सड़क पर निकलते ही हम दो तरह के लोग हो जाते हैं. एक जो नियमों को कोसते हैं, और दूसरे जो नियमों की अनदेखी पर सिर पकड़ लेते हैं. भारत की सड़कें इसी द्वंद्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला हैं. यहां गाड़ी चलाना सिर्फ़ ड्राइविंग नहीं, कई बार किस्मत आज़माने जैसा काम हो जाता है. किसी अपने का गाड़ी लेकर घर से निकलना एक अजीब किस्म का डर दिमाग में छोड़ जाता है कि, अगला सुरक्षित ढंग से वापस आएगा या नहीं. कई बार अपनों की वापसी से पहले कोई मनहूस ख़बर आ जाती है.
इस ख़बर के पीछे कई कारण होते हैं. कभी हेलमेट न होने से, कभी तेज रफ्तार से, कभी झपकी से तो कभी इसलिए क्योंकि इलाज के लिए सही समय पर घायल को अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका, या उसके जेब में पर्याप्त पैसे नहीं थें. लेकिन अब तस्वीर में कुछ ठोस बदलाव होता नज़र आ रहा है. हाल ही में सरकार ने रोड सेफ्टी को लेकर कई बेहतर नियम बनाए हैं. जिनमें से कुछ लागू हो गए हैं और कुछ को अमली जामा पहनाना बाकी है. ये नियम एक बड़ा सुरक्षा घेरा बनाते हैं जो अलग-अलग लेवल पर सेफ्टी शील्ड की तरह काम करता है.
सरकार ने सभी दोपहिया वाहनों के साथ ISI मार्क वाला डबल हेलमेट अनिवार्य किया है. मतलब दोपहिया निर्माताओं को अब वाहन के साथ खरीदार को दो हेलमेट देना अनिवार्य होगा. दूसरी ओर कई राज्यों में दोपहिया चालकों को डबल हेलमेट पहनना अनिवार्य किया जा रहा है. जहां एक तरफ सरकार सख्त हो रही है वहीं आम जन को भी इस नियम का कड़ाई से पालन करना चाहिए. भले ही आप घर से कुछ दूर छोटी दूरी के लिए ही क्यों न निकले हों, हेलमेट जरूर पहने. आंकड़े बताते हैं कि बाइक हादसों में मौत की बड़ी वजह सिर पर गंभीर चोट होती है.
भारत सरकार ने हाल ही में अपना खुद का न्यू कार असेस्मेंट प्रोग्राम (Bharat NCAP) शुरू किया है. जिसके तहत देश में निर्मित वाहनों को क्रैश टेस्ट करवाकर उन्हें सेफ्टी रेटिंग दी जाती है. अब तक ये काम ग्लोबल और यूरो NCAP जैसे विदेशी एजेंसिया करती थी. Bharat NCAP में 5-स्टार सेफ्टी रेटिंग के लिए अब सिर्फ मजबूत बॉडी काफी नहीं है. बल्कि 6 एयरबैग, इलेक्ट्रॉनिक स्टैबिलिटी कंट्रोल जैसे जरूरी फीचर्स को भी शामिल करना अनिवार्य होगा.
यह बदलाव सीधे कार कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस पर असर डालता है. अब सेफ्टी को ब्रोशर की आखिरी लाइन में नहीं छिपाया जा सकता. ग्राहक को यह भरोसा मिलेगा कि ज्यादा पैसे सिर्फ फीचर्स पर नहीं, जान बचाने वाली तकनीक पर खर्च हो रहे हैं. यह कदम कार को स्टेटस सिंबल से निकालकर सेफ्टी टूल बनाने की दिशा में भी काम करेगा.
अप्रैल 2026 से हैवी और पैसेंजर व्हीकल्स में कुछ ऐसे जरूरी फीचर्स को शामिल किया जाना अनिवार्य होगा, जो हाई एंड, लग्ज़री और प्रीमियम कारों में ही देखने को मिलते थें. इस समय ऑटो सेक्टर में एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) ख़ासा ट्रेंड में है. ये सिस्टम एक तरह से कई अलग-अलग सेफ्टी फीचर्स का पैकेज होता है. जो किसी भी आपात स्थिति में चालक के ड्राइविंग पैटर्न और बिहैवियर पर नज़र रखते हुए असिस्ट करता है. आने वाले समय में कारों में ऑटोमेटिक ब्रेकिंग, नींद आने पर अलर्ट, लेन वार्निंग जैसे फीचर्स को अनिवार्य किए जाने की जाने की योजना है.
फीचर्स की ये लिस्ट ड्राइवर की थकान और किसी भी गलती को भांपेगा. भारत जैसे देश में, जहां लंबी ड्यूटी, ओवरलोडिंग और टाइम प्रेशर आम है, यह तकनीक गेम चेंजर हो सकती है. सवाल लागत का है, लेकिन उससे बड़ा सवाल जान का है. अगर मशीन एक सेकंड पहले चेतावनी देकर जान बचा ले, तो उसकी कीमत वाजिब लगने लगती है.
अक्टूबर 2025 से देश में बनने वाले सभी ट्रकों में AC केबिन अनिवार्य किया गया है. यह फैसला सिर्फ आराम का नहीं, सेफ्टी का भी है. भीषण गर्मी में बिना AC ट्रक चलाना थकान, चिड़चिड़ापन और गलती की संभावना बढ़ाता है. जब ड्राइवर बेहतर कंडीशन में होगा, तो सड़क पर जोखिम अपने आप कम होगा. यह कदम ट्रक ड्राइविंग को और बेहतर बनाता है. केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि, "ट्रक चालक ट्रांसपोर्ट सेक्टर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है, और उनकी कामकाजी परिस्थितियों और मन की स्थिति से संबंधित मुद्दों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है."
ऐसा आम तौर पर देखा जाता है कि, राह चलते किसी का एक्सीडेंट हो जाता है तो एक पल रूक कर आगे बढ़ जाते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि, आगे बढ़ने वाला व्यक्ति निर्मम है. बल्कि ज्यादातर मामलों में लोग इसलिए मदद के लिए आगे नहीं आते हैं क्योंकि, लोगों को लगता है कि इससे वो किसी कानूनी पचड़े में न पड़ जाएं. या फिर हादसे के बाद इलाज का खर्च उनके सिर पर न आ पहुंचे. इन्हीं तरह की बातों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने रोड एक्सीडेंट के बाद गोल्डन आवर में 1.5 लाख रुपये तक का कैशलैस इलाज का ऐलान किया है.
यह सभी नियम कागज से आगे बढ़कर जमीन पर उतरा तो हजारों जिंदगियां बच सकती हैं. भारत में हादसे के बाद सबसे बड़ा डर इलाज का खर्च होता है. एंबुलेंस देर से आती है, अस्पताल पैसे पूछता है और समय निकल जाता है. कैशलैस इलाज का भरोसा इस डर को तोड़ता है और लोगों को तुरंत मदद के लिए आगे आने की हिम्मत देता है.
ये 5 सेफ्टी शील्ड अपने आप में मजबूत हैं, लेकिन इनका सही उपयोग करने के लिए सिस्टम के साथ नागरिकों की भी जिम्मेदारी है. हेलमेट पहनना, सुरक्षित कार चुनना, नियम मानना और हादसे में मदद करना, यह सब कानून से ज्यादा लोगों के हैबिट का विषय है. अगर सरकार नियम बनाए और जनता उसे बोझ नहीं, सुरक्षा कवच माने, तभी सड़कों पर मौत नहीं, जिंदगी दौड़ेगी. रोड सेफ्टी का असली इम्तिहान यहीं है.
अश्विन सत्यदेव