कव्वाली का इतिहास कोई नया नहीं है, ये 13वीं सदी से शुरू होता है. कमाल देखिए आज जब इंटरनेट, एआई की दुनिया है, जब जेन-ज़ी या जेन-एल्फा का ज़िक्र हो रहा है, तब भी कव्वाली ज़िंदा है और हम इस पर बात कर रहे हैं. कव्वाली वैसे तो खुद को खुदा से जोड़ने या फिर मनोरंजन का एक ज़रिया रहा, लेकिन इसमें तल्ख़ी भी आई. तल्ख़ी ऐसी कि पाकिस्तान के सबसे बड़े कव्वाल आपस में भिड़ गए. और ये भिड़ंत भी ऐसी कि एक कव्वाली का जवाब दूसरी कव्वाली से दिया गया.
कव्वाली की दुनिया में 70 का दशक कोई शांत तालाब नहीं था, ये उबलता हुआ लावा था. और इस लावा के दो बड़े ज्वालामुखी थे, एक तरफ साबरी ब्रदर्स की सुरीली परम्परा और दूसरी तरफ अज़ीज़ मियां की तीखी 'खुदी'. ये वो दौर था जब कव्वाली का मतलब सिर्फ दरगाहों की चादरें ओढ़कर बैठना नहीं था, बल्कि मंच पर एक-दूसरे को 'बौद्धिक औकात' दिखाना था.
सब कुछ शुरू हुआ 1975 के उस मोड़ पर, जब कव्वाली का कमर्शियल नक्शा बदला.
पहला वार: 'भर दो झोली' बनाम 'मैं शराबी'
साबरी ब्रदर्स की शोहरत उस वक्त ज़मीन पर नहीं थी. 'भर दो झोली' ने उन्हें वो रुतबा दिया था जो आम कव्वालों के लिए एक सपना था. उनकी कव्वाली में एक नशा था, लेकिन वो रूहानी था. साबरी भाई जानते थे कि महफिल को कैसे थामना है.
लेकिन अज़ीज़ मियां? वो तो खुद एक बगावत थे. (बागी नंबर एक) जब उन्होंने 'मैं शराबी' को 50 मिनट का लंबा 'एपिथेट' बनाया, तो उन्होंने सिर्फ शराब की बात नहीं की, उन्होंने 'पाखंड' को ललकारा. मानो कि वो ये कहना चाह रहे हो कि भाई लोग, आप दुनियादारी के दिखावे में व्यस्त रहिए, मैं तो वही कहूंगा जो मेरा मन होगा और जो सच्चा होगा.
दूसरा वार: 'ओ शराबी, छोड़ दे पीना'
साबरी ब्रदर्स ने इसे चुनौती की तरह लिया. उन्होंने अपनी महफिल में 'ओ शराबी, छोड़ दे पीना' के ज़रिए अज़ीज़ मियां पर हमला बोला. ये कोई सीधी गाली नहीं थी, ये 'तंज' का ऊंचे दर्जे का काम था. वे गाते हुए सीधे ऑडियंस में बैठे उस वर्ग को टारगेट करते जो अज़ीज़ मियां को सुनता था.
उनके गाने का तरीका बड़ा 'कूल' था. गाना गाते-गाते रुकना, फिर हंसकर कहना ‘वैसे यहां तो कोई पीता नहीं, है ना?’ ये वो पंच था जो किसी भी महफिल की हवा बदल देता था. वो अज़ीज़ मियां के 'नशे' को 'आवारगी' बता रहे थे.
तीसरा वार: 'हाय कम्बख्त, तूने पी ही नहीं'
अज़ीज़ मियां का जवाब कव्वाली की तारीख का सबसे कड़वा और सबसे तार्किक जवाब था. उन्होंने 30 मिनट की अपनी कव्वाली में साबरियों को एक-एक करके घेरा.
उन्होंने शेर पढ़ा:
‘तूने मयख़ाने का देखा ही नहीं नज़ारा कभी,
जिसने कभी पी ही नहीं, वो क्या जाने कि नशा क्या है."
अज़ीज़ मियां का लहज़ा यहां सिर्फ एक कव्वाल का नहीं बल्कि ऐसा लग रहा था कि वो शराब की वकालत कर रहे हो. वे तर्क दे रहे थे कि जो तुमने 'पिया' ही नहीं, उस पर फतवा कैसे दे सकते हो? उन्होंने साबरियों की 'परम्परावादी सादगी' को ढोंग कहा. उनके लिए साबरी ब्रदर्स वो लोग थे जो महफिल में तो 'अखलाक' की बात करते हैं, लेकिन पीछे से खुद भी उसी दुनिया का हिस्सा हैं. उन्होंने महफिल में दहाड़कर कहा कि तुमने रस्में निभाई हैं, मैंने रूह को जलाया है. फर्क साफ़ है.
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क्यों ये लड़ाई आज भी 'क्लासिक' है?
अज़ीज़ मियां और साबरी ब्रदर्स की ये लड़ाई सिर्फ सुरों की नहीं थी, यह विचारधारा की थी. साबरी ब्रदर्स का सूफीवाद वो था जो आपको 'सुकून' देता है, जो समाज में घुलना-मिलना सिखाता है. अज़ीज़ मियां का सूफीवाद वो था जो आपको 'आईना' दिखाता है, जो आपको समाज से लड़ना सिखाता है.
अज़ीज़ मियां के मंच पर अक्सर पुलिस के छापे पड़ते, लोग लड़ते-झगड़ते. क्यूंकि तब की सरकार ने अज़ीज़ मियां की मैं शराबी कव्वाली पर बैन लगाया था, लेकिन पब्लिक डिमांड पर अज़ीज़ मियां इसे गाते ज़रूर थे. और पब्लिक से मज़े लेते थे, ‘फड़या तां मैं ही जानां हैं, त्वाडा कि जांदा है’ यानी पुलिस आएगी तो मैं ही पकड़ा जाउंगा, आप लोगों का क्या जाएगा. अज़ीज़ मियां का तर्क था कि "ये जो शोर है, यही इबादत है." जब उन्होंने 115 मिनट की कव्वाली गाई, तो उन्होंने साबित कर दिया कि उनका स्टैमिना किसी भी साबरी से कम नहीं था.
उस दौर में कव्वाली के नाम पर जो ये 'तनातनी' चली, उसने मार्केट में जो माल दिया, वो आज का 'ऑटो-ट्यून' संगीत कभी नहीं दे पाएगा. साबरियों ने अगर कव्वाली को 'सुरीला' बनाया, तो अज़ीज़ मियां ने उसे 'सवालात' करना सिखाया. ये किस्सा उस दौर का है जब कव्वाली का मतलब सिर्फ 'इबादत' नहीं, बल्कि 'बौद्धिक दंगल' होता था. वे कव्वालियां आज भी बजती हैं, तो साफ़ सुनाई देता है कि उस ज़माने के कलाकारों के पास शब्द भी थे और उन्हें फेंकने का जिगर भी. आज तो बस 'रिदम' है, पर वो 'तर्क' गायब है जो अज़ीज़ मियां और साबरियों के बीच उस अखाड़े में धधकता था.
मोहित ग्रोवर