पश्चिमी एशिया आज फिर बारूद की गंध से भरा हुआ है. ईरान पर इजरायल और अमेरिका लगातार हमले कर रहा है. सरहदों पर तनाव है, तेल के रास्तों पर बमबारी हो रही है और दुनिया भर की निगाहें ईरान पर टिकी हुई हैं. लेकिन हर संघर्ष के बीच एक देश की असली पहचान सिर्फ उसकी राजनीति या युद्ध नहीं होती, बल्कि उसकी ज़मीन से निकली कहानियां होती हैं. ऐसी ही एक कहानी है छोटे से कार वॉशिंग गैराज में काम करने वाले एक लड़के, उसके सपनों और Paykan की.
Paykan एक कार का नाम है, जिसने उस दौर में जन्म लिया, जब ईरान अपनी नई पहचान गढ़ रहा था. सड़कों पर दौड़ती Paykan सिर्फ एक मशीन नहीं थी, बल्कि एक नए ईरान का सपना थी. हमारे बुर्जुगवार बताते हैं, आज का ईरान तब ऐसा नहीं था जैसा आज दिखता है. आज जब हालात फिर से बिगड़े हुए हैं, तब इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो समझ आता है कि कैसे एक मामूली लड़के के सपनों की कार ने पूरे देश को जोड़ने का काम किया था. ड्रोन, मिसाइल, बम-गोले और बारूदी हमलों के बीच यह कहानी यह भी याद दिलाती है कि, असली ताकत सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि उन सपनों में भी होती है जो एक देश को आगे बढ़ाते हैं.
तेहरान की एक तंग गली में, धूल और तेल से भरे एक छोटे से गैराज में एक लड़का दिन-रात काम करता था. बदन पर मैला कपड़ा, चेहरे पर ग्रीस, साबुन के झाग में डूबे हाथ, चेहरे पर पसीना और दिमाग में एक बड़ा सपना. उस लड़के का नाम था अहमद खयामी. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही लड़का एक दिन पूरे ईरान की ऑटो इंडस्ट्री की दशा और दिशा बदल देगा.
1920 के दशक का ईरान. देश में कारें थीं, लेकिन अपनी नहीं थीं. जो भी गाड़ियां दिखती थीं, वे विदेशों से आती थीं. आम आदमी के लिए कार एक सपना थी. इस दौरान 1923 में तेहरान एक अहमद खयामी का जन्म हुआ. एक मामूली परिवार में जन्मे अहमद खयामी का बचपन बहुत मुश्किलों भरा था, लेकिन वो बहुत जुनूनी थे. जब उन्होंने काम करना शुरू किया तो वे सिर्फ कारों को धुलते थे. धीरे-धीरे उन्होंने ऑटो पार्ट्स बेचने का काम शुरू किया. लेकिन उनके दिमाग में एक सवाल हमेशा घूमता रहता था “हम अपनी कार क्यों नहीं बना सकते?” यहीं से उनकी सोच बाकियों से अलग हो गई.
1962 का साल. खयामी ने अपने भाई (महमूद खयामी) के साथ मिलकर एक कंपनी शुरू की 'ईरान नेशनल', आगे चलकर इसका नाम बदलकर इरान खोद्रो (Iran Khodro) हो गया. पर्शियन भाषा में 'Khodro' का मतलब होता है 'ऑटोमोबाइल'. हालांकि, यह कोई आसान फैसला नहीं था. न अनुभव था, न संसाधन. लेकिन एक चीज थी...हिम्मत. शुरुआत बसों और ट्रकों से हुई. धीरे-धीरे कंपनी ने कार बनाने का फैसला किया. यह वही समय था, जब ईरान अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था, और खयामी उसी पहचान को पहियों पर चढ़ा रहे थे. जानकार बताते हैं कि, ख्यामी की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे बाजार की जरूरत को जल्दी समझ जाते थे.
अहमद खयामी ने अपनी जिंदगी के बारे में एक बार कहा था, “हम दो भाई थे... पैसों से गरीब, लेकिन सपनों से अमीर. 1940 का दशक था, मशहद की ठंडी सड़कों पर मैं और मेरा भाई कारें धोकर अपना गुजारा करते थे. हमारे जूतों में छेद थे, कपड़े पुराने थे और सर्दी से बचने के लिए ठीक से कोट तक नहीं था. हर दिन पांच किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलकर काम पर जाते और देर शाम तक जमा देने वाली ठंड में कारें धोते रहते थे.
मेरे दोस्त और जानने वाले मुझ पर हंसते थे. कहते थे, ‘कार धोना कोई असली काम नहीं है.’ वे मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करते, लेकिन मैंने कभी सिर नहीं झुकाया. मैं हमेशा जवाब देता था... ‘कार धोना ही कार बनाने की पहली सीढ़ी है.’ कार बनाना मेरा सपना था. और मुझे पता था कि एक दिन मैं इसे जरूर पूरा करूंगा. घर पर पत्नी और दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी थी, लेकिन फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी. मैं लगातार काम करता रहा, लगातार आगे बढ़ता रहा.
फिर 1953 में, जब मैं 30 साल का हुआ, मैंने Mercedes-Benz की पहली कार मशहद में बेची. उसी पल मुझे एहसास हुआ कि जिंदगी अब अपना अच्छा पहलू दिखाना शुरू कर रही है.”
1960 के दशक की शुरुआत में खयामी का सपना एक ऐसी ईरानी कार बनाने का था, जो सस्ती, टिकाऊ और हर किसी के बजट में हो. कई विदेशी कंपनियों से बातचीत के बाद उन्होंने ब्रिटिश रूट्स ग्रुप (Rootes Group) के प्लेटफॉर्म को चुना. लेकिन इसी दौरान रूट्स को क्राइसलर ने खरीद लिया, जिससे प्रोजेक्ट में मुश्किलें आईं. तमाम चुनौतियों के बावजूद आखिरकार 23 मई 1967 को ईरान नेशनल ने Paykan को लॉन्च किया, और यहीं से ईरान की ऑटो इंडस्ट्री ने अपनी असली रफ्तार पकड़ी.
लॉन्च के बाद Paykan धीरे-धीरे हर ईरानी घर की पहचान बन गई. कम कीमत, बेहतर माइलेज, मजबूती और केबिन काफी खुला-खुला था, इसलिए आम लोग इसे आसानी से अपना सकते थे. यही वजह रही कि Paykan को “नेशनल कार” का दर्जा मिल गया. देश के टैक्सी नेटवर्क में भी इसने जल्दी ही अपनी जगह बना ली और पहले असेंबल होने वाली Fiat टैक्सियों की जगह Paykan Taxi ने ले ली.
इस कार के कई वेरिएंट आए, जो अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से बनाए गए थे. इसके बेस मॉडल में ज्यादा फीचर्स नहीं थे, लेकिन सरकारी विभागों और ऑफिस काम के लिए यह काफी लोकप्रिय हुआ. वहीं Paykan Deluxe मिडिल क्लास परिवारों की पहचान बन गया, जबकि Paykan Youth उन युवाओं के लिए था जो थोड़ी ज्यादा परफॉर्मेंस और स्टाइल चाहते थे.
इसके अलावा कुछ खास वेरिएंट भी आए, जैसे पेकैन स्टेशन और पेकैन ऑटोमेटिक, लेकिन इनका प्रोडक्शन कम ही रहा, इसलिए आज के समय में ये वेरिएंट सड़कों से लगभग गायब हो चुके हैं. वहीं Paykan Vanet एक ऐसा वर्जन था जिसे पूरी तरह ईरान में डेवलप किया गया और यह लंबे समय तक छोटे बिजनेस और लोडिंग के काम में इस्तेमाल होता रहा. करीब 40 साल तक यह कार बनती रही और ईरान की आम आदमी की कार बन गई. खयामी का सपना अब हर सड़क पर दौड़ रहा था.
Paykan मूल रूप से 1966 में आई हिलमैन हंटर पर बेस्ड थी. इसमें 1.8 लीटर का पेट्रोल इंजन मिलता था, जो प्यूजो 504 में भी इस्तेमाल किया गया था. ईरान खाद्रो ने इस कार के एक्सटीरियर और इंटीरियर में कई बड़े बदलाव किए थे. 4 दशकों के लंबे सफर के बाद साल 2005 में आखिरकार कंपनी ने इस कार का प्रोडक्शन आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया.
Paykan की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि, जब ये कार ईरान की सड़कों पर उतरी तो आम लोगों में गज़ब का उत्साह देखने को मिला. इस कार पर कई किताबें, लेख और यहां तक की फिल्म भी बनाई गई. जिनमें अहमद खयामी के बेटे मेहदी खयामी की लिखी किताब "पेकैन ऑफ ऑवर डेस्टिनी" और कामरान शिर्देल की बनाई इंडस्ट्रियल फिल्म 'Paykan' खास तौर पर चर्चा में रहीं.
आज Iran Khodro ईरान की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी बन चुकी है. कंपनी देश के ऑटोमोबाइल बाजार में करीब 65% हिस्सेदारी के साथ दबदबा बनाए हुए है. इसे पूरे मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी ऑटो कंपनियों में गिना जाता है. इस कंपनी ने ईरान की ऑटो इंडस्ट्री को नई पहचान दी है. इसके बाद दूसरे नंबर पर SAIPA का नाम आता है, जो देश की दूसरी सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी है. ये दोनों कंपनियां मिलकर IKCO Samand जैसी लोकप्रिय कारों के साथ-साथ Peugeot प्लेटफॉर्म पर बेस्ड कई मॉडल्स की बिक्री करती हैं.
अश्विन सत्यदेव