मैया यशोदा गाय का दूध निकाल रही हैं. उनके पीछे बाल कृष्ण उन्हें दुलराते हुए से खड़े हैं. उन्होंने अपने एक हाथ में खाली गिलास पकड़ रखा है और मां से दूध पाने के लिए मनुहार कर रहे हैं. अपने बच्चे के लिए मां की ममता और दुलार का ऐसा दृश्य भारतीय परिवारों की पहचान रहा है.
इस दृश्य में कोई चमत्कार नहीं, कोई दैवी आभा का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक घरेलू पल की सहजता और मां-बेटे के रिश्ते की गहराई है. यही गहराई भरा दृश्य जब एक पेंटिंग में उभर कर आता है तो ये कृति समय को पीछे छोड़ देती है और हर दौर में प्रासंगिक बन जाती है.
167 करोड़ में बिकी राजा रविवर्मा की पेंटिंग
राजा रवि वर्मा की बनाई 'यशोदा नंदन कृष्ण' पेंटिंग 167 करोड़ में बिकी. इस तरह भारतीय कला जगत में 1 अप्रैल 2026 की तारीख एक ऐतिहासिक मौके के तौर पर दर्ज हो गई. यह सिर्फ एक महंगी और आश्चर्य में डालने वाली नीलामी नहीं थी, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक आर्ट मार्केट के संगम का एक शक्तिशाली उदाहरण भी बन गई. एक साधारण, भावनात्मक और सरल दृश्य को कैनवस पर उतारा जाना ऐसा रहा होगा कि जैसे एक पूरे समय को चित्र में बांध दिया गया है.
श्रीमद्भागवत कथा से है कनेक्शन
श्रीमद्भागवत कथा के दसवें स्कंध में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का जिक्र मिलता है. इसमें उनकी बाल सुलभ शैतानियां, नटखट कारनामों के साथ माता यशोदा के साथ उनकी बॉन्डिंग भी देखने को मिलती है. कवियों ने उनके बचपन को बहुत सी कविताओं में शब्द दिए हैं. श्रीकृष्ण कारागार में जन्मे लेकिन एक ग्वाला परिवार में पले-बढ़े. उनके इस जीवन दर्शन ने कला और साहित्य को बहुत धनी बनाया है.
राजा रविवर्मा ने रची थी कृति
राजा रवि वर्मा ने देवी-देवताओं को अपनी पेंटिंग के जरिए मानवीय रूप दिया. उनके पहले देवी-देवताओं की छवियां अधिकतर पारंपरिक और प्रतीकात्मक शैली में होती थीं, लेकिन रवि वर्मा ने यूरोपीय यथार्थवादी तकनीकों जैसे रोशनी और छाया का संतुलन, शरीर की प्राकृतिक संरचना और भावों की गहराई को भारतीय पौराणिक कथाओं के साथ जोड़ा.
‘यशोदा-कृष्ण’ इसी प्रयोग का उदाहरण है, जो श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध से प्रेरित माना जाता है. हालांकि, उन्होंने इस धार्मिक प्रसंग को किसी आध्यात्मिक उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक साधारण ग्रामीण जीवन के दृश्य की तरह पेंट किया था, जिससे यह पेंटिंग हर दर्शक के लिए सहज और आत्मीय बन जाती है.
कब बनी थी पेंटिंग?
यह पेंटिंग 1890 के दशक में बनाई गई थी, जब रवि वर्मा अपने करियर के शिखर पर थे. उस समय उन्हें देशभर के राजघरानों का संरक्षण प्राप्त था और उनकी पेंटिंग्स की मांग तेजी से बढ़ रही थी. इसी दौर में उन्होंने अपने प्रसिद्ध लिथोग्राफ प्रेस के जरिये कला को आम जनता तक पहुंचाने का प्रयास भी शुरू किया. हालांकि, उनकी मूल ऑयल पेंटिंग्स की संख्या सीमित रही, क्योंकि बाद में उनकी कृतियों को बड़े पैमाने पर प्रिंट के रूप में लोगों के सामने लाया गया. यही कारण है कि आज उनकी ओरिजिनल पेंटिंग्स बेहद दुर्लभ मानी जाती हैं और जब भी वे नीलामी में आती हैं, तो रिकॉर्ड कीमत हासिल करती हैं.
‘यशोदा-कृष्ण’ पेंटिंग लंबे समय तक दिल्ली के एक निजी संग्रह का हिस्सा रही, जिससे यह आम लोगों की नजरों से लगभग ओझल रही. कला इतिहास में इसका उल्लेख जरूर मिलता रहा, लेकिन इसे देखने का अवसर बहुत कम लोगों को मिला. इस तरह यह कृति एक छिपे हुए खजाने की तरह थी, जो अचानक 2026 में नीलामी के जरिए दुनिया के सामने आई.
80 से 120 करोड़ रखी गई थी कीमत
जब इसे Saffronart ने नीलामी के लिए प्रस्तुत किया, तो इसकी अनुमानित कीमत 80 से 120 करोड़ रुपये के बीच रखी गई थी, लेकिन बोली बढ़ते-बढ़ते 167.2 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. इसे सायरस पूनावाला ने खरीदा और यह भारतीय आधुनिक कला की अब तक की सबसे महंगी पेंटिंग बन गई. इससे पहले यह रिकॉर्ड एमएफ. हुसैन की पेंटिंग ‘ग्राम यात्रा’ के नाम था.
इस पेंटिंग की इतनी ऊंची कीमत के पीछे कई कारण हैं. सबसे पहला कारण इसकी दुर्लभता है, क्योंकि रवि वर्मा की मूल ऑयल पेंटिंग्स बहुत कम बची हैं. दूसरा, इसकी भावनात्मक अपील, यह पेंटिंग धर्म की सीमाओं से परे जाकर मां और बच्चे के सार्वभौमिक रिश्ते को दर्शाती है, जिसे हर संस्कृति का व्यक्ति समझ सकता है.
तीसरा, इसका ऐतिहासिक महत्व यह उस दौर का प्रतिनिधित्व करती है, जब भारतीय कला पारंपरिक शैली से निकलकर आधुनिक यथार्थवाद की ओर बढ़ रही थी. चौथा, आज का बदलता आर्ट मार्केट, जहां कला को एक निवेश के रूप में भी देखा जा रहा है और बड़े कलेक्टर्स इसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
यशोदा के चेहरे पर एक साथ कई भाव इसे बनाते हैं खास
कई कला विशेषज्ञ इस पेंटिंग को 'भारतीय मोना लिसा' जैसी कृतियों की श्रेणी में रखते हैं, क्योंकि इसमें समय से परे आकर्षण और सार्वभौमिक भावनाएं हैं. हालांकि यह तुलना पूरी तरह समान नहीं है, आप इसमें यशोदा के चेहरे की गहराई को देखिए और उनके कपोलों पर सहज ही उभर आए ममता के भाव को पहचानिए. उनके चेहरे पर एक साथ ममता, दुलार, बेटे के लिए सुरक्षा, उसकी भूख की चिंता और इन सब की वजह से जो एक आत्मिक संतोष उभरता है वह सब कुछ है. यानी चेहरा एक पर भाव अनेक.
यह भाव ही बताते हैं कि यह कृति भारतीय कला इतिहास में कितनी महत्वपूर्ण है. राजा रवि वर्मा की विरासत केवल उनकी पेंटिंग्स तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज की दृश्य संस्कृति को भी गहराई से प्रभावित किया. आज भी कैलेंडर, पोस्टर और धार्मिक चित्रों में जो देवताओं की छवियां दिखाई देती हैं, उनकी प्रेरणा कहीं न कहीं उनके कार्यों से जुड़ी हुई है.
इस नीलामी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भारतीय कला अब ग्लोबल स्टेज पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रही है. जहां पहले इसे केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा जाता था, वहीं अब यह आर्थिक मूल्य और निवेश के नजरिये से भी महत्वपूर्ण बन चुकी है.
‘यशोदा-कृष्ण’ की यह बिक्री न केवल एक रिकॉर्ड है, बल्कि यह संकेत भी है कि आने वाले समय में भारतीय कला और उसके कलाकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान और मूल्य मिलने वाला है. यह पेंटिंग हमें यह याद दिलाती है कि कला का असली मूल्य केवल उसके रंगों या कैनवास में नहीं, बल्कि उन भावनाओं और कहानियों में छिपा होता है, जो समय और पीढ़ियों को पार कर जाती हैं.
विकास पोरवाल