सुबह का वक्त है. ट्रैफिक सिग्नल पर गाड़ियां रुकी हैं. एक बाइक से काला धुआं निकल रहा है, पास में खड़ी कार की साइलेंसर का हाल भी कुछ कम नहीं है. तभी जेब से एक कागज झांकता दिखता है... PUC सर्टिफिकेट. यानी प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र. कागज कहता है कि गाड़ी ठीक है, हवा साफ है. आंखें कहती हैं कि कहानी कुछ और है. यहीं से सवाल शुरू होता है कि PUC सिस्टम के सच और असर का. क्या ये सिस्टम सच में काम कर रहा है या सिर्फ कागजी रस्म बन कर रह गया है.
PUC यानी पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट मोटर वाहन अधिनियम के तहत जरूरी दस्तावेज है. पेट्रोल, डीजल, CNG और LPG से चलने वाले हर वाहन के लिए यह जरूरी है. इस कागज का मकसद साफ है, वाहनों से निकलने वाले धुएं में कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और अन्य हानिकारक गैसों को तय सीमा में रखना. ताकि वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके. नए वाहनों के लिए यह सर्टिफिकेट आमतौर पर एक साल तक वैलिड होता है, जबकि पुराने वाहनों को हर 6 महीने में जांच करानी होती है, तब जाकर यह सर्टिफिकेट मिलता है.
सिस्टम कागजों में ठीक दिखता है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी अलग है. देश के कई हिस्सों में PUC जांच सिर्फ औपचारिकता बन गई है. पेट्रोल पंपों से लेकर सड़क के किनारों पर कई मशीनें लगी है, लेकिन कैलिब्रेशन कब हुआ, यह पूछने वाला कोई नहीं. कई जगह तो वाहन का इंजन ठीक से गर्म भी नहीं हो पाता और सर्टिफिकेट छप जाता है. कुछ सेंटरों पर छोटी-मोटी रकम देकर बिना सही जांच के भी PUC मिल जाता है.
हाल ही में आजतक ने अपने स्टिंग 'ऑपरेशन लक्ष्मण रेखा' के तहत ऐसे कुछ ठिकानों का पर्दाफाश भी किया था. इस ऑपरेशन में सामने आया था कि, दिल्ली से सटे गाजियाबाद में कई पीयूसी सेंटर खुलेआम बिना वाहन जांचे सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं. गोकुलपुरी, लोनी-भोपुरा रोड जैसे इलाकों में सिर्फ गाड़ी की तस्वीर या वीडियो के आधार पर 300-400 रुपये लेकर पीयूसी सर्टिफिकेट बनाए जा रहे थें.
PUC सेंटरों पर इस्तेमाल होने वाली मशीनों की नियमित जांच और कैलिब्रेशन जरूरी है. हकीकत यह है कि कई मशीनें सालों तक बिना सही जांच के चलती रहती हैं. नतीजा यह होता है कि रीडिंग सही नहीं आती. इसके अलावा ह्यूमन इंटरफेरेंस भी बड़ी कमजोरी है. ऑपरेटर चाहे तो रीडिंग में हेरफेर कर सकता है, और खस्ताहाल वाहनों को भी इस सर्टिफिकेट से नवाज सकता है. इस एक कागजी हेर-फेर से सिस्टम की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े होते हैं.
कानून कहता है कि बिना वैध PUC के वाहन चलाना जुर्म है और कई मामलों में तो मोटा चालान भी हो सकता है. लेकिन सख्ती हर जगह एक जैसी नहीं है. बड़े शहरों में कभी-कभार अभियान चलता है. ख़ासकर सर्दियों के मौसम में जब धुंध की शक्ल में प्रदूषण शहरों को चैंबर बनाना शुरू कर देता है. लेकिन छोटे शहरों और कस्बों में PUC शायद ही कोई गंभीरता से देखता हो. जब डर नहीं होगा, तो नियम भी मजाक बन जाते हैं.
बीते दिसंबर में जब 3 करोड़ 40 लाख आबादी वाली दिल्ली स्मॉग और पॉल्यूशन से हांफ रही थी, तब एक नया नियम लागू किया गया. जिसे सरकार ने 'नो पीयूसी, नो फ्यूल' नाम दिया था. यानी जिन वाहनों के पास वैलिड PUC नहीं होगा, उन्हें पेट्रोल, डीजल या CNG नहीं मिलेगी. सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली-एनसीआर में BS-IV एमिशन मानकों से नीचे आने वाले पुराने वाहनों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की इजाजत दे दी. लेकिन, आज स्थितियां कैसी हैं. कोहरा छंटते ही नियम काफूर हो गया.
सरकार ने PUC डेटा को वाहन और बीमा डेटाबेस से जोड़ने की कोशिश की है. कुछ राज्यों में यह काम शुरू भी हुआ है. लेकिन जमीनी स्तर पर अभी यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है. कई बार ऑनलाइन रिकॉर्ड अपडेट नहीं होता, या फर्जी एंट्री कर दी जाती है. इससे सिस्टम की पारदर्शिता पर तो असर पड़ता है, लेकिन असली असर जनता की सेहत पर दिखता है.
PUC सिस्टम की कमजोरी का सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को होता है. वायु प्रदूषण से अस्थमा, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और आंखों की समस्याएं बढ़ती हैं. बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. जब खराब हालत वाली गाड़ियां बिना रोकटोक सड़क पर चलती हैं, तो प्रदूषण का बोझ हर सांस के साथ बढ़ता है.
PUC सिस्टम का आइडिया खराब नहीं है, लेकिन इसका अमल कमजोर है. जब तक जांच ईमानदार नहीं होगी और नियमों पर सख्ती नहीं आएगी, तब तक हवा साफ होने की उम्मीद भी हवा होती रहेगी. सवाल यह नहीं है कि PUC सर्टिफिकेट जेब में है या नहीं. असली सवाल यह है कि गाड़ी सच में प्रदूषण कम कर रही है या नहीं.
अश्विन सत्यदेव