलपमेंट पर बेस्ड है. जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की हाल ही में भारत यात्रा के दौरान, दोनों देशों ने भारत-जर्मनी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम साझेदारी पर एक संयुक्त समझौते पर हस्ताक्षर किया है.
चिप को लेकर क्या-क्या हुआ है समझौता?
भारत जर्मनी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पार्टनशिप एक ज्वाइंट डील है, जिसके तहत सेमीकंडक्टर के तकनीकी इकोसिस्टम को डेवलप करना, रिसर्च और स्किल पर सहयोग, वैल्यू चेन को मजबूत करना और साझा परियोजनाओं पर काम करने का लक्ष्य रखना शामिल है. यह डायरेक्ट तौर पर चिप सेक्टर में निवेश पर डील नहीं है, लेकिन सहयोग, कौशल विकास और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने वाला एक फ्रेमवर्क है. दोनों देशों के बीच यह डील 12 से 13 जनवरी के दौरान हुई है.
इस डील के क्या होंगे मायने?
भारत और जर्मनी के बीच इस डील से हरित ऊर्जा, क्रिटिकल मिनरल्स और क्लीन तकनीक में भी सहयोग बढ़ेगी. साथ ही तकनीकी नवाचार, स्टार्ट-अप और R&D नेटवर्क को बढ़ावा मिलेगा. जिस कारण भारत का चिप इकोसिस्टम मजबूत होगा. जर्मनी और यूरोपीय कंपनियां भारत में सेमीकंडक्टर स्किल डेवलपमेंट और रिसर्च में भागीदार बनेंगे. इससे ग्लोबल वैल्यू चेन में शामिल होने में मदद मिलेगी.
जर्मनी की ताकतें, भारत की कमियां
वैश्विक सेमीकंडक्टर नजरिए में अक्सर ताइवान, चीन और अमेरिका का दबदबा रहता है. जर्मनी वेफर निर्माण में अग्रणी नहीं है, लेकिन उद्योग की बुनियादी चीजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. भारत स्थित वैश्विक प्रबंधन परामर्श फर्म प्राइमस पार्टनर्स के सह-संस्थापक और सीईओ देवरूप धर कहते हैं कि जर्मनी ताइवान और कोरिया की तरह चिप उत्पादन में अग्रणी नहीं है, लेकिन वैल्यू चेन के उन क्षेत्रों में निश्चित रूप से इसकी मजबूत स्थिति है जहां भारत की वर्तमान में कमी है. जर्मनी चिप निर्माण उपकरण, रसायन संबंधी क्षेत्रों और विनिर्माण से पहले की सटीक इंजीनियरिंग के लिए एक मजबूत केंद्र है.
इसके विपरीत, भारत अत्याधुनिक निर्माण तकनीक में सीधे छलांग लगाने का प्रयास नहीं कर रहा है. बल्कि, वह चरणबद्ध तरीके से एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करने की कोशिश कर रहा है. धर कहते हैं कि डिजाइन, परीक्षण और पैकेजिंग के साथ-साथ औद्योगिक सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में जर्मन नॉलेज, विकास के वर्तमान चरण में भारत की सटीक आवश्यकताओं के अनुरूप है.
भारत के लिए ये बड़ी डील
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में छाई अनिश्चितताओं के बीच, जर्मनी के साथ भारत की यह डील रणनीतिक महत्व को और भी बढ़ा देती है. भारत आक्रामक प्रोत्साहनों, राजनीतिक समर्थन और क्विक एक्शन के बल पर वैश्विक सेमीकंडक्टर विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. ऐसे में यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ गहरा सहयोग एक दीर्घकालिक पारिस्थितिकी तंत्र गठबंधन में तब्दील हो सकता है.
आजतक बिजनेस डेस्क